कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या की खबरें अब तक विदर्भ और आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों से सुनते थे। परन्तु पिछले दिनों पौड़ी और पिथौरागढ़ से आई खबरों ने पहाड़ी किसानों की दयनीय आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान खींचा है। यदि इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो यहाँ भी किसानों की आत्महत्यायें शुरू हो जायेंगी।
पहली खबर धारचूला तहसील से आई। जहाँ ग्राम जयकोट निवासी 48 वर्षीय दलीप सिंह दोशाद पुत्र गैड़ी सिंह दोशाद ने जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को एक ज्ञापन भेजा है। दलीप सिंह ने 2001 में साधन सहकारी समिति से 16 हजार का कृषि ऋण लिया था। इसके बाद लगातार सूखे के कारण उसकी खेती चैपट होती गयी और वह ऋण की अदायगी समय से नहीं कर पाया। 31 मार्च 2007 तक उसकी देनदारी 80 हजार रुपये तक पहुँच गयी। केन्द्र सरकार द्वारा 2007 में समस्त कृषि ऋणों के माफी की घोषणा से दलीप सिंह को आशा थी कि शायद उसे कर्ज से माफी मिल जाये। वह सरकारी समिति के कार्यालय के चक्कर काटता रहा और खाली आश्वासन लेकर लौटता रहा।
अगस्त 2010 तक उसका ऋण एक लाख 33 हजार रुपये पहुँच गया है। साधन सहकारी समिति ने भी दलीप सिंह को नाटिस दिये बिना ही आर.सी. काट कर राजस्व विभाग को वसूली की जिम्मेदारी दे दी। अब राजस्व कर्मचारी दलीप सिंह और उसके जमानतियों को तरह-तरह के भय दिखाने के साथ मानसिक रूप से प्रताड़ित भी कर रहे हैं। हताश और परेशान दलीप सिंह ने आत्महत्या जैसा क्रूर कदम उठाने का फैसला तो अभी नहीं किया है, अलबत्ता राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में उसने अपना गुर्दा बेचने की अनुमति जरूर माँगी है ताकि वह ऋण लौटा सके।
ऐसे ही एक परेशानहाल किसान ने 13 सितम्बर को पौड़ी जिलाधिकारी कार्यालय में जहर पीकर आत्महत्या की कोशिश कर डाली। मनारस्यूँ पट्टी के जखमोली गाँव के किसान सुदामा सिंह ने जबरन भूमि अधिग्रहण किये जाने के विरोध में यह क्रूर फैसला किया। मनरस्यूँ पट्टी में कुंड-द्यूसी मोटर मार्ग बनाया जा रहा है, जिसकी चपेट में सुदामा सिंह की जमीन भी आ गयी। उसने अपनी जमीन को बचाने के लिये लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के आगे गुहार लगायी और सभी उच्चाधिकारियों, मुख्यमंत्री, सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को पत्र लिखे। 2008 से ही वह जमीन बचाने के प्रयास में लगा था। मोटर मार्ग के समरेखण में उसकी 0.052 हेक्टेयर जमीन भी आ रही है। उसके पास ज्यादा भूमि नहीं है। इस भूमि से ही वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है। उसकी भूमि अधिग्रहीत की गई तो परिवार के पोषण के लिये उसे भीख माँगनी पड़ेगी। जिलाधिकारी ने इस मामले में लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंत्रा को जाँच करने के निर्देश दिये। लेकिन लोनिवि के असंवेदनशील अधिकारियों ने इस आदेश को ताक पर रख कर न सिर्फ सुदामा की जमीन कटवा डाली, बल्कि उसका मलबा भी सबक सिखाने के लिये सुदामा के घर के पास डाल दिया।
निराश सुदामा ने जिलाधिकारी कार्यालय में नुवान पीकर आत्महत्या की कोशिश की। उसे शीघ्र अस्पताल पहुँचा कर बचा लिया गया। इन घटनाओं से यह सवाल फिर से उठ रहा है कि आखिर यह छोटा राज्य बनाकर किसको लाभ हो रहा है ?