मुख्यमंत्री की विकास यात्रायें जारी हैं। इन यात्राओं पर भारी-भरकम खर्चा भी हो रहा है। लोगों से रू-ब-रू होने के बाद कुछ व्यक्तिगत माँगें तो सुलझती दिख रही हैं, लेकिन सार्वजनिक समस्याओं का हल न हो पाना चिन्ता का विषय है। जाहिरा तौर पर सीएम के दौरे से जनता खुश लग रही है। तालियों की गड़गड़ाहट हो रही है। सीएम भी प्रत्येक जिला, तहसील तथा कस्बा छान मारने के लिए तैयार हैं। एक दिन में दो-दो स्थानों पर सभाएँ तथा बहुउद्देशीय शिविर कर जनता के व्यक्तिगत मामले सुलझा रहे हैं। किसी को पेंशन मिलेगी तो किसी के बच्चे का इलाज होगा। सरकारी अमला भी, बारिश हो या फिर आँधी-बारिश हो या फिर आँधी, इन दौरों के लिये पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है। सड़कें घंटों जाम चल रही हैं। हालिया गरुड़ दौरे में चार घंटे तक सड़क जाम रही। यातायात पुलिस ने आड़े-तिरछे वाहनों की कतार लगा दी। दस किमी के दायरे को इस तरह सील कर दिया कि अस्पताल जा रहे रोगियों, पर्यटकों तथा सुदूरवर्ती क्षेत्रों को जाने वाले यात्रियों को सिर पकड़कर सड़क खुलने का इंतजार करना पड़ा। कई लोग सीएम तथा व्यवस्था को कोसते भी नजर आए।
शिविर में जनता ने विभागों को कटघरे में खड़ा करना शुरू किया तो सीएम ने अधिकारियों की क्लास लगाई। अधिकारी पूरी तैयारी से भी नहीं आए थे। जिलापूर्ति अधिकारी को यह भी मालूम नहीं था कि जिले में कितने अटल आदर्श गाँव हैं। अधिकारी की किरकिरी होते देख भाजपा नेता ने ही चुपके से उनके कान में नाम बता कर उनकी इज्जत बचा ली। अन्य कुछ विभाग भी फँसते नजर आये। सीएम ने समझदारी दिखाते हुए अधिकारियों को फटकारने के बदले घुमा-फिरा कर स्वयं ही जवाब कर दिए। पता चला कि जनता अपने नेताओं को नहीं पहचानती। देवनाई गाँव निवासी प्रेमनाथ गोस्वामी से पूछा गया कि क्या वे राम सिंह को जानते हैं तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि राम सिंह उनके गाँव के शहीद हैं। तब सीएम ने उन्हें मंच पर बुला कर जिला पंचायत अध्यक्ष राम सिंह से मिलवाया। राम सिंह की जेब से पाँच सौ रुपये भी बतौर इनाम दिलवाये। ऐसे ही चिकित्सा शिक्षा मंत्री, कपकोट के विधायक आदि को भी लोगों ने पहचानने से इंकार कर दिया।
एक ग्रामीण महिला ने शराब की दुकानें बंद करने की मांग उठा दी। जिस पर सीएम ने कहा कि शराब पीना बंद कर दो, शराब की दुकान बंद हो जाएगी। बलि प्रथा पर रोक लगाने की माँग पर तपाक से जवाब दिया कि जनचेतना लाओ। मुख्यमंत्री जैसी घोषणाएँ कर रहे हैं, वैसी तो विधायक भी कर सकते थे। वृद्धावस्था, विकलांग तथा विधवा पेंशन के चैक समाज कल्याण विभाग बाँट सकता था। बाँटता भी आया है। दैवीय आपदा के तहत मरम्मत को स्वीकृत सड़क, रास्ते, पेयजल योजनाएँ, सरकारी संपत्ति अदि के लोकार्पण तथा उद्घाटन आदि से क्या हासिल होना है ? उत्तराखंड के लोग भी अपने व्यक्तिगत हितों तक ही क्यों सीमित हो गये हैं ? 1994 के राज्य आन्दोलन के शहीद क्या अपने लिए लड़े थे ? विकास यात्रा है तो विकास की बातें होनी चाहिए थीं ? लेकिन यहाँ तो सिर्फ मुआवजा, बीमारी या आवास के लिए आर्थिक मदद आदि मुद्दे ही हावी हैं। सड़कों का हाल बुरा है; स्वास्थ्य सेवाएँ लचर हैं; शिक्षा व्यवस्था ढर्रे में आने का नाम नहीं ले रही; प्रशिक्षित बेरोजगारों को नौकरी नहीं मिल रही; प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या निरंतर घट रही है। ऐसी बहुत सारी समस्यायें हैं। अस्पतालों में डाक्टरों की नियुक्ति होने के बाद भी वह ज्वाइनिंग के बाद नहीं लौट रहे। दैवीय आपदा से प्रभावित परिवारों को घर तथा जमीन देने की बात भी कहीं तक नजर नहीं आ रही। पेयजल के लिए गाँवों में हाहाकार मचा है। ऐसे में उत्तराखंड राज्य का क्या होगा, इस पर बुद्धिजीवियों को बहस करने की जरूरत है।
इन दौरों का कांग्रेस के लोग जमकर विरोध कर रहे हैं। कपकोट में कांग्रेसियों ने काले झंडे दिखाए। ऐसा ही रुद्रपुर, रामनगर, सोमेश्वर, अल्मोड़ा आदि में हुआ। सीएम इसे विपक्षियों की हताशा सिद्ध करने में कामयाब दिख रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस तथा भाजपा, दोनों ही 2012 के चुनाव की तैयारी में जुटे हैं। इन दोनों में कोई दुबारा सत्तासीन होगा। मगर क्षेत्रीय दलों का क्या होगा ? हालाँकि दस सालों में हुए मोहभंग के बाद काफी लोग तो क्षेत्रीय दलों की बात करने लगे हैं। मगर उनका वोट बैंक बहुत बढ़ता नहीं दिखता।
hamare rajya ka durbhyagya hai ki hamare paas koi aisa chehra nahi hai jiske paas rajya ki behtari ka koi vison ho…maanneeya mukhya mantri ji janta ko bargalane ka jo ghatiya kaam kr rahe hain wo ab janta ki samajh main aane laga hai…aane wale election main nishank sarkaar ki lutiya pakka doobegi…lekin sawal ya hai ki iske baad rajya ki baagdor jin hathon main hogi wo haath kiske honge…?