प्रस्तुति : हिमला
भागीरथी नदी घाटी के जलग्रहण क्षेत्र में निर्माणाधीन लोहारी नागपाला तथा पाला मनेरी परियोजना की सबसे अधिक मार पाला गाँव को झेलनी पड़ रही है। गाँव के बुराड़ी व गोलाणी तोक तथा इसके चारों ओर लगभग 150 स्थानों पर छोटे-बड़े भूस्खलन प्रारम्भ हो गये हैं। दर्जनों घरों तथा प्राइमरी स्कूल में दरारें आ गयी हैं। लोगों का कहना था कि निर्माणाधीन पाला मनेरी जलविद्युत परियोजना की सुरंग निर्माण के दौरान इुए ब्लास्ट के कारण पूरा गाँव हिल गया है। ग्राम प्रधान कमल सिंह पँवार के अनुसार परियोजना के लिये बनायी गयी लगभग 400 मी. सुरंग की पैकिंग नहीं की गई है, जिसके कारण सुरंग के ऊपर स्थित पाला गाँव भविष्य में ‘सिकिंग जोन’ बनने की कगार पर है। गाँव के नीचे दोनों ओर लोहारी नागपाला तथा पाला-मनेरी परियोजना के निर्माण के कारण महत्वपूर्ण जलस्रोत सूख गया है। इस स्रोत पर पाला गाँव के 82 परिवारों की निर्भरता थी। गाँव का भूगर्भिक अध्ययन भी हुआ है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने भी अध्ययन किया है, लेकिन इनके निष्कर्षों की जानकारी ग्रामीणों को नहीं है। पाला गाँव का विस्थापन किये बगैर वहाँ के निवासियों को आपदा से राहत नहीं मिल सकती। यह क्षेत्र वर्ष 1991 के भूकम्प से अत्यधिक प्रभावित हुआ है।
गाँव के पास टकनौर रेंज के अन्तर्गत स्वारी तथा पिटारा तोक पर राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण के नाम पर अब तक 1200 हरे पेड़ों का सफाया हो चुका है तथा अन्य पेड़ों को काटने की योजना बनाई जा रही है। मार्ग की दिशा बदले जाने से हजारों छोटे-बड़े पेड़ कटने की आशंका बढ़ गयी है। ग्राम प्रधान बताते हैं कि वन विभाग वहाँ पर छपान कर चुका है। यह स्थान पिटारा तोक के नाम से जाना जाता है। पाला-मनेरी परियोजना के निर्माण में लगी उत्तराखंड जलविद्युत निगम की ओर से जानकारी मिली है कि वे किसी भी गाँव का पुनर्वास करने वाले नहीं हैं और न ही वे रोजगार दे पायेंगे। सूचना अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी के मुताबिक 480 मेगावाट की इस परियोजना में औंगी गाँव के 72, सैंज के 22, जोंकाणी के 3, भटवाणी के 41 तथा पाला के 4 परिवारों की 6.803 हैक्टेयर भूमि का अधिग्रहण धारा 4 व 6 के अंतर्गत चल रहा है। इस परियोजना के नाम पर 40.98025 रुपया वन विभाग को भी दिया गया है। परियोजना निर्माण हेतु 30 वर्षों के लिये 53.5315 हैक्टेयर वन भूमि हेतु 2.224464 करोड़ रुपये राजस्व भी जमा किया गया है। लेकिन जिन लोगों की इन वनों पर काश्त है, उनको सूचना तक नहीं मिली। गाँव के पानी के स्रोत सूख गये तथा जंगल भी दूसरों के हाथों में चला गया है। लोगों को भविष्य में घास, लकड़ी, मिलेगी भी नहीं, यह कहीं तय नहीं है।
रोजगार के नाम पर लोगों को नित नये आश्वासन दिये जा रहे हैं। स्थानीय लोगों को ठेके पर रोजगार दिया गया है। लेकिन उत्तराखंड जलविद्युत निगम के पास अभी तक कोई ऐसी नीति नहीं है कि वे स्थानीय लोगों को स्थाई रोजगार दे सकें। रोजगार पाने के लिये लोग बीच-बीच में धरना और चक्का-जाम भी करते रहते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इन जलविद्युत परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को रोजगार देने का प्राविधान ही नहीं है। उत्तराखंड जलविद्युत निगम सरकार का उपक्रम है। जब इन्हीं के पास परियोजना प्रभावितों के रोजगार की व्यवस्था नहीं है, तो निजी कम्पनियों से रोजगार की उम्मीद कैसे करें। लेकिन परियोजना निर्माण के लिये अस्थाई रोजगार वे अवश्य देते रहेंगे, ताकि लोग विरोध न करके रोजगार के इंतजार में बैठे रहें। इसके लिये कंपनियाँ क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों को आगे कर रही हैं। पाला गाँव के लोग अपने को अकेला महसूस करने लगे हैं। चारों ओर की ढालदार पहाड़ियों पर हो रहे भूस्खलन के कारण वे पुनर्वास चाहते हैं, जिसमें सुरक्षित जमीन, मकान, जंगल, पानी उन्हें वैसा ही लौटा दिया जाये जैसा उनके गाँव में है। लेकिन इसमें बाधा यह है कि इस परियोजना के कारण किसी का विस्थापन नहीं होना है। अनुसंधान एवं नियोजन विभाग के अन्तर्गत अन्य प्रस्तावित परियोजनाओं में भी कोई विस्थापन नहीं होना है। उनकी नजरों में यहाँ के निवासी सुरक्षित हैं। अतः लोग भूस्खलन से मरें या उनकी खेती छिने, इसकी कोई जिम्मेदारी सरकार की नहीं है। गाँव के एक निवासी, अनुसूचित जाति के सतरू की 4 नाली जमीन बहुत पहले परियोजना हेतु अधिगृहीत की जा चुकी है। उसका मुआवजा उसे केवल 4,000 रुपये प्रति नाली के हिसाब से मिला। आज वह भूमिहीन भी है और बेकार भी। ऐसे कई परिवार हैं जिनकी कृषि भूमि बाँध की भेंट चढ़ गयी है। उन्हें इसके बदले भूमि नहीं दी जा रही है। गाँव में महिला मंगल दल के लोग जंगलों को बचाने को दृढ़संकल्प हैं। महिला अध्यक्ष कृष्णा देवी कहती हैं कि उनकी आजीविका के तमाम प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो रहे हैं। गाँव में जगह-जगह दरारें आने से वे चिंतित हैं।
अतः भविष्य में पाला गाँव में मालपा और ऊखीमठ जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो सकती है।