उत्तराखंड के पूर्व आंदोलनकारी इन दिनों फिर आंदोलित हैं। यह खबर सुखद हो सकती थी बशर्ते कि आंदोलनकारी उस राज्य के व्यापक हितों की बात करते जो उनके संघर्ष की एवज में हमें मिला। जो राज्य फटी पायजामा पहनने वाले आम आदमी के लिये माँगा था, नौकरशाहों, दलालों और हूटर बजाकर आतंकित करने वाले तथाकथित जन प्रतिनिधियों के लिये नहीं। जिस राज्य के लिये क्या-कया सपने देखे थे। एक तरह से चाँद की जगह उसकी परछाई दिखाकर बहला दिया व्यवस्था ने जनता को। जिस तरह कुछ लोग आज भी अंगे्रजों की याद में रोते हैं उसी तरह कई लोग कहते मिल जाते हैं कि इस से हम यूपी में क्या बुरे थे…..? इस तरह के सवालों पर 94 का जैसा आंदोलन खड़ा करने की बात कही होती तो सुखद होता। ऐसा नहीं है अतः अत्यन्त दुःखद है।
आंदोलनकारियों को एतराज इस बात पर है कि आंदोलनकारियों की पहचान में भेदभाव किया जा रहा है। बगल में बैठे आदमी पर स्पॉटलाईट डाली जा रही है जबकि मुझे जानबूझ कर अंधेरे में रखा जा रहा है। हाँ, तो इसमें दिक्कत वाली क्या बात है। आप आंदोलनकारी थे तो थे। किसी के कहने या न कहने से क्या फर्क पड़ता है ? बशर्तें कि आपकी नीयत खराब न हो। बकौल आपही के, आपको तो उस गाँव जाना ही नहीं जहाँ का रास्ता बताने वाले उधार खाये बैठे हैं बीमा कंपनी के एजेन्टों की तरह। व्यवस्था तो टुकड़े डालेगी ही, उसे ज्यादा से ज्यादा गलों में पट्टा जो डालना होता है। कोई अगर उस पट्टे को आभूषण की तरह ग्रहण करना पसंद करे तो यह उसकी पसंद है।
उत्तराखंड का हर मूल निवासी अपने आप में एक चलता फिरता प्रमाण पत्र है कि वह आंदोलनकारी था। भले ही वह उस वक्त राज्य आंदोलन से सहमत न रहा हो। मगर उस दौरान धंधा तो उसका मंदा रहा है, मजबूरी में ही सही, उत्तराखंड आंदोलन के चलते ही तो। इसमें शराब व्यवसायी को भी शामिल कर लीजिये। अगर बुरा लगे तो जितने चाहे जूते (मगर कृपया दोनों पैरों के) मुझे भिजवा सकते हैं। चीजों को खंदक में दुबक कर नहीं, वॉच टावर में चढ़ कर देखना ज्यादा व्यावहारिक होता है। आँखों के कई जाले साफ हो जाते हैं। नजरिये को जरा व्यापक कीजिये। दिल जरा बड़ा कीजिये। नागार्जुन लिख गये हैं कि सिमटा सिकुड़ा हृदय तुम्हारा, आओ इस पर लोहा कर दूँ।
अपने चरणों में सर रख कर कह लेने दीजिये कि आप आंदोलनकारी थे और बेशक थे। अतः प्रातःस्मरणीय हैं, प्रणम्य हैं। इसके लिये प्रमाण पत्र की क्या जरूरत है ? किसके सामने पेश करना है यह प्रमाण पत्र और क्यों ? आंदोलनकारी अपनी नजर में बड़ा ही श्रद्धेय जीव होता है। वह व्यक्तिगत लाभ हानि के लिये नहीं, व्यापक जनहित के लिये लड़ता है। सच्चा आंदोलनकारी ऐसा दरख्त उगाता है जिसके फल आने वाली पीढ़ियों को मिलते हैं। वह धनिये की खेती नहीं करता कि खुद बोया खुद खाया।
सौ टके का एक सवाल- वह शख्स कौन था जिसने इस दौरान बीड़ी के बंडलों में ईनामी कूपनों की तर्ज पर ‘उत्तराखंड जिन्दाबाद’ लिखी पर्चियाँ डलवाई ? उस सरफिरे को कहाँ खोजा जाये और क्या सुलूक किया जाये ? उस समय के बच्चे जो अब जवान हैं, अरे कमबख्तों तुम भी तो तब मुलायम सिंह की अर्थी निकालने का खेल खेलते थे। तुम्हारी मूर्ति किस चौराहे पर लगनी चाहिये, बोलो भाई। कई दिनों के बंद और हड़ताल के चलते उस दौरान आवारा कुत्ते भी तो आधा पेट खाकर रहे…..।
इन दिनों जो मुट्ठीभर आंदोलनकारी आंदोलित हैं संभव है कि उस समय उनके दिमाग में नौकरी, पेंशन प्रमाण पत्र, सम्मान, अपमान जैसी कोई बात न रही हो, बाद में चारा देख कर उनकी लार टपकी हो। उस लार का टपकना ही तो दुःखद है, लार टपकी ही क्यों ? कोई भी सच्चा लड़ाका लार कैसे टपका सकता है। यह बात बेहद निराशाजनक और दुखदायी है।
उत्तराखंड आंदोलन एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन था। ठीक स्वतंत्रता संग्राम की तरह। हर चैतन्यशील व्यक्ति का कर्तव्य होता है कि ऐसे अवसर पर अपना योगदान दे। वही आपने किया। आपके त्याग और संघर्ष के बदले राज्य के रूप में सबसे बड़ा तमगा आपको मिल चुका है, चाहे जैसा भी मिला। अब फर्ज यह बनता है कि इसे अपनी कल्पना और सपनों के अनुकूल बनाया जाये, इसे सजाया-सँवारा जाय, इसमें जो खामियाँ रह गई हैं उनके लिये लड़ा जाये। न कि आंदोलनकारी होने का प्रमाण-पत्र पाने के लिये उस वर्ग के आगे सर खम करें कि जो राज्य मेरी लाश पर बनेगा कहते थे और जब राज्य बना तो सत्ता का सुख भोगने सशरीर चले आये। सम्मान-अपमान वाली आपकी बात का सिरा पकड़ कर अगर आगे बढ़ा जाये तो कुल जमा नतीजा यह निकलता है कि हम किसी की मय्यत में शामिल हों तो मरने वाले के परिवार से बाकायदा टी.ए. बिल बना कर राह खर्च वसूल लें। क्योंकि मय्यत में जाना भी एक सामाजिक कर्म ही तो है उत्तराखंड राज्य आंदोलन में शामिल होने की तरह।
माँगा हुआ ‘सम्मान’ रहम करके दी हुई खैरात बेशक है सम्मान तो हरगिज नहीं। अब जिसे उचित लगे इस को ससम्मान लेकर अपनी निजी जन्नत सुखी रह सकता है। अब यह अनायास नहीं कि ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ फिल्म का एक सीन याद आ गया। उस दृश्य में एक बाल प्रशंसक अमिताभ बच्चन का ऑटोग्राफ पाने के लिये मूल-मंत्र के गड्ढे में कूदन से नहीं हिचकता और बुरी तरह गंधाता हुआ प्रशंसकों, सुरक्षाकर्मियों के चक्रव्यूह को भेद ऑटोग्राफ पाकर फूला नहीं समाता। यह एक प्रतीकात्मक दृश्य है। कुछ पा जाने की ऐसी हवस और दीवानगी को अब भला क्या कहिये ? बेशर्मी और नंगई जब अपने सर्वोच्च स्तर पर होती है तो मुहावरा मशहूर है कि खुदाई से ऊँची होती है, प्रणम्य हो जाती है- जय हो !
फोटो : उत्तराखंड प्रयाग
























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