बापू साम्प्रदायिक हिंसा की लपटों को बुझाने के लिये जब नोआखाली में नंगे पाँव पदयात्रा कर रहे थे और उग्रवादी मुस्लिम कट्टरपंथी उनके रास्ते पर काँटे, काँच के टुकड़े और विष्ठा बिछा रहे थे, तब क्या उन्हें पुलिस की मदद की जरूरत पड़ी थी ?
लेकिन हम गांधी नहीं हो सकते थे, इसलिये हमें पड़ी, जब हम गृहयुद्ध में झुलस रहे छत्तीसगढ़ में ‘शांति-न्याय यात्रा’ के लिये निकले। आगे न बढ़ने की धमकियों के बावजूद जब 7 मई को हम जगदलपुर से आगे बढ़े तो स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से हथियारबन्द पुलिस की एक जीप हमारे साथ कर दी। इसके बावजूद दंतेवाड़ा से 11 किमी. पहले गीदम के तिराहे पर महंगी मोटरसाइकिलों पर आये लगभग डेढ़ दर्जन उग्र प्रदर्शनकारियों ने जब हमारी बस रोक ली तो हमारे साथ आये ये पुलिसकर्मी तमाशायी बन कर रह गये। फिर उसी तरह के नारे लगे जैसे अब तक की यात्रा में लगते आ रहे थे, ‘नक्सलियों के दलालों को, जूते मारों सालों को’! इसके साथ तरह-तरह के अश्लील फिकरे। हम लौटने ही जा रहे थे कि दंतेवाड़ा के डी.एस.पी. ने जबरन हमें रोक लिया और फिर तीन-चार जीपों, एक स्वराज माजदा और एक वज्र वाहन में ठुँसे जवानों से घिरे हुए हम दंतेवाड़ा गये। माँ दंतेश्वरी मंदिर, सी.आर.पी.एफ. के कैम्प आदि का दौरा हमने इसी तरह किया।
एक उन्माद से भरा हुआ मिला हमें छत्तीसगढ़। अखबार हमारी यात्रा की खबरों से पटे थे, भले ही नकारात्मक खबरों के साथ, मगर मुख्यमंत्री रमन सिंह से लेकर जिला स्तर के पत्रकारों और हुड़दंगी नौजवानों तक सब एक ही भाषा बोल रहे थे। पहला सवाल हमारे सामने यही रखा जाता, ‘‘दिल्ली से आने वाले आप बुद्धिजीवी उस वक्त कहाँ थे, जब सी.आर.पी.एफ. के 76 जवान मारे गये ? ये आपके रिश्तेदार होते तब आपको महसूस होता। अब आ गये हैं ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ बन्द करवाने!’’ उन्हें यह समझाने की कोशिश करना फिजूल हो रहा था कि हाँ सी.आर.पी.एफ. के जवान भी हमारे ही बच्चे हैं या कि हम नक्सली और सरकारी, दोनों तरह की हिंसा की निन्दा करते हैं।
कभी-कभी एक हिंसक भीड़ होती है, जो थोड़े समय के लिये दंगाई बन कर लूट और कत्लेआम में मुब्तिला होती है। देश के विभाजन के समय यह वक्फा थोड़ा बढ़ गया होगा। यहाँ लग रहा था कि पिछले कुछ सालों में हिंसा पूरे समाज का स्थायी भाव बन गई है। हालाँकि इस निष्कर्ष पर पहुँचना भी जल्दबाजी होगी, क्योंकि हमारे साथ बुजुर्ग केयूर भूषण भी तो थे, जो अस्सी के दशक में दो बार रायपुर से सांसद रहे, जिनसे मैंने मजाक में कहा था कि आज के हालातों में तो आप ग्राम प्रधान भी नहीं बन सकते। हैं आप की जेब में पाँच लाख रुपये पंचायत का चुनाव लड़ने के लिये ? रायपुर की प्रेस कांफ्रेंस में यही केयूर भूषण जार-जार रोते हुए चप्पलें हाथ में लेकर उग्र प्रदर्शनकारियों के सामने खड़े हो गये थे कि लो पहले मुझे मार डालो, फिर हमारे इन मेहमानों से बदसलूकी करना। यह दीगर बात थी कि दर्जा राज्यमंत्री का पद पाये उपासने नामक एक नेता के नेतृत्व में आये ये हुड़दंगी अक्सर टी.वी. चैनलों पर दिखायी दे जाने वाले स्वामी अग्निवेश और प्रो. यशपाल से ही परिचित नहीं थे। बापू की गोद में खेले, उनके सचिव महादेव देसाई के पुत्र और अब ‘गांधी कथा’ से ख्याति प्राप्त करने वाले पिच्चासी वर्षीय नारायण देसाई को वे क्या जानते ?
आर्थिक उदारीकरण की असली मलाई भले ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खा रही हों, लेकिन तरह-तरह की परियोजनाओं में सप्लाई और छोटे-मोटे निर्माण के ठेके लेने वालों का एक समूह है, जो दिल्ली से गाँव स्तर तक फैला है। सभी राजनैतिक दल ऐसे लम्पटों से भरे पड़े हैं। ग्राम पंचायतों से लेकर विधायिकाओं तक में इन्हीं का प्रभुत्व होता है। उत्तराखंड समेत सारे देश का यही राजनैतिक परिदृश्य है। सुलझे दिमाग के लोग इतने बिखरे और असंगठित होते हैं कि वे इनके समवेत कोलाहल का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसे ही लोगों से इस यात्रा में हमारा साबका पड़ा। यहाँ के बहुसंख्य आदिवासियों, जिनको एक अस्मिता देने और जल- जंगल- जमीन पर हक दिलवाने का सब्जबाग नक्सली दिखलाते हैं और ‘सलवा जुडूम’ के नाम से जिन्हें बचाने का दावा सरकार करती है, के किसी प्रतिनिधि से तो हम मिल भी नहीं पाये। इस दृष्टि से, बहुत जल्दबाजी में तय की गई यह ‘शांति-न्याय यात्रा’ अधूरी ही कही जायेगी। हालाँकि इसने हिंसा, आतंक और चुप्पी का माहौल थोड़ा ठीक किया होगा, ऐसी उम्मीद है। कुछ सप्ताह पहले दंतेवाड़ा से लौटते मेधा पाटकर, डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा और संदीप पाण्डेय के साथ ऐसे ही गुण्डों ने बहुत अधिक बदतमीजी की थी। इसके बावजूद हमारी यात्रा निकली। आगे भी ऐसी यात्रायें जारी रहेंगी तो बदलाव आयेगा। अभियान के बाद यह तय किया गया है कि अन्य इच्छुक लोगों को न्याय और शांति के इस अभियान में जोड़ा जायेगा और ऐसी पहल प.बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश तथा झारखंड में भी की जायेगी। हिन्दी तथा अन्यान्य भाषाओं में इस अभियान के उद्देश्यों के बारे में एक पर्चा प्रकाशित किया जायेगा। कुछ स्थानीय साथियों की मदद से माओवाद से प्रभावित गाँवों में जन सम्पर्क कर वहाँ के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन जगदलपुर में किया जायेगा। छत्तीसगढ़ के सारे प्राकृतिक संसाधनों और उद्योग-व्यापार के बारे में यह मालूम किया जायेगा कि इन पर किसका अधिकार है और सरकार द्वारा इस क्षेत्र में किये गये एम.ओ.यू. (अनुबंधों) के बारे जानकारी एकत्र कर उसे सार्वजनिक किया जायेगा।
उम्मीद तो करनी चाहिये कि इस गृहयुद्ध से विरत होने की सद्बुद्धि छत्तीसगढ़ के लोगों में आयेगी।
very good
with thanks