बागेश्वर के उत्तरायणी मेले को हर कोई अपनी नजर से देखता है। व्यापारी के लिये यह व्यापार करने का मौका है तो ग्रामीण इसे नहाने और उत्सव के रूप में। लेकिन अब सरकारीकरण के बाद प्रशासन इसे कमाई का जरिया मानता है। बुजर्गां का मिमियाने वाला गुस्सा अब दैनिक पेपरों की शोभा बढ़ाता है। हालाँकि उन्हें अब कोई सुनना भी पसंद नहीं करता। वर्षों से वे कहते आ रहे हैं, ‘‘पहले के मेले में रुपयों का चलन नहीं के बराबर होता था… सामान का आदान-प्रदान के साथ ही दूरस्थ क्षेत्रों की कुशल-क्षेम का पता लग जाता था। कई नये संबंध बनते थे। मोटर मार्ग न होने से मेला महीनों तक लगा रहता था। धीरे-धीरे फिर सभी अपनी खोहों को लौटते थे। कुछ भाबर को चले जाते थे, वहाँ से आए व्यापारियों के साथ सामान लाने को। बागेश्वर तब छोटा सा कस्बा था। ईमानदारी कायम थी।’’ बुजुर्गां का कथन अपनी जगह सही है, लेकिन अब उन्हें कौन समझाये कि मेला अब नई पीढ़ी के हाथों में चला गया है। झोड़े, चाँचरी, भगनौल आदि की जगह स्टेज में सीमित कर दी गई है।
बहरहाल अब उत्तरायणी मेले को पाँच दिनों में बाँध दिया गया है। नगर पालिका ने इस बार प्रदर्शनी को नुमाइश मैदान से हटा कर सरयू नदी के किनारे लगा कर एक नई शुरूआत की। इससे मैदान में होने वाली रेलमपेल से कुछ हद तक निजात मिली। प्रदर्शनियों में विस्तार भी देखने को मिला। बगड़ में बनी दुकानों के व्यापारियों ने अपने को अकेला महसूस नहीं किया। मेले में एक विराटता देखने को मिली। इस पहल का विरोध भी हुआ, लेकिन वह ज्यादा मुखर नहीं रहा। ‘जीवन गांधी’ दुकान के स्वामी इस बार चौक बाजार में हुए भगनौलों से प्रफुल्लित थे। वहाँ लोक गायकों को प्रशस्त जगह मिल गई इस बार। सुबह माघ स्नान शुरू होने तक भगनौलों का सभी मजा लेते रहे। माघ स्नान के पहले दिन नगर में सांस्कृतिक दलों की निकली झाँकी में माणा गाँव से आए बुजुर्गों और महिलाओं का उत्साह देखते बन रहा था। दो घंटे तक की चली शोभा-यात्रा में उनके पारंपरिक नृत्य ने मन मोह लिया। एक दिन रिमझिम बारिश के बावजूद मेलार्थियों का ताँता लगा रहा। सांस्कृतिक कार्यक्रम लोकरंजक रहे। हालाँकि नरेन्द्र सिंह नेगी सहित कई अन्य लोकप्रिय उत्तराखंडी कलाकारों का इंतजार भी रहा। मेले के सरकारी समापन होने के बाद भी व्यापारी कई दिनों तक जमे रहे।
इस बार मेले के दौरान बेला नेगी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दाएँ या बायें’ भी दिखाई गई। पहाड़ की शराब, जुआ, खड़िया खनन जैसी समस्याओं को इस फिल्म में उठाया गया है। ‘क्रियेटिव उत्तराखंड’, ‘म्यर पहाड’ व ‘सार्थक संस्था’ के तत्वावधान में ‘हमरि विरासत’ तथा उत्तराखंड के दस सालों पर आधारित ‘म्यर पहाड़’ की सीडी का विमोचन किया। कुली बेगार आंदोलन के नायक पंडित बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, मोहन सिंह मेहता, तुलसी रावत तथा बिशुनी देवी की पोस्टर श्रृंखला जारी की गई। वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी के साथ ही विमल सती, दयाल पांडे, हेम पंत, पवन कांडपाल के प्रयासों की सभी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
बहरहाल मुख्यमंत्री द्वारा उत्तरायणी मेले को राज्य स्तरीय बनाने के आश्वासन से जनता हर्षित है। यह आशा बँधी है कि इससे शयद मेले को विस्तार मिलेगा और व्यापार भी बढ़ेगा। मगर आशंका भी है कि कहीं यह ‘मिशन 2012’ का एक चुनावी झाँसा न हो।