उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में जबर्दस्त भ्रष्टाचार चल रहा है। कहा गया है कि स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट में निदेशक कोषागार एवं वित्त विभाग ने अनियमितताओं को लेकर एक 38 पेज की रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें विश्वविद्यालय द्वारा तकरीबन साढ़े चार करोड़ रुपये के सरकारी धन के दुरुपयोग की बात कही है। शासन ने यह रिपोर्ट अपनी टिप्पणी के साथ कुलाधिपति (राज्यपाल) को प्रेषित कर दी है और कहा है कि प्रो. हसन कुलपति पद पर रहने योग्य नहीं हैं। कुलपति पर अनुशासनात्मक कार्रवाही के साथ वित्तीय अनियमितताओं व महिलाओं के यौन उत्पीड़न के सम्बन्ध में आपराधिक मामला दर्ज करने की संस्तुति की गई है।
यह जानना जरूरी है (जैसा कि उत्तराखंड में बहुत कम लोगों को मालूम है) कि उत्तराखंड सरकार ने इन्दिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय की तर्ज पर 30 अक्टूबर 2005 को ‘उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय’ की स्थापना की। इसका मकसद कुमाऊँ तथा गढ़वाल विश्वविद्यालयों में व्यक्तिगत परीक्षार्थियों का बोझ कम करना तथा पर्वतीय क्षेत्र के दूरदराज के इलाकों में उच्च शिक्षा को पहुँचाना था। इस विश्वविद्यालय में ऐसे पाठ्यक्रमों को स्थान दिया जाना था, जिनसे तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा मिल सके। यह महत्वपूर्ण योजना तब गलत सिद्ध होने लगी, जब इस विश्वविद्यालय की आधारभूत आवश्यकताओं को लेकर राजनीति होने लगी और कुलपति एस.एस.हसन पर धन के दुरुपयोग और यौन उत्पीड़न के आरोप लगने लगे। प्रदेश में 24 केन्द्रों में संचालित इस मुक्त विश्वविद्यालय को देखकर लगता है कि ढाई साल के कार्यकाल में ही यहाँ मर्यादा को पूरी तरह तार-तार कर दिया गया है। अब सरकार पर दबाव है कि वह इस संस्थान की साख को दुबारा स्थापित करे, ताकि इससे जुड़े दो हजार से अधिक परीक्षार्थियों की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ न हो।
स्पेशल रिपोर्ट के छह विन्दुओं में करीब 33 लाख रुपये की धनराशि के व्यय में अनियमितताओं व महिलाओं के यौन उत्पीड़न के सम्बन्ध में आपराधिक मामला दर्ज करने की संस्तुति की गई है। रिपोर्ट के अनुसार वन विभाग की 105 एकड़ भूमि का अधिग्रहण ऑडिट होने तक नहीं हुआ था, पर इसके सर्वे के लिये 3,12,900 रुपये का अनियमित भुगतान किया गया। यह कार्य बिना कोटेशन अथवा टेंडर के करवाया गया। सर्वे करने वाली कम्पनी का भूमि सर्वे का अनुभव प्रामाणिक नहीं था। अधिग्रहण के बगैर ही भूमि के ले आऊट प्लान बनाने पर 14, 86,058 रुपये का भुगतान किया गया। टेंडर व कोटेशन आमंत्रण की प्रक्रिया कार्यालय स्तर से न होने के बाद भी दिल्ली की तीन फर्मां के कोटेशन ले लिये गये। इनमें दो फर्में तो एक ही व्यक्ति की हैं तथा उनमें टेलीफोन नंबर भी एक ही पड़ा हुआ है। जिन फर्मों से खरीद-फरोख्त हुई है, वे संदिग्ध हैं। ऑडिट में आतिथ्य-सत्कार के मानक तय न करने, गैस्ट हाउस में आगन्तुक रजिस्टर न होने और वहाँ मनमाने ढंग से आतिथ्य सत्कार पर खर्च करने का उल्लेख है। स्टेशनरी खरीद पर भी मानकों के उल्लंघन व भंडार रजिस्टर का वार्षिक भौतिक सत्यापन न कराने का भी उल्लेख किया गया है। विश्वविद्यालय में संविदा पर 28 प्रवक्ताओं की नियुक्ति के प्रस्ताव के बावजूद 14 प्रवक्ताओं को नियमित नियुक्ति दे दी गई। विवि ने इस संदर्भ में शासन से भी मार्गदर्शन प्राप्त नहीं किया। इसी तरह अन्य सेवा संवर्गों के पदों के सृजन कराये बगैर संविदा पर नियुक्तियों में अनियमितता दर्ज की गई है। ज्ञात हुआ है कि जनवरी 2007 से जनवरी 2008 तक गार्डों की नियुक्ति फर्जी नामों से की गई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुलपति ने पद का दुरुपयोग करते हुए कुलसचिव पद पर नियुक्त डॉ. बी. आर. पन्त को वित्तीय व प्रशासनिक कार्यों से मुक्त कर दिया। महिला प्रवक्ताओं के यौन उत्पीड़न की जाँच में भी कुलपति की संलिप्तता की बात कही गई है।
रिपोर्ट में अनियमितताओं की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। लेकिन इन अनियमितताओं के बारे में कुलपति हसन कहते हैं कि प्रदेश निदेशालय से जो आपत्तियाँ लगाई गई हैं, उनका वे अध्ययन कर रहे हैं। इसके बाद ही वे जवाब देंगे। वे दावा करते हैं कि विश्वविद्यालय में कोई घोटाला नहीं हुआ है।
अब जब बात हो ही रही है तो कुछ ठोस बातें भी लगे हाथों कर ली जायें। इस विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम तैयार करने हेतु विषय विशेषज्ञों की कई बैठकें आयोजित होती रही हैं। विशेषज्ञ बुलाये गये हों तो फिर विशेष ही होंगे। विशेष जानकारी वालों का ठाठ-बाट, खान-पान भी विशेष ही होने वाला ठहरा। वैसे इस तरह के विशेषज्ञ टी.बी. या शुगर के मरीज होते हैं। फिर भी कुछ तो भुक्खड़ होते ही हैं। आतिर-खातिर भी विशेष ही होनी चाहिये। जब कुछ माल-टाल जायेगा तभी तो वे उस तरह का विषय तय करेंगे, जो इस देश के भुखमरे बच्चों को पढ़ाने के लिये जरूरी है।
सो हे विद्वतजन आगे की कथा सुनो- 6 व 7 जून 2006 को 9 विषय विशेषज्ञों की दो दिवसीय बैठक आयोजित की गई। उसमें 112 किलो चावल, 40 किलो आटा, 500 रुपये की चीनी, 2 किलो चाय की पत्ती, 24 किलो दाल, 15 किलो रिफाइंड तेल, 6 किलो घी, 2 किलो दूध, 2,715 रुपये के ड्राइ फ्रूट्स का खर्चा आया। इतना खा जाने वाले विषय विशेषज्ञों के स्वास्थ्य का क्या हाल है पता नहीं चल पाया है।
21 व 22 अप्रेल 2007 को आयोजित पर्यटन विशेषज्ञों की बैठक में 3 प्रतिभागियों ने 4 किलो मुर्गा, 3 किलो मीट और 450 कबाब चट कर डाले। समझ में नहीं आया कि इतने कबाब बिना सोमरस के कैसे हजम कर सके होंगे बेचारे विषय विशेषज्ञ।
लेकिन 3 व 4 फरवरी 2008 की बैठक में एक भी प्रतिभागी उपस्थित नहीं हो सका, पर चट कर दिया गया 5 किलो मीट, 4 किलो चिकन। साथ में स्टैंडर्ड स्वीट हाऊस का डुप्लीकेट बिल भी था। इसी तरह 19 व 20 फरवरी 2007 को दो प्रतिभागियों के लिये 4 किलो मीट, 5 किलो चिकन तो मँगाया ही गया। साथ ही चार लोगों के होटल में ठहरने का बिल भी नत्थी कर दिया गया। 25 मार्च 2007 को 25 व्यक्ति 75 डिनर व 41 व्यक्ति 75 ब्रेकफास्ट चट कर गये। साथ ही 14 व 16 फरवरी को 7-7 हजार के दो टैक्सी बिल भी इस खर्चे में समायोजित कर दिये गये।
अब हमें पता चल गया है कि मुक्त विश्वविद्यालय में वाकई मुक्त रूप से ही कार्य चल रहा है और यह भी विश्वास हो गया है कि इस देश में महंगाई और भुखमरी कितनी ही चरम पर क्यों न हो, किन्तु हाजमा बहुत तगड़ा है। जब हाजमा इतना तगड़ा है तो विशेष ऑडिट रिपोर्ट भी इसमें हजम होकर न रह जाये। क्या इसमें भी संदेह की कोई गुंजाइश है ?