उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार से उत्तराखंड क्रांति दल द्वारा समर्थन वापस लेना एक स्वागतयोग्य घटना है। हालाँकि यह कदम बहुत देर से उठाया गया और इसके कारण दल के भीतर तनाव भी बहुत हैं। हो सकता है कि इस निर्णय से पार्टी दोफाड़ ही हो जाये। क्योंकि जिन लोगों के होठों पर खून लग गया है, वे आसानी से सत्तासुख नहीं छोड़ेंगे। लेकिन इसके बावजूद इसका जो हिस्सा सत्ता से बाहर रहेगा, वह यदि सुलझे दिमाग के साथ कदम बढ़ायेगा तो वास्तविक उक्रांद के रूप में उत्तराखंड की जनता की मान्यता उसे ही मिलेगी।
वर्ष 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का जन्म ही पृथक उत्तराखंड राज्य की एकमात्र माँग के साथ हुआ था। उस वक्त पृथक राज्य एक असंभव सपना लगता था और कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी जैसे दल इस माँग की खिल्ली उड़ाते थे। भाजपा तो पृथक राज्य माँगने वालों को ‘चीन का एजेण्ट’ कहने तक से नहीं चूकी। लेकिन उक्रांद ने अविभाजित उ.प्र. की विधानसभा में नाममात्र की ही सही, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पृथक राज्य का सपना जिन्दा रहा। 1994 में माहौल कुछ ऐसा बना कि अन्य पिछड़ी जातियों के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण के विरोध में उठी आरक्षण की माँग एकाएक पृथक राज्य की माँग में तब्दील हो गई और पूरे पहाड़ में आन्दोलन की आग फैल गई। स्वाभाविक था कि इतने साल से पृथक राज्य की माँग को लेकर संघर्ष कर रहे उक्रांद के हाथ में इस आन्दोलन का नेतृत्व आता। वह आया भी, लेकिन उक्रांद के नेतृत्व के पास वह क्षमता नहीं थी कि आन्दोलन को एकजुट रख पाता। हालाँकि न सिर्फ उत्तराखंड की तमाम संघर्षशील ताकतों, बल्कि अन्यथा जनान्दोलनों से घबरा कर कन्नी काटने वाले बुद्धिजीवियों का भी सक्रिय समर्थन इस आन्दोलन को था। भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों के नेता जनता के उभार से डर कर इधर-उधर दुबक गये थे और उनके निचले स्तर के कार्यकर्ता जनता में घुलमिल कर चरित्र में पहले से ही अराजक इस आन्दोलन को पूरी तरह भेड़ियाधँसान बनाने में तुले थे।
उस ऐतिहासिक मौके पर यदि उत्तराखंड क्रांति दल के नेता जनता की ऊर्जा को एक दिशा देने में सफल हो पाते और जिस तरह गैरसैंण राजधानी के रूप में जनता के दिलोदिमाग में प्रतिस्थापित हो गया था, उसी तरह भावी राज्य का एक ब्लूप्रिंट तैयार कर उसे भी जनता के मन में बैठा देते तो आज उत्तराखंड की तस्वीर एकदम दूसरी होती। लेकिन इस लायक बुद्धि उत्तराखंड क्रांति दल के पास नहीं थी। आन्दोलन में सक्रिय अन्य लोगों या संगठनों ने भी उन दिनों यदि ऐसे सकारात्मक प्रयास किये तो उक्रांद के नेतृत्व ने उनसे वैमनस्य ठान लिया और ‘आज दो अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो’ या ‘जय बद्री जय केदार, उत्तराखंड दे सरकार’ जैसे सतही नारों से ही चिपके रहना पसन्द किया। उत्तराखंड क्रांति दल के पास इसके बाद भी ऐसा मौका आया। जब मुजफ्फरनगर कांड और परवर्ती दमन के बाद आन्दोलन में बिखराव आया तो उक्रांद अपना वैचारिक आधार तथा सांगठनिक ढाँचा मजबूत करने में जुट सकता था। 1994 से वर्ष 2000 में राज्य के गठन तक छः वर्ष उसे इसके लिये मिले। परन्तु वह इस अवधि का फायदा नहीं उठा पाया। अन्यथा राज्य बनते वक्त वर्ष 2000 में भले ही भाजपा की ही अन्तरिम सरकार बनती, 2002 के पहले विधान सभा चुनाव में उत्तराखंड क्रांति दल का ही डंका बजता। ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके बाद उक्रांद कभी कांग्रेस की ओर तो कभी भाजपा की ओर झुकता दिखाई दिया, उसके जुझारू तेवर नष्ट होते चले गये, उसके प्रतिबद्ध कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठने लगे और अन्य राजनैतिक दलों की तरह उसमें भी ठेकेदारों और दलालों की तूती बोलने लगी और वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद वह पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी की गोद में जाकर बैठ गया। उसके मुँह से उत्तराखंड के मुद्दों की बात जब-तब निकलती भी थी तो उस पर हँसी ज्यादा आती थी, गंभीरता कम लगती थी। उसके चरित्र का यहाँ तक पतन हो गया कि जब उत्तराखंड के सारे हितैषी प्रदेश में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं के आगे सवाल खड़ा कर रहे थे, यहाँ ‘नदी बचाओ आन्दोलन’ चल रहा था, उसके ठेकेदार कार्यकर्ता जी. डी. अग्रवाल को बेइज्जत करने या मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह के साथियों की पिटाई करने पहुँचते थे।
उक्रांद की इस बेवफाई या स्वार्थपरकता के कारण राज्य गठन के बाद यहाँ कुछ नये दल बने। कुछ शायद आगे भी बनेंगे। लेकिन उनकी सफलता संदिग्ध है। कारण ? आज की भ्रष्ट हो चुकी चुनावी राजनीति में धनबल, वह भी एकदम गलत ढंग से कमाये गये पैसे, की ताकत बहुत बढ़ गई है। जनता की संगठित शक्ति उसका बराबरी के स्तर पर मुकाबला नहीं कर सकती। और जनता की ताकत अब है कहाँ ? उसे बरगलाने के लिये व्यावसायिक मीडिया है तो गलत दिशा में ले जाने के लिये एन.जी.ओ. का झुण्ड। ये नये बनने वाले राजनैतिक दल कहाँ से इतना पैसा लायेंगे ? कौन सी राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उन पर पैसा इन्वेस्ट करेंगी कि चुनाव के बाद अपनी फसल काट सकें। प्रदेश के भाग्यविधाता बन चुके ठेकदार, माफिया और दलाल भी क्यों उनसे जुड़ेंगे, जबकि भाजपा, कांग्रेस, सपा या बसपा से जुड़ने का विकल्प उनके सामने खुला है। उत्तराखंड क्रांति दल, यदि अब वह सचमुच सम्हलता है, के पास तीस साल के राजनीतिक अतीत की जो पूँजी है, वह ये दल हासिल नहीं कर सकते। उसे हासिल करने में उन्हें अभी तीस साल और लगेंगे।
उत्तराखंड क्रांति दल के पास एक बार फिर एक मौका है। वह अपने रूठे और टूट चुके कार्यकर्ताओं को मनाये, जनता के सामने अग्निपरीक्षा दे कि वह सचमुच बदल गया है…..फिर परिणाम देखिये। यह न हुआ तो उक्रांद पूरी तरह नष्ट हो जायेगा और भाजपा तथा कांग्रेस जैसी दुश्मन पार्टियों का निजाम उत्तराखंड में स्थायी हो जायेगा।