बिना अध्यापकों, पुस्तकों व जर्जर भवनों वाले प्राथमिक स्कूलों में दाल-भात खाकर, किसी तरह इंटर कॉलेजों से निकलने के बाद सुनहरे भविष्य का सपना संजोये छात्र-छात्रायें जब महाविद्यालयों में प्रवेश लेते हैं तो उन्हें कैसी शिक्षा मिलती है, यह सोचने का विषय है।
उत्तराखंड बनने से पहले यहाँ 30 महाविद्यालय हुआ करते थे। स्टाफ व प्रवक्ताओं की ज्यादा कमी नहीं थी। किताबें व प्रयोगशालाओं की स्थिति भी संतोषजनक थी। नया राज्य बना और सबसे पहले सत्तारूढ़ हुई भाजपा सरकार ने 15 नये महाविद्यालय खोले, परन्तु उनके लिये जरूरी चीजों के बारे में उसका ध्यान नहीं गया। इसके बाद आयी कांग्रेस सरकार ने भाजपा के नक्शेकदम पर चलते हुए 15 और नये महाविद्यालयों को स्वीकृति दे दी, बगैर इस बात का ध्यान रखे कि इन कॉलेजों में पढ़ाने के लिये उचित स्टाफ, प्रवक्ता, किताबें कहाँ से आयेंगी। उन्हें तो बस अपने जन प्रतिनिधियों का ध्यान रहा, जिनके नाम इन महाविद्यालयों के खुलने से अपने क्षेत्र में चमक गये। अगर वास्तव में जनता का हित सोचा गया था तो क्यों नहीं पहले पुराने कॉलेजों की दशा सुधारने के बाद नये कॉलेजों को स्वीकृति दी गई ? आज स्थिति यह है कि अधिकतर नये खुले कॉलेजों में प्रवक्ता और स्टाफ तो दूर, इनमें कुछ का तो अपना भवन भी नहीं है। नये खुले महाविद्यालयों में 2006-07 के सत्र में राजकीय महाविद्यालय चकराता, प्रतापनगर, पोखार, देवप्रयाग, जखोली, थैलीसैंण, जैंती में छात्रों की संख्या 100 से भी कम रही। इसके अलावा 2006-07 में खुले नये कॉलेजों में जहाँ कुछ में संख्या 50 से कम थी तो राजकीय महाविद्यालय भिकियासैंण, गुरड़ाबाँज व नरेन्द्रनगर में यह संख्या क्रमशः 07, 05 व 02 रही। छात्रों की यह संख्या बताती है कि इन स्थानों पर कॉलेज क्षेत्रवासियों की जरूरत के आधार पर नहीं बने। यह शिक्षा के साथ मजाक के अलावा और क्या है ?
जो महाविद्यालय पहले से चल रहे हैं, उनकी ओर सरकार का ध्यान नहीं रहा। पूर्व मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र कहलाने वाले रामनगर का महाविद्यालय भी इस उपेक्षा से अछूता नहीं रहा। यहाँ भौतिक विज्ञान और गणित विभाग में प्रवक्ता ही नहीं हैं। संस्कृत विभाग भी प्रवक्ताओं की कमी झेल रहा है। जंतु विज्ञान, समाजशास्त्र, भूगोल में भी आवश्यकतानुसार प्रवक्ता नहीं हैं। बस काम चल रहा है। गृह विज्ञान में स्नातक स्तर में मान्यता मिलने के बावजूद यहाँ तीन साल बाद तक कक्षायें शुरू नहीं हो पायी हैं। प्रयोगशालाओं का हाल भी काफी बुरा है। न तो बैठने का इंतजाम है और न ही हाथ धोने की माकूल जगह। छात्रों का एकमात्र हॉस्टल भी बुरी स्थिति में है। इसकी छत क्षतिग्रस्त है तथा बरसात में छात्रों को परेशानी उठानी पड़ती है। वी.आई.पी. क्षेत्र के महाविद्यालय ऐसी हालत में हैं तो प्रदेश के बाकी महाविद्यालयों के क्या हाल होंगे। अब तो विजिटिंग प्रवक्ताओं का अनुबंध भी समाप्त हो चुका है। महाविद्यालयों की इस दशा में यहाँ पढ़ने वाले छात्रों की दिशा क्या होगी, अनुमान लगाना कठिन काम नहीं है।