प्रस्तुति : हरीश फुलारा
बढ़ते प्रदूषण एवं उससे मानव जीवन पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 1980 में वन अधिनियम लागू किया गया। इसके अन्तर्गत वन भूमि पर गैर वानिकी कार्य बिना भारत सरकार की पूर्वानुमति के नहीं किये जा सकते। नीति निर्धारकों द्वारा इसका दुरुपयोग किये जाने के कारण यह अधिनियम अब पर्वतीय क्षेत्र की जनता के लिए जी का जंजाल बन कर रह गया है।
शताब्दियों पूर्व जब हमारे बुजुर्ग इन पहाड़ों में बसे, यहाँ पर उनके लिए पानी, घास लकड़ी आदि प्रचुर मात्रा में थे। तत्कालीन शासकों ने भी उन्हें जंगलों में वे सारे अधिकार दिये, जिनकी उन्हें आवश्यकता होती थी। यहाँ के लोग भी जंगलों की रक्षा अपनी निजी सम्पत्ति की तरह करते थे। तब पर्वतीय क्षेत्र में अधिकांश जंगल चौड़ी पत्ती के होते थे, जिनसे घास, लकड़ी एवं विभिन्न प्रकार के फल-फूल प्राप्त होते थे। ऐसे जंगलों से जहाँ शुद्ध हवा मिलती है, वहीं इसमें आग भी कम लगती है। बरसात का पानी रुकता है और जलस्रोत भरे रहते हैं। भूस्खलन कम होता है। जंगली जानवरों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन-पानी मिल जाता है। उस जमाने में चीड़ के जंगल बहुत कम थे। अगर कभी जंगल में आग लगती तो ग्रामीण बच्चे, बूढ़े, औरतें झुण्ड बना कर आग बुझाते थे।
समय बीतने के साथ-साथ पर्वतीय क्षेत्र में भी यातायात, चिकित्सा, शिक्षा आदि बुनियादी विकास की आवश्यकता हुई। राज्य सरकार एवं भारत सरकार द्वारा विभिन्न जन कल्याण की योजनायें स्वीकृत तो की गयीं, परन्तु उन्हें धरातल पर उतारने में वन अधिनियम सबसे अधिक बाधक बन गया है। पर्वतीय क्षेत्र की भौगौलिक स्थिति शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा भिन्न है। काश्तकार के पास अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कम से कम ढाई एकड़ कृषि भूमि होनी चाहिए। परन्तु यहाँ पर 90 प्रतिशत काश्तकारों के पास आधे एकड़ से भी कम भूमि है और वह भी अधिकांश असिंचित एवं बिखरी हुई। इसके अतिरिक्त आरक्षित, वन पंचायत एवं सिविल सोयम भूमि, जो कि कुल क्षेत्रफल का लगभग 86 प्रतिशत होता है, को वन अधिनियम के अन्तर्गत ले लिया गया है। इस भूमि में विकास कार्यो को संपादित करने हेतु भारत सरकार की पूर्वानुमति आवश्यक है। भारत सरकार के नीति निर्धारकों को न तो पर्वतीय क्षेत्र की भौगौलिक स्थिति का ज्ञान है और न ही वे यहाँ विकास होना चाहते हैं। चौड़ी पत्ती के जंगलों में विगत 30 वर्षों में चीड़ ने अपना साम्राज्य उसी प्रकार फैला लिया है, जिस प्रकार अंग्रेजों ने पूरी दुनिया में अपना साम्राज्य फैलाया था। जहाँ चीड़ होता है, वहाँ अन्य वनस्पति नहीं होती। चीड़ पानी अधिक सोखता है। चीड़ की पत्तियाँ अत्यन्त ज्वलनशील होती हैं। आज पर्वतीय क्षेत्र में हजारों एकड़ जंगल धू-धू कर जल रहे है। पशु-पक्षियों का क्रन्दन मचा है। जनता क्रोधित है।
जंगलों से हक-हकूक समाप्त होने एवं विकास कार्यों में बाधक होने से उनका इन जंगलों से मोहभंग हो रहा है। इसलिए उन्हें आग बुझाने में भी कोई रुचि नहीं है। चीड़ की पत्तियों में आग लगने से अन्य वनस्पति पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं, जिससे जंगली जानवरों के लिए भोजन समाप्त हो गया है एवं उन्होंने गाँवों की ओर रुख कर लिया है। उनके द्वारा गाँवों में फसल एवं मवेशियों को क्षति पहुँचायी जा रही है। भूस्खलन बढ़ रहा है। दूसरी ओर जमीन में गिरी चीड़ की पत्तियों के कारण धरती पानी नहीं सोख पाती और दीमक का प्रकोप बढ़ जाता है, जो जंगल में अन्य वनस्पतियों को बढ़ने नहीं देती। इन चीड़ के पेड़ों के कारण भारत सरकार द्वारा दूरस्थ ग्रामीण मोटर मार्गों के निर्माण हेतु माँगी गयी वन भूमि के प्रस्ताव निरस्त कर दिये जा रहे हैं, जबकि पूँजीपतियों एवं निजी क्षेत्र को जंगलों में रिसोर्ट बनाने एवं खड़िया आदि के खनन के लिए खूब स्वीकृतियाँ जारी की जा रही हैं। वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ों रुपये ‘कैम्प’ में जमा करा दिये गये हैं परन्तु वृक्षारोपण कहीं नहीं हो रहा है। ग्रामीण विकास कार्य ठप्प हो गये हैं।
दूरस्थ क्षेत्र के ग्रामीणों को यातायात, चिकित्सा एवं शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। यहाँ के लोगों के लिए परिवार का भरण-पोषण करने हेतु नौकरी के लिए शहरों की ओर पलायन के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में यदि भारत सरकार द्वारा विकास कार्यों के लिए अपनी नीति में परिवर्तन नहीं किया गया तो आने वाले समय में उत्तराखंड को ही नहीं, पूरे देश को इसकी बहुत अधिक कीमत चुकानी होगी।


























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