उत्तराखंड के नये मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जिस तरह से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने की बात की है, उससे एक भय पैदा हो रहा है कि बाँधों पर नयी दौड़ शुरू होगी। अभी 14 मार्च से 22 मार्च तक ‘वैश्विक बड़े बाँध विरोधी सप्ताह’ पर ‘माटू जन संगठन’ ने उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर बड़े बाँधों के विरोध में प्रदर्शन किया। अलकनंदा गंगा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध (444 मेगावाट) प्रभावितों ने पीपलकोटी शहर में जलूस निकाला और अलकनंदागंगा को स्वतंत्र रखने के लिये संघर्ष को तेज करने का संकल्प लिया। हाल ही में इस परियोजना को विश्व बैंक से कर्जा मंजूर हुआ है। 24 दिसंबर को विश्व बैंक के मिशन का भी लोगो ने 3 घंटे घेराव करके अपना विरोध प्रकट किया
टौंस घाटी में जखोल-सांकरी बांध (51 मेगावाट) प्रभावित क्षेत्र में भी बड़ा जलूस प्रदर्शन हुआ। यह क्षेत्र गोविंद पशु विहार में आता है। यहाँ लोगो के पांरम्परिक हक-हकूकों पर पाबंदी है। किन्तु बांध के लिये कोई रोक-टोक नहीं है। जखोल गाँव 2,200 मीटर की ऊँचाई पर है और भूस्खलन से प्रभावित है। बाँध की सुरंग इसके नीचे से ही प्रस्तावित है, यहाँ लोगो ने मई 2011 से टैस्टिंग सुरंग को बंद कर रखा है।
बिजली उत्पादन के लिये पर्यावरण नियमों और नदी घाटी के निवासियों के हक-हकूकों को एक तरफ करके नये बाँधों को जल्दी-जल्दी बनाने की कोशिश हो रही है, वह किसी भी तरह से उत्तराखंड के भविष्य के लिये सही नहीं है। पुराने बांधो की कमियों और उनके नुकसानों पर कोई चर्चा तक नहीं की जाती। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा किसी भी नदी में मक डालने पर पाबंदी है। मक को कहीं पर रखे जाने के लिये भी नियम मंत्रालय द्वारा दिये गये हैं। किन्तु राज्य में कहीं भी इसका पालन नहीं हो रहा है। टिहरी बाँध परियोजना जिसमें टिहरी बांध, पंप स्टोरेज प्लांट व कोटेश्वर बांध आते हैं। इनकी पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 को हुई थी, जिसमें शर्त संख्या 3.7 में भागीरथी प्रबंध प्राधिकरण बनाने के लिये थी। इस प्राधिकरण का काम पूरी घाटी के प्रबंधन का होना चाहिये। किन्तु नदी को जिस तरह कचरा फैंकने की जगह बना दिया गया है वह शर्मनाक है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्राधिकरण भी पूरी तरह जिम्मेदार है। दोनो की ओर से कोई निगरानी नहीं हो रही है। इसके लिये बाँध कंपनी टिहरी जलविद्युत निगम (टीएचडीसी) व बाँध ठेकेदारों पर कार्यवाही होनी चाहिये। किन्तु टीएचडीसी को नये बाँधों का ठेका दिया जा रहा है। विश्व बैंक ने टीएचडीसी को अलकनंदा गंगा पर विष्णुगाड़-पीपलकोटी बांध के लिये पैसा दिया है। वहाँ भी यही हाल है।
भागीरथी गंगा पर जिस लोहारीनाग-पाला बांध को रोका गया था, वहाँ पर बन चुकी सुरंग को ऐसे ही छोड़ दिया गया है। मकानों में आई दरारों, सूखे जलस्रोतो के लिये कोई उपाय नही किये गये हैं। मनेरी-भाली चरण दो में बाँध चालू होने के बाद भी जलाशय पूरा नहीं भरा जा सका। चूँकि जलाशय से नई डूब आई। डूब का क्षेत्र पहले मालूम ही नहीं था। इस बाँध की सुरंग से कितने ही गाँवों के जल स्रोत सूख गये। बाँध बनने के बाद इसका विद्युतगृह टिहरी बाँध की झील में आ रहा है। यह बताता है कि अभियांत्रिकी व सर्वे कितने गलत हैं। भागीरथी गंगा के बाँधों से अचानक पानी छोड़ने के कारण दसियों लोग डूब चुके हैं। अभी 18 फरवरी, 2012 को उत्तरकाशी में गंगा के बीच में दो बच्चे फँस गये थे। गंगा सर्दियों में तक सूखी नजर आती है। बाँध कंपनियाँ शाम को बिजली पैदा करने के लिये ही पानी छोड़ती हैं। नदी किनारे रहने वाले, नदियों के पानी से ही वंचित हो गये हैं।
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 3 नवम्बर 2011 को एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह की याचिका पर टीएचडीसी को टिहरी बांध विस्थापितों का पुनर्वास कार्य पूरा करने के लिये 102.99 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया है, जबकि सरकारें 2005 में ही पूर्ण पुनर्वास की घोषणा कर चुकी थी। अभी भी अलकनंदा पर बने पहले निजी बांध (जे.पी. कंपनी) की सुरंग से धँसे चाँई गाँव के लोगों का पुनर्वास नहीं हो पाया है।
मंदाकिनी घाटी में निर्माणाधीन सिंगोली-भटवाड़ी व फाटा-ब्योंग बाँधों की निमार्णाधीन सुरंगों से त्रस्त, अपने जंगलो की रक्षा में खड़े लोगों को जेल भेजा जा रहा है और बाँध कंपनियों की निगरानी तक नहीं है। पिंडर घाटी में जहाँ लोगों ने बाँध का विरोध किया और दो बार जन सुनवाई नही होने दी, वहाँ तीसरी बार बैरीकेड लगाकर जन सुनवाई की गई और स्थानीय प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने केंद्रीय मंत्रालय को गलत तथ्य पेश किये गये। 65 मीटर के बाँध और 200 मेगावाट के लिये प्रस्तावित श्रीनगर परियोजना में 95 मीटर का बाँध और 330 मेगावाट के लिये बन रही है। यह पर्यावरण मंत्रालय की बंद ऑखों वाली स्वीकृति प्रक्रिया का प्रमाण है।
ये सब कुछ उदाहरण मात्र है कि कैसे बाँधों से विकास के भ्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है। बड़ी जलविद्युत परियोजनायें ही रोजगार का एक मात्र साधन नहीं हैं। उत्तराखंड राज्य की परिस्थिति देखते हुये, लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिये व रोजगार के स्थायी साधन बनाने व पलायन रोकने के लिये अनेक वैकल्पिक उपाय किये जा सकते हैं।
Can I ask one thing, why is every one against Dams. We need money to Develop Uttrakhand, were will that money come from, you thing selling koda and jagor will give us this money. I don’t support Dams as such but tell me the other way to solve the problem. Its nice to hear teri dubano lagi chi: but future means to forget past. Same people who were crying for tehri are now sitting on land worth lakhs in dehradun.
I, am working in MP, and want to come back to Uttrakhand tell me were will I get Job.
दैनिक जागरण १७ जून २०१२ सम्पादकीय पृष्ठ
संत समाज और राजनीति
–आर. विक्रम सिंह
गंगा विमुक्ति अभियान के तहत संतगण का दिल्ली कूच का आ ान आश्चर्यजनक है। सरकारों को समझाने से पहले गंगा स्वच्छता के प्रति आम लोगों, देश की धर्मप्राण जनता को जागरूक किया जाए, जो उत्साह से तिथि-त्योहारों पर गंगा स्नान करने आती है। उन मोहल्लों के निवासियों को भी जागरूक करें जिनका सीवर बेरोकटोक गंगा में खुलता है। सरकारें तो सीवर सफाई की महंगी योजनाएं बना सकती हैं या कानून बना सकती है। यही उनकी सीमाएं हैं। गंगा सफाई में समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। समाज हमारे संतों का राजनीतिज्ञों की तुलना में कहीं अधिक सम्मान करता रहा है। हमारे संतों, बाबाओं, धर्मगुरुओं की प्रारंभिक चिंता तो समाज की होनी चाहिए। देखा जाए कि क्या हमारा संत समाज सामाजिक व्याधियों यथा जाति-पांत, नारी शोषण, दहेज, बाल विवाह आदि कुरीतियों के विरुद्ध क्या कभी कोई अभियान चला सका है? इस सबके बीच गंगा प्रदूषण मुक्ति के लिए संत समाज का प्रयास देर से ही सही, लेकिन स्तुत्य कदम है। पहले अनशन फिर दिल्ली कूच-इस अभियान से राजनीति की सुगंध उठ रही है, वरना गंगा की बुरी दशा तो गत पचास वर्षो से देखी जा रही थी। पिछले दिनों बेनियाबाग, वाराणसी में बड़ी संख्या में गणमान्य संत-महात्मागण गंगा संबंधी बैठक में उपस्थित हुए। सत्ताओं को तो कोसा गया, लेकिन कोई सार्थक कार्ययोजना सामने नहीं आ सकी। राजनीति से अलग हट कर गंगा-प्रदूषण की बात करें तो वहीं वाराणसी में बहुत से नाले शहर का सीवर गंगा में डालते हैं। अगर उनमें से एक नाले का भी उत्प्रवाह गंगा में जाने से रोकने के लिए हमारे संत महात्मागण वाराणसी नगर-वासियों को प्रेरित कर सकते तो सार्थकता की दिशा में कुछ तो प्रयास होता। यह भी सामने आता कि सरकारों के साथ ही गंगा प्रदूषण के दोषी तो अंतत: हम जनता जनार्दन ही हैं। चूंकि हम लोग वोटर हैं इसलिए कोई नेता तो हमें दोषी बताने से रहा। संतों को किसका भय है? वे तो नगर-नगर अलख जगाकर गंगा के अपराधियों, दोषियों को लताड़ लगा सकते थे। अब दिल्ली कूच का राजनीतिक एजेंडा किस प्रकार गंगा मुक्ति में सहायक होगा, यह समझ पाना बड़ा दुष्कर है। हमारे संतगण अगर आश्रम छोड़ राजनीति की ओर चल पड़े तो धर्म, अध्यात्म का क्या होगा? चुनावी राजनीति की कालेधन पर निर्भरता चिंता का विषय है। यह कालाधन अर्थव्यवस्था की समस्या है, अध्यात्मिक-सामाजिक समस्या नहीं है। इसका समाधान अर्थशास्ति्रयों, राजनीति विज्ञानियों एवं प्रतिबद्ध राजनीतिक चिंतकों को निकालना है। संतगण यदि राजनीतिक खेमेबंदी में आए तो जिंदाबाद के साथ उनके खिलाफ भी नारे लगेंगे। संतगण सामाजिक विसंगतियों का मुद्दा क्यों नहीं उठाते? कोई संत खड़ा होकर यह क्यों नहीं कहता कि जातिवाद का जो जहर इस राष्ट्र को नष्ट कर रहा है उसके विरुद्ध अलख जगाई जाए, जातियों के समापन का आंदोलन खड़ा कर दिया जाए। समाज में अंतरजातीय विवाहों के स्वीकार की व्यवस्था यदि धर्म नहीं देगा तो कौन देगा? गत अनेक शताब्दियों से अनेक कारणों से बहुत से सनातन धर्मावलंबी अन्य धर्मो के अनुयायी हो गए हैं, क्या हमारे साधु-संत इन लोगों की वापसी की कोई व्यवस्था देंगे? अगर आप समाज और धर्म के सवालों से नहीं जूझेगें तो फिर आपके धर्म-नेता होने का औचित्य क्या है? संपूर्ण देश में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, भारत की समस्त भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि के प्रोत्साहन का कार्य हमारे धर्म और संस्कृति के लक्ष्य क्यों नहीं बनते? अगर संत समाज धर्म, समाज के मुद्दों को छोड़ कर राजनीति की ओर उन्मुख होगा तो राजनीतिक समझौतों की बाध्यताएं उन्हें कहीं का न छोड़ेंगी। संत समाज जातिवाद के समापन का ही बीड़ा उठा ले तो यह समाज, देश की बड़ी सेवा होगी। यदि अंतरजातीय विवाहों को सामाजिक एकता की आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर धार्मिक मान्यता दी जा सके तो यह बिखर रहे समाज, राष्ट्र के सशक्तीकरण में महान् योगदान होगा। आजादी के लिए गांधी का राष्ट्र-जागरण अभियान जन आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुआ था। सामाजिक लक्ष्य, जैसे कि महिला उत्थान, दलित उत्थान, स्वदेशी का प्रसार, शिक्षा का प्रसार आदि-आदि उनके एजेंडे के महत्वपूर्ण बिंदु रहे हैं। गांधी कोई चुनावी लक्ष्य लेकर नहीं चल रहे थे। पूना पैक्ट के बाद गांधी सक्रिय राजनीति छोड़ देश भर की दलित बस्तियों में सामाजिक आंदोलन की रामधुन गाते रहे। हमने गांधी का अनशन तो पकड़ लिया, लेकिन उनके सामाजिक कार्यक्रमों को सरकारों के खाते में डाल दिया। जाग्रत संत समाज ने तो मध्यकाल के बर्बर दौर में भी जाति प्रथा के विनाश का आंदोलन चलाया था। संत सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास नानक ने विषमताओं को दूर करते हुए समाज को एकीकरण का मार्ग सुझाया। हिंदू-मुसलमानों के सहअस्तित्व के पीछे नानक, कबीर का बहुत बड़ा योगदान है। अनशन तो राजनीतिक हथियार है। कष्ट होता है जब संत समाज राजनीतिक लक्ष्यों के तहत अनशन पर बैठते हंै, मंचों से राजनीतिक व्याख्यान देते हैं। अर्थव्यवस्था से कालेधन की समाप्ति जरूरी है। इससे अधिक जरूरी हजारों वर्षो से चले आ रहे जाति-वर्णवाद का समापन है। गांधी, जयप्रकाश ने सत्ता की आकांक्षाएं नहीं पाली थीं। लोहिया, अंबेडकर सत्ता के लिए समझौतापरस्त नहीं बने। ये राजनीति में रहते हुए भी संत के समान थे। फतेहपुर सीकरी में अकबर के दरबार में बुलाए जाने पर संत हरिदास ने कहा था-भगत कौ का सिकरी सो काम.. अर्थात संतों को सत्ता से क्या लेना-देना है? अब अगर संतों ने सीकरी की राह देख ली तो यह धर्म और समाज का बड़ा दुर्भाग्य होगा। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)