बिनसर वन्य जीव विहार क्षेत्र में हक-हकूकों की मांग को लेकर नब्बे के दशक में चले आंदोलन के दौर में ही यह विचार बना था कि क्यों न इस क्षेत्र के ग्रामीण परम्परागत कार्यों से भी जुड़े रहें और पर्यटन से भी उन्हें कुछ रोजगार मिले। पर न उद्यमिता की पृष्ठभूमि थी और न आर्थिक आधार। फिर खाली स्टेट के हिमांशु पांडे, किसान महासभा के दिनेश पांडे व ईश्वर जोशी की स्थानीय ग्रामीणों के बीच हुई चर्चा ‘विलेज वेज’ के रूप में सामने आई। अब जब अपने गाँव रेशाल (सुनोली) में विदेशी पर्यटकों को ग्रामीणों की दिनचर्या का अध्ययन करते या युवा बेरोजगारों को उनसे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात करते देखता हूँ तो उम्मीद बनती है कि इन उजड़ते गाँवों के दिन अवश्य बहुरेंगे।
दिनेश पाण्डे बताते हैं कि वन्य जीव विहार की परिधि के भीतर बसे गाँवों के लोगों से कई दौर की बातचीत करने के बाद 2005-06 में ‘विलेज वेज’ का कार्य विधिवत शुरू किया गया। इसमें खाली स्टेट का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यहाँ पहले से ही देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते थे और हिमांशु पाण्डे के पर्यटन एजेंसियों से अच्छे सम्पर्क थे। ‘विलेज वेज प्राईवेट इंडिया लिमिटेड’ नाम से कम्पनी पंजीकृत की गई। इधर दलाड़, रेशाल (सुनोली ग्राम सभा), कटघरा, गौनाप (ग्रामसभा बबुरियानायल) व बागेश्वर जिले के मुसियाचैड़ ग्रामसभा के सातरी तोक की अलग-अलग ग्राम कमेटियाँ गठित की गई और इन सब की देख रेख व नीति-निर्धारण के लिए ‘पर्यटन विकास समिति’ बनी। विलेज वेज का मूल उद्देश्य खेती-बाड़ी, पशु पालन आदि कार्यों के लिये सहायता देकर ग्रामीणों को स्वावलम्बी व आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। गाँव कमेटी में सभी स्थानीय परिवारों को सदस्य बनाया गया। गरीब परिवारों का स्वरोजगार के लिए चयन किया गया। कमेटी को कम्पनी द्वारा 40 प्रतिशत धनराशि अनुदान व 60 प्रतिशत धनराशि बिना ब्याज के ऋण के रूप में उपलब्ध कराया गया। पाँचों गाँवों में एक कमरा गाईड/कार्यकर्ता के अलावा 5-6 कमरों के हवादार भवन बनाये गये और उनमें सौर ऊर्जा से विद्युत व्यवस्था, पेय जल, शौचालय व स्नानघर के साथ ही बिस्तर, फर्नीचर, रसोई के बर्तन आदि तमाम जरूरी वस्तुएँ उपलब्ध कराई गई। इन्हीं गाँवों के ही युवाओं को गाईड व रेस्ट हाऊस चलाने के लिये प्रशिक्षण दिया गया। पर्यटकों से ली जाने वाली धनराशि मुख्यालय खाली स्टेट में ही जमा करने की व्यवस्था की गई है। यहीं से तय मानकों के अनुसार प्रत्येक गाँव की कमेटी को धन उपलब्ध कराया जाता है। पर्यटकों द्वारा कार्यकर्ताओं को दी जाने वाली ‘टिप’ राशि वहाँ न देकर मुख्यालय में ही ‘ग्राम विकास कोष’ में जमा की जाती है, जिसका ग्रामीण वक्त-बेवक्त, बैंक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। पर्यटकों के भोजन आदि का मीनू गाँव वाले ही तय करते हैं। कोशिश रहती है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चीजों का ही उपयोग हो और यहाँ के व्यंजनों का स्वाद आगन्तुकों को मिले।
फौज से रिटायर होकर, बच्चों को अल्मोड़ा शिफ्ट कर कई तरह के पापड़ बेल कर वापस गाँव लौटे रेशाल के कैलाश चन्द्र जोशी बताते है- ‘विलेज वेज’ से दलाड़ से 8, रेशाल से 4, सातरी से 3, गौनाप से 5, कटधरा से 24 (कुल 44) परिवार जुड़े हैं। उन्हें 6 माह का रोजगार इस काम से मिल जाता है। दलाड, रेशाल, सातरी की छोटी गाँव कमेटियाँ होने के कारण भोजन आदि खर्चे के अलावा 2 प्रतिशत कमेटी फंड काट कर शेष धनराशि आपस में बाँट ली जाती है। कटघरा में ज्यादा परिवार होने के कारण बारी-बारी 150 रुपया प्रतिदिन के हिसाब से प्राप्त धनराशि के वितरण की व्यवस्था तो गौनाप का कामकाज प्रेम सिंह देखते हैं। यहाँ ध्याड़ी में लोग काम करते हैं। जो बचा वह प्रेम सिंह जी को मिलता है। गाईड व पोर्टरों की मजदूरी तय की गई है। पोर्टरों को दूरी के अनुसार 100 से 200 रुपया तक मिलता है। गाईडों की 600 रुपये, 450 रुपए, 200 रुपए प्रति दिन की तीन कैटेगरी हैं। ये लोग 25 हजार रुपए साल में कमा लेते हैं। पर्यटक फरवरी से मई व अक्टूबर से दिसम्बर तक आते हैं। 2005-06 से अब तक कुल 636 ब्रिटिश यात्री यहाँ आ चुके हैं। विलेज वेज का मुख्यालय निजामुद्दीन, दिल्ली में है।
अगर यह प्रयास सफल रहा तो पलायन रुकेगा। बाहर गये लोग भी गाँवों को लौटेंगे। कैलाश चन्द्र जोशी ने खाली समय में अपने घर की मरम्मत के साथ ही खेतों में साग-सब्जी उगाना शुरू कर दिया है। उधर सातरी में भी एक परिवार गाँव वापस लौटा है। दिनेश पाण्डे बताते हैं कि विलेज वेज ने बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के दूरस्थ गाँवों सूफी, झूनी, जैकुनी में भी यह कार्य शुरू कर दिया है। सरकारी परियोजना ‘उपासक’ व ‘आजीविका’ को 30 साल के अनुबंध पर पार्टनरशिप के रूप में कम्पनी एक्ट में पंजीकृत किया है। सूपी में विलेज वेज, झूनी में उपासक तथा 10 हजार फीट पर स्थित जैकुनी में वहाँ की वन पंचायत को पार्टनर बनाया गया है। यहाँ कुल आय का 10 प्रतिशत विलेज वेज तथा 10 प्रतिशत मकान मालिक/वन पंचायत के कोष में जमा होता है। 150 मवासों के सूपी गाँव के रेस्ट हाऊस में 10 लोग एक साथ रह सकते हैं। यहाँ ‘सरयू वैली साधन सहकारी समिति’ बनाई गई है। समिति में कुछ सम्पन्न लोगों को भी शामिल किया गया है, जो नीतिगत सवालों पर मदद करते हैं। लेकिन यहाँ की आय से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। इन प्रयासों का अप्रत्यक्ष लाभ तो उन्हें मिलता ही है।
इतने कम समय में ही विलेज वेज को ‘ब्रिटिश बिल्ड ऑफ ट्रेवल्स अवार्ड’, ‘बैस्ट टाइम ग्रीन स्पेसेज अवार्ड’ और ‘रेस्पॉनसिबल टूरिज्म अवार्ड’ जैसे पुरस्कार भी मिल चुके हैं। राजस्थान, कर्नाटक, केरल आदि में भी विलेज वेज से जुड़ कर लोग कार्य कर रहे हैं और कई देशों के लोग सम्पर्क में हैं। बिनसर वन्य जीव विहार के दुराग्रही और अनुभवहीन कर्मचारी/अधिकारी यह समझने को तैयार ही नहीं होते थे कि बगैर यहाँ के ग्रामीणों को विश्वास में लिए जंगल नहीं बच सकता। लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है। सैंक्चुअरी में यात्रियों का प्रवेश शुल्क बेतहाशा बढ़ाये जाने के बावजूद देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ आ रहे हैं। इसका लाभ सैंक्चुअरी को भी मिल रहा है। लेकिन सुविधा के नाम पर उसकी ओर से सम्पर्क मार्गां को भी दुरुस्त नहीं किया गया है।
इसके बावजूद तस्वीर बदल रही है।