हर्षवर्द्धन वर्मा
हम भारत के लोग आपको अपना मत दान में देते हैं। हम भारत के लोग आपको इस मतदान के द्वारा अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप देश की सबसे बड़ी पंचायत में हमारे हित की बात करेंगे। हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप अपनी तनख्वाहें तय करने के साथ साथ हमारी उचित मजदूरी भी तय करेंगे। हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप घोटालेबाजों को सजा दिलाकर हमारा विश्वास और मजबूत करेंगे। हम भारत के लोग आप की इस बात पर विश्वास करते हैं कि आप जनसेवक ही हैं, मालिक नहीं। हम भारत के लोग विश्वास करते हैं कि आप हमारे मत का भी सम्मान करते हैं, केवल चुनावी मत का नहीं.।
हम लोगों ने आपको कभी पार्टी के नाम पर सत्ता सौंपी और कभी जाति और मजहब के नाम पर। आप में से कुछ लोग, कुछ अन्य लोगों को फासीवादी कहते हैं, कुछ को कम्यूनल और कुछ को कम्यूनिस्ट। हमने सब को मौका दिया, कुछ को केंद्र में और कुछ को राज्यों में। हमारी स्थिति तो कमोबेश वही रही, मगर हम देखते रहे कि हमारे अधिकतर प्रतिनिधियों की स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। हमें परिवर्तन के बहाव की दिशा का अंदाजा नहीं था। हमने सोचा कि सब बहावों की तरह परिवर्तन का बहाव भी ऊपर से नीचे की ओर बहता होगा। हमने धैर्य से परिवर्तन के बहाव का इन्तजार किया। इस इंतजार के दौरान हमने कई मजहबी दंगों का दंश झेला, बाढ़ों का सामना किया, सूखा झेला, गरीबी, बेरोजगारी झेली, किसानों की आत्महत्याएँ देखीं, पुलिस की बर्बरता झेली।
हमने संसद पर दो हमले देखे, बाहरी और भीतरी। बाहरी हमला आतंकवादियों ने किया। इस हमले को हमारे जवानों ने अपने सीने पर झेल लिया। भीतरी हमला आप ही लोगों ने किया। आपने संसद में नोट लहराए। दिखाया कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर पैसों का असर कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हमने सोचा कि दोषियों का नाम सामने आने पर उन्हें सजा मिलेगी। अभी तक तो नहीं मिली, न बाहरी हमलावरों को, न भीतरी। हम ट्रेनों, चौराहों, मंदिरों, गलियों में और न जाने कहाँ-कहाँ आतंकी निशाना बनते रहे। लेकिन हमने धैर्य धारण किया।
हम भारत के लोगों ने देखा कि आप लोगों ने कई घोटाले किये। शहीदों के ताबूतों की इज्जत तक आप नहीं कर पाए। उन शहीदों के नाम पर आपने मकान हथियाने की कुचेष्टा की। आपने किसानों की जमीनें पलक झपकते कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दीं। आपने विकास के नाम पर कई लोगों को बेघर कर दिया, वादा किया कि दूसरी जगह बसा देंगे पर…..
आखिर हम अपने बड़ों से ही सीखते हैं। आप हमारे रहनुमा हैं। हम भारत के लोग आपकी राह चलकर भ्रष्टाचार सीख गए। हम हर गलत या सही चीज के लिए घूस लेना-देना सीख गए। आज ऐसा समय आ गया है कि हम इस विधा में पारंगत हो गए हैं। हमारी सोच ‘सब चलता है’ हो गयी है। कोई दफ्तर का बाबू जब चार मंजिली कोठी बनाता है तो हमें आश्चर्य नहीं होता। किसी 10,000 रु. प्रतिमाह कमाने वाले के बच्चे जब नामी स्कूलों में पढ़ते हैं, तो हम कहते हैं कि बड़ी अच्छी नौकरी पा गया। हम बिजली की चोरी को अपना अधिकार समझते हैं, खाद्य सामग्री में मिलावट करते हैं, डोनेशन देकर कालेजों से डिग्रियाँ ले लेते हैं। कुल मिलाकर हमने खुद को व्यवस्थानुरूप ढाल लिया है.
ऐसी स्थिति में एक चौहत्तर साल का बूढा व्रत करता है कि वह आपको और हम भारत के बाकी लोगों को जगाएगा। वह राजधानी के बीचोंबीच बैठ जाता है। कहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करेगा। पहले लोग विश्वास, जो कि एक विलुप्तप्राय भावना बनती जा रही है, नहीं करते। जो विश्वास करते हैं, उसके समर्थन में आ खड़े होते हैं। एक आंदोलन जन्म लेने लगता है, मगर जैसा कि हमेशा से होता आया है, आपके आश्वासन पर यह आंदोलन स्थगित कर दिया जाता है।
आश्वासन खरे नहीं उतरते। अब तक सब जान गए हैं कि यह बूढ़ा आदमी हमारी फौज का जवान रह चुका है, परिवार त्याग चुका है, महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते पर चलकर समाज सेवा का काम करता है। उसके पास अपना कुछ नहीं है। वह चाहता है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाये जो भ्रष्टाचारियों से निबटने में सक्षम हो। आपने उसे गिरफ्तार कर लिया, पर उसके संकल्प को नहीं तोड़ सके। आप लोग उस नीयत पर भी रोक नहीं लगा पाए, जिसने हम भारत के लोगों का विश्वास जीत लिया। लोग विरोध में सड़कों पर उतर आये। अपने व्रत के पक्के, उस बूढ़े सिपाही ने जेल में ही अनशन शुरू किया, और हम भारत के लोगों को निर्देश दिया कि अहिंसा का साथ हमें नहीं छोड़ना है।
हम भारत के लोगों ने उनके आदेश का पालन किया, और देश के कोने-कोने में उनके समर्थन में अहिंसात्मक प्रदर्शन किया। आपने उन्हें जेल से रिहा किया, पर वो बाहर नहीं आये। दो दिन और बीतने पर जब बाहर आये तो हम भारत के लोग पलक-पाँवड़े बिछाकर उनके स्वागत के लिए तैयार थे। हर तबके के लोग। उत्सुक लोग, आशंकित लोग, आशावान लोग, व्यथित लोग। दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन 10 दिनों तक चला। आज आप लोगों ने, आशंकित होकर, सोच समझकर, प्रतिक्रियास्वरूप या जाने द्रवित होकर, सामूहिक रूप से इस बूढ़े से अपना व्रत तोड़ने की विनती की। आपने वादा किया है कि आप हम भारत के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, अपनी महापंचायत, जिसे संसद कहा जाता है, में उस बूढ़े की इच्छानुसार जल्दी से जल्दी कानून बनवायेंगे। लेकिन आपने तो कुछ समय तक गंभीरता दिखा कर फिर अगर-मगर करना शुरू कर दिया है। हम भारत के लोग क्या आप पर भरोसा करें कि आप अपनी बात पर कायम रहेंगे या कि अभी भी हमारे साथ विश्वासघात करना जारी रखेंगे….
Cartoon by: Thomas A. Kodenkandath, Ph.D.(Thommy)