माओवाद के नाम पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न, उनके घरों में आतंकित करने वाले छापे मारने का क्रम जारी है। प्रशान्त राही को रिहा करने की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने अभी कुछ भी नहीं किया है, जबकि इस प्रकरण में उसे बार-बार कटघरे में खड़ा किया गया है। देहरादून में हुए एक प्रेस सम्मेलन में संवाददाताओं के प्रश्नों से लाजवाब हुए मंख्यमंत्री खंडूरी को यहाँ तक कहना पड़ा कि वे अब माओवाद के बारे में कोई बातचीत नहीं करेंगे। प्रशान्त की रिहाई के लिये देहरादून के पत्रकारों ने मोमबत्तियाँ जला कर एक जलूस भी निकाला। रामनगर में सम्पन्न हुए ‘नदी बचाओ सम्मेलन’ में एक प्रस्ताव पारित कर तमाम सर्वोदयी संस्थाओं, गैर सरकारी संगठनों, राजनैतिक संगठनों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा प्रशान्त राही को रिहा करने की माँग की गई। दिल्ली से अनेक प्रतिष्ठित लेखकों-कलाकारों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा प्रशान्त के पक्ष में जनमत बनाने के लिये एक वेबसाईट शुरू की गई है।
इतना सब होने के बावजूद प्रशान्त राही को रिहा नहीं किया जा रहा है। न सिर्फ यह, बल्कि सच्चाई जानने के लिये जेल में प्रशान्त से मिलना चाहने वालों को रोका जा रहा है। न सिर्फ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बल्कि मीडियाकर्मियों के लिये भी प्रशान्त से मिलने की मनाही है। क्या यह ताज्जुब नहीं कि जघन्य अपराधियों, हत्यारों और बलात्कारियों से आप मिल सकते हैं और एक राजनीतिक कार्यकर्ता से नहीं ?
पिछले दिनों सोमेश्वर में खीमराज सिंह बोरा नामक राजनीतिक कार्यकर्ता के घर पर पुलिस ने अनेक बार छापे मारे। उनके घर वाले बुरी तरह आतंकित हैं। उन्हें डर है कि कहीं पुलिस उन्हें एनकाउंटर दिखा कर न मार डाले। खीमराज सिंह अपने इलाके के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता हैं और नैनीताल समाचार के सहयोगी भी रहे हैं। उनके इलाके के एक सौ से अधिक लोगों ने जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर उन्हें झूठे मामलों में फँसाने का आरोप लगाया है। यदि खीमराज सिंह माओवादी होते तो इतने अधिक लोग खुल कर उनके साथ खड़े होने का साहस शायद ही कर पाते। उधर अल्मोड़ा में देवेन्द्र नामक एक व्यक्ति की तलाश में पुलिस ने चीनाखान में रहने वाली उनकी पत्नी कमला देवी को इतना परेशान किया कि उनके मकान मालिक ने उनसे घर ही खाली करवा लिया। कमला देवी, जिनकी पेटशाल में ससुराल है, का कहना है कि कई सालों से उनका अपने पति से कोई सम्पर्क ही नहीं है।
दो वर्ष पूर्व माओवादी बता कर गिरफ्तार किये गये तीन युवकों में से जीवन और नीलकांत को अदालत द्वारा जमानत मंजूर की जा चुकी है। तीसरे, अनिल चौड़कोटी के मामले में कोई तकनीकी पेंच फँसा है। लेकिन जीवन और नीलकांत जेल से बाहर इसलिये नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि उन्हें जमानतदार नहीं मिल पा रहे हैं। जो भी व्यक्ति जमानत देने को तैयार होता है, पुलिस वाले उसे धमकाने पहुँच जाते हैं। पुलिस उसे भी किसी मामले में न फँसा दे, इस डर से वह व्यक्ति जमानत देने से मुकर जाता है। पुलिस का यह रवैया माओवाद की रोकथाम तो नहीं कर सकता। हाँ, माओवाद की जड़ें जरूर सींच सकता है। माओवाद तभी पनपता है, जब शोषण, अन्याय और अत्याचार की इन्तिहा हो जाये। नक्सलबाड़ी नामक बंगाल के एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ यह आन्दोलन पिछले चालीस सालों में इसीलिये फलता-फूलता रहा, क्योंकि राजनैतिक रूप से तो गरीबी और शोषण की समस्याओं का समाधान नहीं ही ढूँढा गया, न्यायपालिका ने भी ऐसे अन्याय को ठीक करने के लिये कोई पहल नहीं की।