माया पांडे
‘‘सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण ने उन सरस्वती की पूजा की, जिनके प्रसाद से मूर्ख व्यक्ति भी पंडित बन जाता है। श्री कृष्ण ने वरदान देते हुए सरस्वती से कहा कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड में माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी) के दिन विद्यारंभ के शुभ अवसर पर बड़े गौरव के साथ तुम्हारी विशाल पूजा होगी। मेरे वर के प्रभाव से आज से लेकर प्रलयपर्यन्त प्रत्येक कल्प में मनुष्य, देवता, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस सभी बड़ी भक्ति के साथ सोलह प्रकार के उपचारों द्वारा तुम्हारी पूजा करेंगे।’’ -देवीभागवत।
सरस्वती का आह्वान घड़े अथवा पुस्तक में किया जाता है। श्री कृष्ण ने स्वयं इस सर्वपूजिता देवी सरस्वती का पूजन किया। तत्पश्चात् ब्रहमा, विष्णु, महेश, अनन्त, धर्म, मुनिश्वर, मुनिराजा, मुनिगण आदि सभी के द्वारा इनकी पूजा अर्चना की जाने लगी और तभी से मानव समाज में भी यह पूजित हो गयी।
पीले परिधानों से सुसज्जित बसन्त पंचमी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सरस्वती की पूजा की जाती है। पीले वस्त्र, पीले फूल व पीले भोजन (केसर युक्त मीठा भात) सरस्वती को चढ़ाया जाता है। देवी भागवत् में वर्णन किया गया है कि एक बार राधा महोत्सव में श्रीकृष्ण को संगीत सुनाने वाली देवी सरस्वती हाथ में वीणा लेकर सुन्दर ताल स्वर के साथ गीत गाने लगी। तब ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सर्वोत्तम रत्नों से बना एक हार, शिव ने अखिल ब्रह्माण्ड के लिये दुर्लभ उत्तम मणि, श्री कृष्ण ने सम्पूर्ण रत्नों में श्रेष्ठ कौस्तुभ मणि, राधा ने रत्नाजड़ित अनुपम हार, नारायण ने एक सुन्दर पुष्पमाला और लक्ष्मी ने बहुमूल्य रत्नों के कुण्डल उन्हें पुरस्कारस्वरूप अर्पण किये। इस प्रकार वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती सदाधारा, सर्वमंगलकारिणी सामगानप्रिया सूक्ष्मा सावित्री सामसम्भवा होकर उस बसन्तोत्सव की रूपछटा लेकर भूलोक में अवतरित हुई, जिसे ‘ऋतुनाकुसुमाकर‘ कहा जाता है। आम की नई बौरें कोयल कल्याण का राग छेड़ती हैं तो नैसर्गिक नियम के अनुसार चल-अचल सभी के प्राणों में एक आनन्द का आवेग उमड़ पड़ता है। यही आवेग बसन्त पंचमी का त्योहार है। बसन्त पंचमी को श्री पंचमी भी कहा जाता है। इस दिन रति और कामदेव का भी पूजन किया जाता है। सभी लोग पीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। कई जगहों पर बसंत पंचमी का मेला भी लगता है।