विकास की स्पष्ट दिशा निर्धारित न होने के कारण उत्तराखण्ड राज्य के कई क्षेत्रों में हालात उत्तर प्रदेश के समय से भी बदतर हो गये हैं और प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। इसका नुकसान उत्तराखण्ड राज्य की जनता को उठाना पड़ रहा है।
वनों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। उत्तराखण्ड के लगभग 23 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में वन फैले हुए हैं। राज्य बनने के बाद जहाँ वनों की सघनता लगातार कम हो रही है, वहीं मिश्रित वन भी लगातार घट रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव यहाँ के जनजीवन पर पड़ रहा है। वनों में आहार की कमी के कारण जंगली जानवरों ने आबादी की तरफ रुख कर लिया है। वे फसलों के साथ-साथ आम आदमी को भी अपना शिकार बना रहे हैं। जंगली जानवरों के हमलों में प्रतिवर्ष 100 से भी अधिक लोग जान गँवा रहे हैं। पिछले नौ वर्षों में आयी विभिन्न सरकारों में वन किसी की प्राथमिकता नहीं रहे। सरकारें न तो वृक्षारोपण के प्रति गंभीर हैं, न ही पुराने वनों की सुरक्षा को लेकर। वन विभाग में अब पहले की अपेक्षा अफसरों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। लेकिन अब पतरोल या वन रक्षक पहले की तरह लगातार जंगल की टोह नहीं लेते। वे भी सारी दुनिया की तरह मोबाइल से ही अपनी ड्यूटी निपटा देते हैं। ऐसी हालत में गुणवत्तायुक्त व मिश्रित वनों को बढ़ाने की बात सोचना भी बेमानी होगा। जंगलों को बचाने के लिए ‘चिपको’ जैसे आंदोलन की बात कल्पनातीत लगती है। सरकारी आँकड़े कुछ भी कहें, लेकिन पिछले सालों में पूरे उत्तराखण्ड राज्य में एक भी बड़ा मिश्रित वन विकसित नहीं हुआ होगा।
खेती व पेड़ों से जुड़ा दूसरा विभाग ‘उद्यान विभाग’ भी अधोगति का शिकार है। इस विभाग में हमेशा मुखिया का ही संकट बना रहता है। कभी वन विभाग से मुखिया लाया जाता है तो कभी किसी दूसरे विभाग से। आजकल ‘नाबार्ड’ से मुखिया लाया गया है। पहले यहाँ के सभी राजनैतिक नेता फल उत्पादन को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने की बात करते थे। मगर राज्य के गठन के बाद फलोत्पादन लगातार कम होता जा रहा है। वर्ष 2009 में तो पूरे प्रदेश में फल उत्पादन लगभग पचास प्रतिशत गिर गया। पुराने सेव व लीची के बगीचे लगातार समाप्त होते जा रहे हैं। आबादी का दबाव नये बगीचे विकसित करने के सोच को ही बदल दे रहा है। सरकार अभी तक कोई ऐसी नीति नहीं बना सकी है कि किस क्षेत्र में मौसम के अनुरूप कौन से फलदार पौधों को विकसित किया जायेगा। फल उत्पादकों को प्रोत्साहित करने, उन्हें नयी पौंध, नयी प्रजातियों के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। उत्पादन से भी बुरी स्थिति विपणन की है। उत्तर प्रदेश के वक्त से ही भवाली, रामगढ़ आदि से उ.प्र. परिवहन निगम द्वारा रेलवे के सहयोग से पूरे देश में फल भेजे जाते थे। अब यह व्यवस्था भी समाप्त हो चुकी है। स्पष्ट है कि फल उत्पादन व विपणन अब सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। उद्यान विभाग के अधिकांश बड़े बगीचों को पहले लीज पर देकर बर्बाद कर दिया गया। अब धीरे-धीरे इन्हें पुनः वापस लिया जा रहा है। हिमांचल प्रदेश में केवल सेव, बल्कि उसकी भी केवल तीन प्रजातियों को लेकर पूरा प्रशासन सक्रिय रहता है। यहाँ सरकार यह भी तय नहीं कर पायी कि किस फल को बढ़ावा दिया जाये। कभी सेव की बात होती है तो कभी कीवी की। कभी नींबू, माल्टा की बात होती है तो कभी लीची निर्यात जोन बनाने की बात निकल पड़ती है। सब कुछ अराजकता के कुँहासे में छिपा है।
पर्यटन लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें सरकार का कोई विशेष योगदान नहीं है। उदार आर्थिक नीतियों, वाहन क्रांति, दूरसंचार क्रांति व देश में कुछ खास वर्ग के लोगों की बढ़ती आय के कारण चारों और पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, तो उसका कुछ हिस्सा उत्तराखण्ड को भी स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही। उत्तराखण्ड राज्य में तो पर्यटन विकास की कोई योजना नहीं बनाई जा सकी है। कई स्थानों पर पर्यटन के नाम पर बिल्डर खूबसूरत पर्यटन स्थलों में सिमेन्ट के जंगल बना रहे हैं। स्थानीय लोगों को पर्यटन से नहीं जोड़ा जा सका है। यमनोत्री-गंगोत्री, केदारनाथ-बद्रीनाथ, तपोवन, मुनस्यारी जैसे ट्रैक रूटों की कोई बात ही नहीं करता। फूलों की घाटी या बेदनी बुग्याल जाने वाले पर्यटकों की संख्या अब भी पूरे वर्ष में हजारों तक नहीं पहुँच पाती, जबकि सीजन में नैनीताल, मंसूरी में रहने की जगह नहीं होती। महाकुंभ जैसे धार्मिक पर्यटक उत्सव को लेकर सरकार ने भय व व्यवस्था का ऐसा आतंक पैदा किया है कि लोगों ने कुंभ में जाने से ही तौबा कर ली। एक अच्छा खासा मौका सरकार की व्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया। सरकार ने कई पर्यटक सर्किट बनाने की घोषणायें कीं, जो हवाई साबित हुईं। प्रचार के अभाव में पर्यटक यहाँ के अधिकांश दर्शनीय स्थलों, फूलों, पहाड़ों, जंगलों, बागों, सीढ़ीनुमा खेतों, नौलों, घराटों, मंदिरों को नहीं देख पाते। वे सतही बातों को अपनी यादों में समेट कर वापस लौट जाते हैं।
नये राज्य में भूमि सुधार की तरफ भी ध्यान नहीं दिया गया। न तो बंजर भूमि को खेती योग्य बनाने के प्रयास किये गये न ही उनमें वन या उद्यानों का विस्तार किया गया। सरकारी भूमि बन्दोबस्त की हालत तो और खराब है। सरकारी दस्तावेजों में भूमि बंदोबस्त को भले की कम्प्यूटराइज्ड कर दिया गया हो, लेकिन वास्तविक भूमिधरी जमीन व कब्जेदारी में बहुत बड़ा फर्क है। दस्तावेजों में वास्तविक सुधार न होने के कारण कई वास्तविक भूमिधर अपनी जमीनों से वंचित हैं। कई स्थानों पर थोड़ी सी भूमि होने के बावजूद सैकड़ों नाली जमीन पर काबिज हैं। सरकार द्वारा शासनादेश के बाद भी स्वतः चकबन्दी योजना केवल हवाई साबित हुई है।
























आपकी टिप्पणीयाँ