उत्तराखंड का नाम राज्य सरकार ने ‘देव भूमि’ कर दिया है। देश भर के दैनिकों तथा पत्रिकाओं में राज्य सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापनों की जो झड़ियाँ लगी हैं उन सबमें उसका नाम दिया गया है ‘देव भूमि’!
क्यों है यह ’देव भूमि’ ? इसलिये कि यहाँ प्राचीन काल में लोग तपस्या करने आते थे ? कि यहाँ चार बडे़ धाम, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री हैं, जहाँ लाखो़ं तीर्थ यात्री हर साल आते हैं तथा चढावा चढ़ा जाते हैं ? अब तो ग्रीष्म काल में बदरीनाथ में दर्शन तक ठीक से नहीं होते। यात्रियों की तीन-चार किमी. लंबी लाइन प्रातः चार बजे से लग जाती है और रात नौ बजे तक बनी रहती है। मंदिरों में खड़े चौकीदार ‘चलो! चलो’ कह कर यात्रियों को जल्दी-जल्दी खदेड़ते रहते हैं, ताकि लाइन में लगे सभी दर्शन कर सकें। अधिकांश को बदरीनाथजी की एक झलक भर दिखाई देती है। यदि तीन यात्री 1,400 रुपए से लेकर 5,000 की पूजा-पर्ची कटायें, तो वे कुछ मिनटों के लिए भगवान के सामने के छोटे से आँगन में बैठ सकते हैं तथा वेदपाठियों से बदरीनाथ में विष्णुसहस्रनाम सुन सकते हैं। अधिकांश के लिए यह संभव नहीं होता। वे केवल चलते-चलते हाथ जोड़ प्रणाम कर ‘जै बदरीनाथजी की’ बोलते कुछ ही सेकेंड में दूसरे द्वार से बाहर हो जाते हैं।
इन विख्यात चार धामों के अलावा यहाँ छठी शताब्दी से लेकर अब तक के मंदिर या मंदिर समूह जागेश्वर, बागेश्वर, द्वाराहाट तथा अदिबद्री आदि में बिखरे पड़े हैं। उनकी बहुत सारी मूर्तियाँ चोरी हो गई हैं और वे खाली पड़े हैं। तब भी वे दर्शनीय हैं, क्योंकि उनकी वास्तुकला पुरातन तथा अद्वितीय है। लेकिन इनके लिए कम ही लोग आते हैं। भगवान की मूर्तियाँ न होने से किसकी पूजा करें ?
विज्ञापनों में सरकार ने दावा किया है कि उसने यहाँ लोगों को छः रुपए प्रति किलो चावल तथा गेहूँ देकर खाद्य सुरक्षा दे दी है। लेकिन राशन में जो मिलता है, उससे किसी का भी पूरा नही होता- महीने में एक व्यक्ति को 400 ग्राम चीनी तथा दो किलो चावल! अधिकतर अन्न परिवारों को बाज़ार से ही महंगाई की दर पर लेना पड़ता है। कुछ समय पहले अखबारों में छपा था कि उत्तराखंड के लिए भेजा गया राशन का अन्न उत्तर प्रदेश की बाजारों में बिक रहा है।
जून 18 को यमुनोत्री जाने वाले तीन यात्री हृदयगति रुक जाने से जानकी चट्टी के पास एक उपचार केंद्र के पास ही मर गए। जानकी चट्टी में यात्रियों का स्वास्थ्य परीक्षण होता है और उसके बाद ही उन्हें आगे जाने दिया जाता है। इस साल इस रास्ते में हृदयगति रुक जाने से 13 व्यक्ति मर गए। पिछले साल 14 लोग मरे थे। घायल तथा रोगियों को उपचार केन्द्रों तक पहँुचाने के लिये एम्बुलेंस की व्यवस्था है। मगर इसके लिए टेलीफोन करना पड़ता है। बहुत से गाँवों में टेलीफोन हैं ही नहीं!
सरकारी दफ्तरों, विकास कार्यों तथा अब जल विद्युत योजनाओं के लिए भूमि लिये जाने से कृषि भूमि लगातार कम हो रही है तथा अन्न उत्पादन घट रहा है। मैदानों से लाया गया अन्न तथा शाक-सब्जियाँ भी लगातार महंगे होते जा रहे हैं। लोग बाहर जा कर कुछ कमा कर घर पैसा न भेजें तो बहुत से यहाँ रहने वाले भूखे मर जायें। बाहर नौकरी के लिए पलायन बढ़ रहा है। जल विद्युत परियोजनाओं के लिए पहाड़ों के अंदर सुरंगें बनने से आबादी के पानी के सोते सूख रहे हैं तथा वातावरण में नमी की कमी होने से खेती-वनों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। यह बढ़ता ही जाएगा, क्योंकि लगातार नई योजनाएँ स्वीकृत हो रही हैं।
मंदिरों से मूर्तियाँ तथा मूल्यवान सोने के कलश तथा गाँवों से मुखौटे चोरी कर बाहर बेचे जा रहे हैं। केदारनाथ तथा ऊखीमठ मंदिरों के कलश खो गये थे। कहा जाता है कि केदारनाथ का कलश वायु वेग से उड़ गया तथा बाद को पास ही बर्फ में मिला। जो मिला, उसके बारे में कहते हैं कि उसमें जंक लगा था तथा वह असली नहीं था। लकडी के प्राचीन मुखौटे उत्सवों के समय नाच के काम आते थे तथा कुछ गाँवों के जीवन के अभ्भिन अंग थे. उनके चोरी हो जाने पर उत्सव-मेले समाप्त हो रहे हैं. जोशीमठ तथा उसके आस-पास तपोवन, लाता, सलूड, इत्यादि गाँवों के पुराने उत्सव मुखौटे सब चोरी हो गए. लाता, इस क्षेत्र की मुख्य आराध्य, हिमालय राज की पुत्री, नंदादेवी का पैतृक गाँव है. प्रतिवर्ष वहाँ नवरात्र में लगभग सारे गाँव के लोग सज्जाएं पहन नंदा की कथाओं का रात भर नृत्य करते हैं. पुराने मुखौटे चोरी होने पर पूरे गाँव के जीवन पर प्रभाव पडा है. यदि कानून व्यवस्था ठीक रहती तो चोरियाँ न होतीं।
व्यवस्थाओं का यहां “देव भूमि“ में नितांत अभाव है। यहाँ की सभी सडकों पर लगातार जानलेवा आपदाएं होती रहती हैं। मोटर गाडियां सडक से नीचे गढढों, नदियों में गिर यात्रियों के प्राण लेती हैं। इसका मुख्य कारण है सडकों की बुरी दशा। गाड़ियों का ठीक से रखरखाव न होना, ड्राइवरों का शराब पीकर गाड़ी चलाना इत्यादि। मुख्य कारण सडकों की दुर्दशा है. राज्य की राजधानी देहरादून, में पड़ती है, जिसके आस-पास सडकें अच्छी दशा में रखी जाती हैं क्योंकि उन पर मंत्री तथा बडे अधिकारी सफर करते रहते हैं. सामान्य लोग राज्य की अन्य सडकों का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी देखभाल ठीक से नहीं होती और उनमें दुर्घटनाएं होती रहती हैं। यदि राजधानी ‘देव भूमि’ के केन्द्र में होती तो वहाँ जानेवाली सडकें अच्छी दशा में अवश्य रखी जाती। क्योंकि मंत्री तथा उच्च अधिकारी उन पर चलते।
अब तो मुख्य मंत्रीजी राज्य में सडकों का प्रयोग करते ही नहीं। वे हेलीकौप्टर से ही इधर-उधर जाते हैं। हेलीकौप्टर यात्रा भी अब सुरक्षित नहीं रही। 19 जून को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए लाया गया हेलीकौप्टर, देहरादून में जंगल में गिर पड़ा। यहां सडकें निरापद रखने यह आवश्यक है कि राजधानी किसी केन्द्रीय स्थान में हो ताकि शासकवर्ग उन पर चले तथा उनकी स्थिति लगातार जानता रहे।
lekh main koi adiwitiya jankari nahin hai, in mandiron main chori pahadion ki vajah se nahin balki bahar se aaye vidharmion ki karamat hai, abhi pichhle dinon jab main ghore se kedarnath ki yatra kar raha tha toh ascharayachakit ho gaya jab maine dekha ki ghorewale pachis pratishat log musalman thei, ye bangladeshi bhi ho sakte hain. ye log sthaniya logon ka rojgar chheen rahe hain, in logon ko mandir se chorian karne main kya hichak hogi? jara iss par bhi likhna, yadi aapki secularity par aanch na aaye toh?