ए. अग्रवाल
वर्षा तो पहले के वर्षों, अर्थात् 1960 के दशक में भी ऐसी ही होती थी। कई-कई दिनों तक वर्षा की झड़ी लगी रहती थी। लेकिन तब इतना नुकसान नहीं होता था। तब इतने साधन सड़क साफ करने के नहीं होते थे। मैनपॉवर से ही काम किया जाता था, तब भी सड़क जल्दी खोल दी जाती थी। आज तो जेसीबी की मशीनें आ गई हैं। सड़कें ज्यादा चौड़ी हो चुकी हैं, फिर भी मलबा आ जाता है तो रास्ता नहीं मिलता। 1993 में रानीखेत- हल्द्वानी रोड 19 दिन के लिये बंद हुई, लेकिन तब और इस बार की अतिवृष्टि में भी रामनगर-भवनखाल-हरड़ा रानीखेत रोड ने पहाड़ के इस हिस्से को भूखों नहीं मरने दिया। हर बार दो दिन बंद रहने के बाद रामनगर के रास्ते सप्लाई रानीखेत-अल्मोड़ा- चौखुटिया तथा गढ़वाल तक सुचारु हो गई। रामनगर रोड पहाड़वासियों के लिये वरदान साबित हुई। वर्ष 2010 में अल्मोड़ा खैरना के बीच नदी इतनी उफन गयी कि नदी किनारे के कई पहाड़ कट गये। सड़क बह गयी। छड़ा के आसपास लगभग 150 वाहन कई सप्ताह तक फँसे रहे। उस समय अल्मोड़ा तथा बागेश्वर के यातायात को वाया रानीखेत के रास्ते ने बड़ी राहत पहुँचाई।
वर्ष 2010 तथा 2011 की वर्षा की तुलना सन् 1993 से नहीं की जा सकती। 1993 में केवल 2-6 सितम्बर तक दो तगड़े झड़ पड़े, जिसने सारे पहाड़ गिरा दिये। भुजान से पातली के पास बहने वाली कुचगढ़ गाड़ का इतना विकराल रूप बुजुर्गों ने भी पहले कभी नहीं देखा था। किनारे की खेती सारी नष्ट हो गई। उस साल धरती में इतने स्रोत फूटे कि 20 दिन बाद भी नदी के दोनों पाटों के बीच पानी भरपूर बह रहा था। 1993 में जुलाय-अगस्त में बहुत कम बरसात हुई थी तथा एक दिन वर्षा होने के बाद कई-कई दिनों तक मौसम सूखा रहता था। जबकि 2010 तथा 2011 में रोज ही रिमझिम वर्षा की झड़ी लगी रही। सूर्यदेव के दर्शन दो वर्षों में जुलाय-अगस्त में कम ही हुए। 1993 तथा 2010-11 की वर्षा में यही बहुत बड़ा फर्क है। फिर 1994 से 2009 तक एक दिन की वर्षा सात दिन का सूखा जैसी स्थिति बनी रही है। उम्रदराज लोग वर्षों पहले की झड़ी वाली बरसातों को भावुक होकर याद करते हुए कहते, ‘‘अब जंगल कट गये हैं। पर्यावरण नष्ट हो गया है इसलिये अब पहले जैसी बरसात नहीं होती है।’’ 2010-11 में सतझड़ वाली स्थिति दुबारा देखी गयी। इन दो वर्षों में इतनी बरसात हुई कि लोग अब ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि बरसात न हो।
हिमालय पर बने बादल मई-जून में पूरे पहाड़ों पर बरसते हैं, जैसे उनकी ड्यूटी मई-जून तक ही सीमित हो। रात भर बिजली भी खूब चमकती हैं, लेकिन बरसते वे हिमालय के समीपवर्ती क्षेत्रों पर ही हैं। मानसून से यह वर्षा इसलिये अलग है कि हिमालय के बादल दक्षिण दिशा को बिल्कुल नहीं बढ़ते हैं। सन् 1961 से 1986 तक के वर्षों में वर्षा अपने सामान्य ढंग से होती रही। 1967 तथा 1968 में बरसात में सूर्य के दर्शन बहुत ही कम हुए। उस वर्ष माह में एक बार प्रातःकाल पूरा आसमान साफ दिखायी दिया। सन् 1987 में तथा सन् 2005 में जुलाई माह में बरसात बिल्कुल बंद रही। 1987 में अगस्त में भी काफी कम बरसात हुई तथा लगभग सूखे की स्थिति पैदा हो गई। सन् 1971 में अप्रेल माह से ही मानसून की लगातार झड़ी वाली बरसातें हुई। उस वर्ष अप्रेल से अगस्त तक वर्षा हुई। रबी की फसल किसान काट कर सुखा नहीं पाये, सारा अनाज सड़ गया। उस वर्ष मानसून जल्दी कैसे आया, बादल किस दिशा से आये ? क्या पश्चिमी विक्षोभ की लगातार सक्रियता थी ? या मानसून की प्रक्रिया थी, जो मई-जून में धरती के अत्यधिक गर्म होने पर ही प्रारम्भ होती है ? तो वह अप्रेल में ही कैसे शुरू हो सकती है ? ये सवाल आज भी मेरे लिये अनुतरित हैं। उस वर्ष सन् 1971 में एक मार्च को भारी हिमपात भी हुआ था और जिससे मौसम काफी ठंडा था।
बादल फटने की घटनायें पिछले 15 वर्षं से ही सुनने में आई हैं। उससे पहले या तो ऐसी घटनायें होती ही नहीं थी या कमजोर सूचना तंत्र के कारण उनकी खबरें हम तक नहीं पहुँचती थीं। बरसात में बादल फटने की लगातार बढ़ती घटनाओं का अध्ययन करने पर मैंने पाया कि ऐसी घटनायें या तो हिमालय के समीपवर्ती क्षेत्रों में होती हैं अथवा नदी घाटी के आसपास। रात्रि में 11 बजे से 4 बजे के मध्य ऐसा होता है, जैसे कोई छत पर रखी टंकी एकाएक फट गयी हो। 10-20 किमी के दायरे में कोई बादल एकाएक फट कर कुछ ही क्षणों में खत्म हो जाता है। इतना पानी कुछ ही मिनटों में धरती पर गिरता है कि उसके आगे रास्ते में जो कुछ भी आता है वह सब कुछ बह जाता है। कुछ ही देर बाद तबाही ही तबाही के निशान।
इन दो वर्षों की अतिवृष्टि में सड़कों पर मलबा ज्यादा आने के कारणों का मैंने अपने ढंग से अध्ययन किया। मैंने पाया कि प्रधानमंत्री सड़क योजना के कारण जगह-जगह बिछाये जा रहे सड़कों के जाल से पहाड़ कमजोर हो गये हैं। खोद कर रखा मलबा तेज वर्षा से बह कर सड़कों पर आ जाता है। 24 अगस्त 2011 को पातली के पास ऊपर खोदी गई सड़क पूरी की पूरी रानीखेत-खैरना रोड पर आ गयी। खैर जेवीसी के कारण लगभग 8 घंटे में सड़क को कामचलाऊ बना दिया गया। कलमटों पर बने मकानों के कारण पानी का प्रवाह अवरुद्ध होने से भी पहाड़ों को नुकसान पहुँचा हैं।