होली आ गयी। हर साल आती है। इस बार जरा जल्दी आयी। मैं स्वभाव से घरघुस्सू किसम का हूँ। कोई भी त्यौहार, खास कर होली उत्सवप्रिय आदमी के लिए है। हर त्यौहार में पता नहीं मेरा मन क्यों बुझ सा जाता है। होली में तो सशंकित भी रहता हूँ। भला क्यों, नहीं समझ पाता। भाभी मैं किसी की चाह कर भी नहीं हो सकता, देवर कभी मैंने होना नहीं चाहा। बड़े फज़ीहत वाली पोस्ट है। भाभी न जाने कैसे-कैसे पोतड़े देवर से धुलवाती है, एक हल्की सी मुस्कराहट के बदले। देवर न जाने किस उम्मीद में दौड़ा-दौड़ा हलाकान हुआ जाता है। और जब होली आती है- भाभी से जरा छूट लेने का मौका….. तो भाभी ढोलक लेकर गाने लगती है- देवर अपना विवाह कर लेना, हमारा भरोसा मत करियो…..। लो जी मूड खराब। और इस जले पर नमक ये कि बुरा न मानो होली है। अबे, हम संत हैं या फरिश्ते कि जो बुरा न मानें ?
मेरी उम्र अभी इतनी नहीं हुयी जो कह सकूँ कि हमारे समय में ये होता था और वो होता था। दूध-दही बेचना लोग पाप समझते थे। घी अठन्नी सेर मिल जाता था। बड़ा सतयुग था……लेकिन तो भी मेरी देखादेखी चीजों में कई बदलाव आये हैं। मसलन ज्यादातर शादियाँ दिनदहाड़े यानी एक दिवसीय होने लगी हैं। दहेज अब काठ-कबाड़ के रूप में न मिल कर ड्राफ्ट की शक्ल में मिलता है। अतः कहने में सहूलियत रहती है कि हमने तो कुछ लिया ही नहीं। क्रिकेट मैच 20-20 होने लगा है और कंडोम का इस्तेमाल लोग उचित उद्देश्य यानी संतति निरोध के रूप में करने लगे हैं (मॉर्निंग वॉक पर जाने वाले मेरे चश्मदीद गवाह हैं)। वर्ना एक समय वह था जब यह चीज गुजिये की तरह होली में ही देखने को मिलती थी। होलियों म? इसका प्रयोग निम्न प्रकार से किया जाता- कंडोम को सेफ्टीपिन में फँसा कर उसे नजर बचा कर किसी की पीठ में टाँक दिया जाता। इस पर लोग हँस-हँस कर दोहरे हुए जाते। जिसकी पीठ में सेफ्टीपिन अटकी होती, उसे हँसी की वजह का कुछ पता ही नहीं। आदमी अगर समझदार और अनुभवी हुआ तो हँसी में शामिल होने से पहले पीठ में हाथ जरूर फिरा लेता। इसका एक और इस्तेमाल था- किसी बच्चे से जिसकी माँ जवान होती कहा जाता- ले बेटा गुब्बारा, घर जाकर फुलाना। इतना विशालकाय और आसानी से फूलने वाला गुब्बारा पाकर बच्चा सीधा घर भागता। माँ उसे देखते ही दो तमाचे जड़ती, गुब्बारा फोड़ कर फेंक देती और बच्चे के साथ खुद भी हाथ धोती। बच्चा हैरान..
पहले होली लगभग दिन भर चलती थी। होली मिलने गये लोग 4-5 बजे तक ही नींबू की झोली-भात खाने घर लौटते थे। अब अधिकांश लोग 12-1 बजे तक नहा-धो लेते हैं। होलियों में होने वाली बदतमीजियाँ कम हुई हैं। कुछ समय पहले तक भाभियाँ होली के दिन स्वयंभू देवरों की आहट पाते ही बाथरूम में खुद को बंद कर लेती थीं। सास दरवाजे पर खड़ी हो जाती कि बेटा, बहू नहा रही है। उसे परसूत की शिकायत है। डॉक्टर ने ठंड से बचने को कहा है। चलो मैं तुम्हें गुजिया खिलाती हूँ……देवर बड़ी मुश्किल से टलता था। अब भाभियाँ आसानी से मिल लेती हैं। हालाँकि निरापद अब भी नहीं हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि समय के साथ कुछ और सकारात्मक परिवर्तन समाज में होंगे, जिनके चलते भाभियाँ एक दिन गले भी मिलने लगेंगी। आमीन!
होली मतलब कि नंगों की नंगई में बौर आना। हर मोहल्ले में कुछ पर्मनेंट नंगे होते हैं जो होली के दिन सारी हदें पार कर जाते हैं। ऐसे ही एक नंग-शिरोमणि के बारे में मुझे किसी ने बताया- वह आदमी होली के दिन अपने लड़के को कंधे में बिठाता और दोनों बाप-बेटे अश्लील होलियाँ गाते हुए सारे मोहल्ले में घूमते। एक और नंगे के बारे में सुना कि वह उस दिन सचमुच ही नंगा हो जाता और बदन में बचे एक मात्र जांघिये को आपत्तिजनक हद तक नीचे खींच कर गाता- मेरो कच्छे को बढ़ गयो भार भौजी……
होलियों में चंदा मांगने का चलन लगभग खत्म हो ही गया है। पहले जो चंदा न दे या कम दे उसे गाकर इनडायरेक्ट गालियाँ दी जाती थीं। उसके बरामदे में लगा बल्ब उखाड़ने, छत में लगा एन्टीना तोड़ने, गमले खाली करने, बरामदे में रखा तखत उठा कर सड़क पर रख देने जैसे काम चंदार्थियों को करने पड़ते थे, ताकि सबक मिले, अगले साल आदमी तमीज से पेश आये, चवन्नी देकर न टरकाये।
तंबाकू के खाली डिब्बे और सुतली से बनाए जाने वाला मनुष्य बिदकाऊ यंत्र भी होलियों में अब कम ही देखने को मिलता है। इससे एक अजीब-सी लतियाये-काट खाने को झपटते कुत्ते की-सी आवाज निकलती थी कि अपनी धुन में चल रहा आदमी यूँ बिदकता जैसे उसे ततैये ने डंक मारा हो। राह चलते लोगों को छेड़ने, उन्हें शर्मिंदा करने के और भी तरीके थे- एक सिक्का कोलतार से बीच सड़क में चिपका दिया जाता। जो आदमी उसे उठाने-उखाड़ने की कोशिश करे, उसका मजाक उड़ाओ और हो सके तो दो-चार रुपया चंदा ऐंठ लो। पाँच-दस रुपये का नोट धागे से बाँध कर सड़क में डाल दिया जाता, उस धागे का दूसरा सिरा पकड़ कर एक आदमी किनारे बैठा रहता। जो कोई उस नोट को उठाने के लिए झुकता वह फौरन धागा खींच लेता। एक और भी तरीका था- एक बच्चा काँटा लेकर सड़क में खड़ा रहता, दूसरे की ड्यूटी ऊपर छज्जे में होती। नीचे वाला राह चलते आदमी की टोपी में काँटा फँसा देता, ऊपर वाला फुर्ती से डोर खींच लेता। टोपी तभी नीचे आती जब चंदा ढीला होता।
होली सिर्फ रंगों-उमंगों और आलू-गुजिया खाने का त्यौहार नहीं है। इसमें और भी कई सुभीते हैं। यह पर्व अविवाहित लड़कियों को अबीर-गुलाल से एक-दूसरे की मांग भर कर माँ-बाप तक अपनी एकसूत्रीय माँग सांकेतिक रूप से पहुँचाने का अवसर देता है- मैं आखिर कब तक डबल-ट्रिपल एम.ए. कर-करके बोर होती रहूँगी ? किसी दिन निकल गयी किसी के साथ तो फिर मत कहना….. बुजुर्ग होल्यारों पर जवान छिछोरों को नियंत्रित करने का नैतिक-स्वाभाविक दायित्व होता है। वे खुल कर नंगापन नहीं कर सकते। अतः वे राग-रागनियों और शास्त्रीय संगीत के कंधे पर हारमोनियम रख कर अपनी तमन्ना पूरी करते हैं- नथुली में उलझेंगे बाल, सिपहिया जुल्फें काहे बढ़ायीं……. ![]()
और दूसरे त्यौहारों की तरह होली का पर्व भी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अटूट अंग है। यह पर्व न जाने कब से हमारे यहाँ मनाया जा रहा है। व्यक्तिगत पसंद-नापसंद एक अलग चीज है (ज्यादातर लोग होली को पसंद ही करते हैं) तो भी हमें इसकी आदत है। देखीभाली चीज है। इसमें अस्वाभाविक सा कुछ नहीं लगता। बीच में यह भूमिका सी इसलिये कि पिछले कुछ वर्षों से होली के कुछ पहले एक और चीज आने लगी है- वैलेंटाइन डे। यह अभी सिर्फ ‘डे’ है। भविष्य में हो सकता है कि बाकायदा एक मान्यता प्राप्त पर्व का रूप ले ले। होली आगे-पीछे होती रहती है, वैलेंटाइन-डे का दिन फिक्स है। जैसे शनिदान माँगने वाले शनिवार को ही आते हैं (और शनि से ज्यादा परेशान करते हैं)। ऐसे लोगों से मैं स्टाफ कह कर बच निकलता हूँ। शकल-सूरत देख कर कंगले यकीन कर लेते हैं कि हाँ लगता तो स्टाफ का ही आदमी है। हूँ भी। वो कोढ़ी तो मैं करम कोढ़ी।
वैलंटाइन आयातित और नयी चीज है। अपने पल्ले नहीं पड़ता। नयी पीढ़ी इससे खूब परिचित है। समय और उम्र का अपना महत्व होता है, नफा-नुकसान भी। इसी का नतीजा है कि वैलेंटाइन अपनी समझ में नहीं आया। होली अपनी दमित इच्छाओं के इजहार का पर्व है- यह दिन हमें सुबह-सबेरे शराब पीने, दूसरों को धोखे से भाँग की पकौड़ियाँ खिलाने और जवान आंटी को भाभी कहने का परमिट देता है- अतः कनफैस करता हूँ कि कई बार मुझे अपने 10-15 साल पहले पैदा हो जाने का बड़ा मलाल होता है, जिसके लिये मैं अपने पिता को दोषी नहीं मानता। मेरे लिए कोई इतना बड़ा त्याग भला क्यों करे! अपने बाप से तो मैं इस किस्म के त्याग की उम्मीद हरगिज नहीं कर सकता।
वैलेंटाइन-डे पर खूब आयोजन/आडम्बर होता है। तोहफों-कार्डों का करोड़ों का कारोबार है। दिल की बात कहने के लिए बियर-वोदका पी जाती है। बात फोन पर कहनी हो तो रम भी चलती है। पार्टी-शार्टी, आउटिंग वगैरा का आयोजन होता है……. उस ओर से ना सुनने पर रफी-मुकेश को सुन कर हँसने वाली यह पीढ़ी उन्हीं के गाये दर्द भरे नग्मों की शरण लेती है- मेरा दिल अगर कोई दिल नहीं उसे मेरे सामने तोड़ दो…… और इस विराट दुख को बर्दाश्त करने के लिए पैंट में ही सू-सू कर देने की हद तक दारू पी जाने में ही अमूमन इस डे की परिणति होती है।
14 फरवरी मुझे वृक्षारोपण दिवस जैसे आडम्बरों की याद दिलाता है। साल में एक दिन हम वृक्षारोपण करते हैं। शाम तक उन पौंधों को गाय-बकरी चर जाती है। वृक्षों की याद हमें साल भर में सिर्फ एक दिन क्यों आये, जबकि अपनी हर साँस के लिये हम उन्हीं पर आश्रित हैं। इसी तरह मदर्स-डे पर हमें अपनी माँ का होना याद आने लगा है। उस दिन हम उसे फूल या चाकलेट देकर दो मिनट प्यार जता लेते हैं। बाकी साल भर वह एक रोबोट की तरह खटती है, हमें याद ही नहीं रहता कि वह हमारी माँ है। यह जानकारी हमें कैलेंडर देने लगा है!
प्यार जैसी चीज, जिसकी हमें हर पल जरूरत महसूस होती है, के लिए साल भर में एक दिन क्यों तय हो ? इसके लिए तो आदमी को हर समय राशन-पानी भर कर तैयार रहना चाहिये। और मुझ नाचीज की समझ में तो यह भी नहीं आता कि इसमें जताने-जाहिर करने वाली क्या बात है। जरूरत क्या है इसके लिये इतना आडम्बर करने की ? जो आदमी अपने बगीचे में गुलाब उगाता है, उन्हें खाद-पानी देता है, सजाता-सँवारता है जाहिर सी बात है कि उसे गुलाबों से प्यार है। इसमें अलग से समझाने-चिल्लाने-फुटनोट देने की क्या जरूरत ? इस मामले में खामोशी एक मधुर गीत है, जिसे खड़ी बोली में बयाँ करके क्या हम उसका सुर-ताल नहीं बिगाड़ देते ? अधखिली कली को नोंच कर उसे अपने कॉलर या जूड़े में खोंस लेने वालों को शायद लगता होगा कि उन्हें फूलों से बड़ा प्यार है। इसी प्रवृत्ति के लोग ना नहीं सुन पाते, लड़की का चेहरा तेजाब से जला देते हैं।
कोई भी चीज जब तक हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं बनेगी, साल में एक दिन ‘डे’ के रूप में मनायी जाती रहेगी तब तक उसका कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं मिल सकता। वृक्षारोपण के नतीजे में एक भी पेड़ अस्तित्व में नहीं आयेगा। क्या मानवीय सम्बन्ध इतने जटिल और मशीनी हो चुके हैं कि उन्हें सैल फोन और डीटीएच की तरह रिचार्ज करना पड़े ? फादर्स-डे पर हमें अपना बाप याद आये और फ्रैंडशिप-डे को दोस्ती कर ली !
अनजाने ही इंसान को पशु बनाए दे रहे हो यार ! कुत्ते को साल भर में एक खास सीजन में ही याद आता है कि मैं खाँमखाँ कुतिया से हड्डी के लिए झगड़ रहा हूँ। इसका तो एक और भी सुन्दर उपयोग है। हालाँकि जब से बेमौसमी सब्जियों की भरमार हुई है, कुत्तों को भी कई बार बेवक्त प्रयासरत देखा जाने लगा है। अब पता नहीं कुत्ता मनुष्य होने की कोशिश कर रहा है या अपने शब्दकोश की सबसे गंदी गाली इंसान को दे रहा है।
नहीं, मैं वैलेंटाइन डे पर देशी तालिबानों से कतई सहमत नहीं हूँ जो इस दिन को बर्बर तरीके से मनाते हैं। पिछले साल तो संस्कृति और परंपरा के इन स्वयंभू ठेकेदारों ने एक अटूट विश्व कीर्तिमान भी बनाया- भाई-बहन की आपस में शादी करवा कर ! और इसके विरोधस्वरूप कुछ महिलाओं ने जो ‘पिंक पैंटी’ अभियान चलाया, अपने को तो उसमें भी कुछ खास शालीनता नजर नहीं आयी। लेकिन ईंट का जवाब हजार गुना कोमल चीज से दिया गया, इसलिये शालीन भले न सही बर्बरता तो उसमें नहीं थी।
कहने का मतलब सिर्फ इतना कि 14 फरवरी अपनी समझ में नहीं आता। यह उस नयी पीढ़ी का दिन है, जो पर्स में गर्भ-निरोधक रखती है और ‘प्रेम सम्बन्धों’ में रिकॉर्ड बनाने में यकीन रखती है। यह पीढ़ी बेहद हसीन है और उतनी ही जहीन भी। जिस उम्र में हम कमीज के बटन तोड़ कर गुच्ची खेलते थे और बहती हुई नाक को नमकीन स्वाद के कारण चाट जाते थे, उस उम्र में ये बच्चे कम्प्यूटर में न जाने क्या-क्या करते रहते हैं और एटीएम मशीन को रुपया उगलने के लिए मजबूर करना जानते हैं। यह पीढ़ी एक हद तक स्वार्थी है, प्रैक्टिकल है और संवेदनाएँ इसमें जरा कम हैं। बकौल परवीन शाकिर- जुगनू को दिन के वक्त परखने की जिद करें…..।
बात शुरू हुई थी होली यानी शुद्ध देशी वैलेंटाइन ‘डेज’ से, वहीं पर खत्म करना चाहता हूँ। खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे या अंगूर खट्टे हैं के तहत मैंने नयी पीढ़ी पर दोष तो कई धर दिये लेकिन मेरे अपने मन में कितना पाप भरा है इसका एक नमूना देखिये: होलियों के दरमियान सीडी-कैसेट की दुकानों में एक होली खूब बजायी जाती है- मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रो छ……मेरा पापी मन पूछता है कि ये रंगीला देवर होलियों में ही क्यों घर आता है ? दशहरे-दिवालियों में तो कभी नहीं सुना कि घर आया है। मामला डाउटफुल लगता है। और यह भाभी इतना चहकती क्यों है..? आखिर चक्कर क्या है भाभी !