विश्वप्रसिद्ध कार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों से सटे गाँवों के लोगों ने सरकार व वन विभाग के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया है। जहाँ एक ओर ग्रामीण हिंसक हो रहे जंगली जानवरों से अपने जान-माल की सुरक्षा के प्रबंध की माँग कर रहे हैं, वहीं दशकों से मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जी रहे वन ग्रामों के बाशिंदे भी राजस्व ग्राम बनाने की माँग को लेकर सड़कों पर हैं। इसके अलावा कार्बेट प्रशासन द्वारा अपने सहयोग के लिए गठित की गई ईको विकास समितियों से जुड़े लोग भी वन विभाग के उपेक्षापूर्ण रवैये के खिलाफ कार्बेट मुख्यालय पर प्रदर्शन करके 22 दिसंबर से झिरना गेट बंद करने की चेतावनी दे चुके हैं। यही हाल रहा तो ग्रामीणों का आंदोलन आगे बढ़ने पर अगले वर्ष सरकार द्वारा बहुप्रचारित कार्बेट पार्क की प्लैटिनम जुबली समारोह, जिसमें देश-विदेश की नामी गिरामी हस्तियों के भाग लेने की संभावना है, के रंग में भंग पड़ सकता है।
पार्क की सीमा पर बसे ग्रामीण जंगली जानवरों के आतंक के कारण मुसीबत में हैं। यहाँ पिछले महीने एक हफ्ते के भीतर दो महिलाओं की बाघ के हमले में मौत हो चुकी है। इससे कुछ माह पहले जंगली हाथी ने कुचलकर एक महिला को मार डाला था। उत्तराखंड में करीब चौदह हजार गाँव जंगलों के किनारे बसे हुए हैं, जहाँ बीते दस सालों में हिंसक जंगली जानवरों ने ग्यारह सौ से ज्यादा हमलों में तीन सौ लोग मारे जा चुके हैं और करीब आठ सौ घायल हुए हैं। कार्बेट पार्क के इर्द गिर्द भी बाघ, हाथी और दूसरे वन्यजीवों की आम इंसान के साथ टकराहट बढ़ती जा रही है। 4 दिसंबर 2008 को बाघ ने रामनगर वन प्रभाग के कोसी रेंज में लकड़ी लेने गई टेढ़ा गाँव की महिला पर हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। 12 दिसंबर 2008 को बाघ ने देचैरी रेंज के जंगल में एक गुर्जर युवक पर हमला कर उसे घायल कर दिया था। 4 फरवरी 2009 को कार्बेट पार्क के सर्पदुली रेंज के जंगल में लकड़ी लेने गई ढिकुली गाँव की महिला बाघ का निवाला बनी थी। यह बाघ बाद में पिंजरे में कैद कर लिया गया था। 10 जून 2009 को बाघ ने कोसी रेंज के जंगल में लकड़ी लेने गई महिला पर हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। 5 फरवरी 2010 को मार्निंग वॉक पर निकले तीन युवक बाघ के हमले में घायल हो गए। इसके अगले ही दिन 6 फरवरी 2010 को सर्पदुली रेंज के जंगल में घास लेने गई देवीचौड़ गाँव की महिला बाघ का शिकार बनी। ठीक 6 महीने बाद इसी रेंज में जंगल में 12 नवम्बर 2010 को करी पत्ता लेने गई सुंदरखाल की महिला बाघ का शिकार हुई। उसके बाद चुकुम में 18 नवंबर को बाघ ने एक और महिला को निवाला बनाया। इससे ठीक पहले पतरामपुर में एक लकड़हारा तेंदुए के हमले में मारा गया। वहीं जुलाई में हाथी ने लालढाँग गाँव में घुसकर एक महिला की जान ले ली थी। इससे जंगल से सटे गाँवों में रहने वालों में वन विभाग के प्रति गुस्सा बढ़ता जा रहा है। जहाँ एक ओर वन्यजीव लोगों पर हमले कर रहे हैं, वहीं किसानों की मेहनत से उगाई फसलों को जंगली जानवर चट कर रहे हैं। इसकी एवज में उन्हें नाममात्र का मुआवजा मिलता है, वह भी लेटलतीफी से। फिलहाल कार्बेट और आसपास के वन प्रभागों के उपर ग्रामीणों के मुआवजे की करीब आधा करोड़ रुपये की देनदारी है। ग्रामीणों का आरोप है कि एक ओर कार्बेट की प्लैटिनम जुबली पर पाँच करोड़ रुपए खर्च करने की बात की जा रही है, वहीं ग्रामीणों को मुआवजे के लिए कई महीने तक टरकाया जाता है।
रामनगर के सुंदरखाल समेत वन ग्रामों में रहने वाले लोगों ने राजस्व गाँव बनाने की माँग को लेकर जोरदार प्रदर्शन करते हुए जुलूस निकालकर आंदोलन की शुरूआत की है। दशकों से वन ग्रामों में रहने वाले इन ग्रामीणों ने जंगली जानवरों से अपनी जान माल की सुरक्षा करने और वन कानूनों के नाम पर उत्पीड़न बंद करने की माँग उठाई है। प्रदर्शनकारियों ने पहले कार्बेट पार्क के मुख्यालय पर एकजुट होकर धरना प्रदर्शन किया, उसके बाद नगर के मुख्य मार्गों से होकर नारेबाजी करते हुए जुलूस निकाला। ग्रामीणों का जुलूस उपजिलाधिकारी कार्यालय में पहुँचकर आम सभा में तब्दील हो गया। सभा में लोगों ने सुंदरखाल समेत तमाम वन ग्रामों को वन्य जीवों के नाम पर विस्थापित करने की योजना का विरोध करते हुए राजस्व ग्राम बनाने की माँग की। क्षेत्र में एक दर्जन से ज्यादा वन गाँवों में हजारों लोग निवास करते हैं, मगर इन्हें बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ मयस्सर नहीं हैं। यहाँ रहने वाले लोग वर्षों से राजस्व गाँव बनाने की माँग उठाते रहे हैं, मगर उस पर ध्यान नहीं दिया गया। ऐसे में मजबूर होकर उन्हें आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ा है। प्रदर्शन के दौरान भारी संख्या में महिलाएँ मौजूद थीं। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने आंदोलन को आगे बढ़ाएँगे। उन्होंने पार्क की प्लैटिनम जुबली मनाने का विरोध भी शुरू कर दिया है। कार्बेट पार्क से विस्थापित धारा, झिरना, कोठिरौ जैसे गाँवों को विस्थापन के पंद्रह साल बाद भी राजस्व ग्राम का दर्जा न मिलने से खफा ग्रामीण भी सरकार के रुख से आहत होकर आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।
पार्क जहाँ पर्यटन से करोड़ों रुपए की हर साल कमाई कर रहा है, वहीं स्थानीय लोगों के लिए पार्क के दुर्लभ वन्य जीव मुसीबत का सबब बने हुए हैं। ऐसे में वन महकमे और सरकार को इस चुनौती से निपटने के लिए पुख्ता बंदोबस्त करने की जरूरत महसूस की जा रही है। वरना लोगों के विरोध से पार्क प्रशासन द्वारा प्रस्तावित प्लैटिनम जुबली खटाई में पड़ सकती है।