सरकार माओवाद का कोई इलाज ढूँढ नहीं पाई है कि कश्मीर उबलने लगा है। सुरक्षा बलों द्वारा गोली चलाये जाने से एक के बाद एक नौजवानों की मृत्यु के बाद उपजे गुस्से ने धीरे-धीरे सारी घाटी में पैर पसार लिये हैं। अलगाववादियों द्वारा किये जाने वाले बंद के आह्वान के बाद दहशत के मारे आये दिन बाजारें सुनसान रहती हैं और पर्यटक कश्मीर जाने से कतराने लगे हैं। पर्यटन कश्मीर की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा आधार रहा है।
हमारी लोकतांत्रिक सरकारों के पास जनता के असंतोष का कोई इलाज नहीं होता, सिवा बलप्रयोग के। लाठी-गोलियाँ समस्याओं का निराकरण नहीं करतीं, इस सच्चाई को हमारी सरकारें समझने से इन्कार करती हैं। माओवाद की जड़ें आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट में निकलती हैं तो कश्मीर के अलगावाद की जड़ें लोकप्रिय नेतृत्व को दरकिनार कर बनाई गई कठपुतली सरकारों के जबर्दस्त भ्रष्टाचार में। कौन नहीं जानता कि 1948 में कश्मीर के अवाम ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया था। अब भी वहाँ आजादी की माँग भले ही हो रही हो, पाकिस्तान के साथ जाने को वहाँ के अवाम का पाँच प्रतिशत हिस्सा भी तैयार नहीं है। यह हाल में एक ब्रिटिश संस्था द्वारा किये गये सर्वेक्षण से सामने आया है। जरूरत है कि शिष्ट राजनैतिक प्रक्रिया के साथ वहाँ की जनता का दिल जीता जाये, न कि दिनोंदिन बलप्रयोग बढ़ाते हुए उसे अलगाववादियों के हवाले कर दिया जाये। आज की भू राजनीतिक स्थितियों में आजादी के क्या खतरे हैं और किस तरह कश्मीर के हित भारत के साथ बने रहने में हैं, यह बात सही तरीके से वहाँ की जनता को समझाये जाने की जरूरत है। पाकिस्तान तो कश्मीर में आग लगाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहेगा ही, क्योंकि अब यही उसके अस्तित्व का एकमेव आधार रह गया है। लेकिन सिर्फ पाकिस्तान को दोष देना तो कश्मीर की समस्या का समाधान नहीं करेगा।

























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