कड़ाके की ठंड के बीच मल्ला दानपुर के ग्रामीण अपना नैसर्गिक हक बचाये रखने के लिये सौंग में खुले आसमान के नीचे धूनी जला कर धरने व आमरण अनशन में बैठे हैं। उनकी एक ही माँग है- उत्तर भारत हाइड्रो पावर प्रा. लि. द्वारा सरयू नदी पर बनाई जा रही जल विद्युत परियोजना निरस्त हो। ‘सरयू बचाओ हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति’ का गठन कर जब ग्रामीणों ने 18 नवम्बर 2007 से क्रमिक अनशन प्रारम्भ किया तो जिला प्रशासन व कम्पनी के बीच हड़कंप मच गया। आंदोलन तोड़ने की पुरजोर कोशिश शुरू हुई तो कई नेता व समाजसेवी कम्पनी से सौदा कर किनारे हो गये। क्षेत्र के विधायक भगत सिंह कोश्यारी ने सरयू नदी पर बन रही विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को नाक का सवाल बना दिया। उन्हें दहशत के साये में जी रहे ग्रामीणों से कोई वास्ता नहीं रहा । उल्टे वे इन आंदोलनकारियों को धमकी दे गये- योजना तो हर हाल में बनेगी, चाहे सुरंग खोद सरयू के पानी को टनल में डालने से बने या जमीन के ऊपर पाइपों द्वारा पावर हाउस तक पहुँचा कर। कुछ हद तक वे सफल भी रहे क्योंकि मुनार में परियोजना का पॉवर हाउस बन गया है और उद्घाटन की प्रतीक्षा कर रहा है। कई जगह सुरंग खोदी जा चुकी हैं और सरयू का प्रवाह रोक कर बाँध बनाने का कार्य शुरू हो गया है।
पर पूर्व मुख्यमंत्री की धमकी से भी ग्रामीण विचलित नहीं हुए हैं। निराश जरूर हुए कि जिस व्यक्ति के लिये रात-दिन भागदौड़ कर विधानसभा में भेजा, वही दुश्मन हो गया। अब रिखाड़ी, सूपी, पेठी, चौड़ा, सूड़िंग, मुनार, सलिंग-भैंसखाली, मेहलचौरा, दुलम आदि गाँवों से हर रोज 40-50 लोग धरनास्थल पर मौजूद रहते हैं, चाहे दिन हो या रात। वे बारी-बारी से अपने गाँव से आकर तिलक लगा अपने इष्ट देवता का स्मरण कर धरने पर बैठते हैं। सात जनवरी से शुरू हुए आमरण अनशन के बाद जब-तब प्रशासन कुछ आंदोलनकारियों को जबरन उठवा कर बागेश्वर जिला चिकित्सालय में भर्ती कर देता है। शुरू में आंदोलनकारियों ने अस्पताल में भी अनशन जारी रखा था, लेकिन इससे कोई दबाव न बनता देख वे अब अस्पताल से गाँव लौट जाते हैं और पुनः आंदोलन को गति देने में जुट जाते हैं। सौंग में उन्होंने फेज एक का काम पूरी तरह रोक दिया है।
इस क्षेत्र की अस्थिरता के बारे में बुजुर्ग कहते हैं बरसात के दिनों में यों ही मारे दहशत के ग्रामीण टॉर्च-लालटेन लिये रात-रात भर जगे रहते हैं कि कब कहाँ रड़-बह न जाये, उनके घर-खेत। उन्होंने तो इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा की बात की थी, स्कूलों में अध्यापकों के साथ अन्य आवश्यक सुविधायें उपलब्ध कराने की मांग की थी। संचार सुविधा से जुड़ने के लिये टावर लगाने, अस्पताल खोलने, पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की बात की थी। नेताओं ने चुनाव के दौरान वायदे भी किये थे। लेकिन अब हमें मिली है यह विनाशकारी परियोजना। सरयू के अविरल प्रवाह को रोक कर हमारे जंगल-खेत-घरों के नीचे सुरंग खोद टनल द्वारा पानी दूसरी जगह जाने से कई घराट बंद हो जायेंगे, गूलें सूख जायेंगी। श्मशान घाट को पानी नहीं मिलेगा। सुरंग खोदने से जमीन व पहाड़ स्खलित होंगे। उनके द्वारा पोसे गये पंचायती जंगल नष्ट होंगे। क्या पता, गाँव ही ध्वस्त हो जायें। ऐसा विकास हमें नहीं चाहिये। हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।
इस बीच सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा तथा राष्ट्रीय बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश सौंग जाकर ग्रामीणों को आश्वस्त कर आये हैं कि वे केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री से मिलकर उनकी समस्या को रखेंगे। रामनगर में सम्पन्न ‘नदी बचाओ सम्मेलन’ में लिये गये निर्णय की जानकारी देने ‘नदी बचाओ अभियान’ से जुड़े उत्तराखंड लोक वाहिनी के अमीनुर्रहमान व पूरन चन्द्र तिवाड़ी सौंग जाकर आंदोलनकारियों से चर्चा भी कर चुके हैं। फरवरी में ‘सरयू बचाओ, हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति’ द्वारा सौंग से बागेश्वर के बीच पदयात्रा कर जनजागरण अभियान चलाया जायेगा, जिसमें उत्तराखंड व देश के विभिन्न हिस्सों से आंदोलनकारियों व समाजसेवियों के शिरकत करने की उम्मीद है।
परियोजना को लेकर पी.यू.सी. एल.के जिलाध्यक्ष नन्दा बल्लभ भट्ट ने जिला प्रशासन से ‘सूचना के अधिकार’ के तहत कुछ सवाल पूछे थे, लेकिन प्रशासन ने जवाब देने के बजाय उनका पत्र कम्पनी को प्रेषित कर हाथ झाड़ लिये। कुछ पुराने आंदोलनकारी परियोजना को क्षेत्र के विकास के लिये उचित ठहराते हैं, मगर ज्यादातर लोग ग्रामीणों की समझ और हौसले की सराहना कर रहे हैं। आन्दोलनकारी तो आश्वस्त हैं कि उनका आंदोलन उत्तराखंड को एक नई दिशा देगा। ज्यों-ज्यों दिन बीत रहे हैं आंदोलन में गंभीरता बढ़ रही है। छोटे-छोटे स्वार्थों के लिये कम्पनी से जुड़े लोग वापस अपने साथियों के साथ आ रहे हैं। उन्हें इस विकास की सच्चाई का पता चल गया है।























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