18 नवम्बर से कपकोट तहसील के सौंग क्षेत्र के मुनार सलिंग तथा लोहारखेत के ग्रामीणों द्वारा उत्तर भारत हाइड्रो पावर कार्पोरेशन द्वारा मुनार से सलिंग लघु विद्युत परियोजना के खिलाफ चलाया जा रहा आंदोलन भीषण ठंड के बावजूद जारी है। इस आंदोलन को पेठी, चौड़ा, गासी, रिखाड़ी व हरकोट के ग्रामीणों का भी समर्थन मिला हुआ है। आंदोलनकारी ग्रामीण दिन-रात धरनास्थल पर धूनी जलाये इस परियोजना को बंद करने की माँग पर डटे हैं। इस आंदोलन में महिलाओं की खासी भागीदारी होने से प्रशासनिक अमला पशोपेश में है। कपकोट तहसील के उप जिलाधिकारी हरबीर सिंह द्वारा की जा रही आंदोलनकारियों की मानमनौवल सफल नहीं हो पाई है।
‘सरयू बचाओ हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति, लोहारखेत, पट्टी मल्ला दानपुर’ के बैनर तले आन्दोलित ग्रामीण मुनार से सलिंग तक 7.5 मीटर व्यास की सुरंग द्वारा पानी ले जाने से इस अति संवेदनशील क्षेत्र के भविष्य को लेकर भयभीत हैं। उनका कहना है कि 1957 में भूस्खलन से लोहारखेत गाँव को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। यहाँ के गाँव हर साल धँस रहे हैं। चार माह से हम इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। किसी ने हमारी नहीं सुनी तो मजबूरन हमें आन्दोलन पर उतरना पड़ा। ग्रामीणों का आरोप है कि आन्दोलन को तोड़ने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन दिये जा रहे हैं।
इस परियोजना का शुभारंभ जब पूर्व मुख्यमंत्री व कपकोट क्षेत्र के विधायक भगत सिंह कोश्यारी द्वारा किया गया तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि यहाँ की सीधी-सादी जनता अचानक आक्रामक हो उठेगी। इस आंदोलन में भाजपा कार्यकर्ताओं की भागीदारी से खुद भाजपा की स्थिति अजीब हो गई है। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहले तो हमने अपना इलाका और घर-बार बचाना है। उसके बाद ही पार्टी पॉलिटिक्स है। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष हीरा धपोला भी भूकम्पीय जोन में बन रही इस परियोजना का निर्माण बंद करने की सलाह देते हैं।
डेढ़ माह से चल रहे इस आंदोलन को तोड़ने के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं। इसी के तहत सुमगढ़ ग्राम सभा ने शुरू में इस आंदोलन को समर्थन देने के बाद अब अपने कदम पीछे कर लिये हैं। परमटी गाँव के कुछ ग्रामीण तो अब इस परियोजना को दिये गये एक पत्र में अपने को इस आन्दोलन से अलग बताने लगे हैं। इसके पीछे अनेक प्रलोभन हैं। इस परियोजना के निदेशक राजकुमार गोयल का कहना है कि प्रभावित लोगों का कम्पनी द्वारा सामूहिक बीमा कराया जायेगा। परमटी गाँव के विकास कार्यों के लिये 25 लाख रुपये दिये जायेंगे। कम्पनी स्वास्थ्य, शिक्षा व खेल के क्षेत्र में विकास कार्य करेगी। इसके लिये एक कमेटी भी गठित की जायेगी। कम्पनी ने इसी तरह के कई लुभावने आश्वासनों से इस आन्दोलन में फूट डाल दी है। एक अधिवक्ता नन्दन सिंह टाकुली ने तो योजना का समर्थन करते हुए आन्दोलन स्थल पर जल रही धूनी में आत्मदाह करने की कोशिश ही कर डाली। लोगों ने उन्हें तुरंत ही बचा लिया। इस घटना में उनके हाथ-पाँव जल गये हैं। आंदोलनकारियों से अपील करने के लिये उनका तर्क था कि इस परियोजना से इस क्षेत्र का विकास ही होगा। मगर आंदोलनकारी उनकी इस बात से कतई सहमत नहीं थे।
बहरहाल इस क्षेत्र में मुनार से सूपी के मध्य वर्षों से शांत पहाड़ पर्वतीय पावर कार्पोरेशन मिलिटेड लघु विद्युत जल परियोजना तथा प्रधान मंत्री सड़क परियोजना के चलते जगह-जगह बुरी तरह से दरकने लगा है। मानवीय छेड़छाड़ तथा विकास का दावा करने वाले चन्द ठेकेदार और इसे शह दे रहे अंधे प्रशासन के कारिन्दों की कारगुजारी के चलते मुनार से दर्जनों उच्च हिमालयी गाँवों को जोड़ने वाले वर्षों पुराने आवागमन के पैदल रास्तों का तो अस्तित्व ही गायब हो गया है। विकास के नाम पर इन पहाड़ों को पहले जम कर बारूद से छलनी किया गया और फिर सैकड़ों पेड़ों का सफाया कर रही सही कसर भी पूरी कर दी गई। इन क्षेत्रों का भयावह मंजर देख कर ही शायद अब आंदोलित ग्रामीण किसी भी बात पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
मोहन सिंह टाकुली, भवान सिंह, लोकपाल सिंह, दान सिंह, चामू सिंह, हंसा देवी, हयात सिंह, किसन सिंह, राजेन्द्र टाकुली, बलवन्त मटियानी व माधो सिंह आदि अभी तक भी आंदोलन में डटे हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, वे अपना आन्दोलन जारी रखेंगे।