गजेन्द्र नौटियाल
सभी राजनैतिक दल मिशन 2012 की बातें और तमाशे में मशगूल हैं पर मुझे समझ नहीं आता कि ये मिशन किसके लिए है और किसका ? ऐसा समझ न आने का कारण भी है और धारणा भी। चलें पहेलियों से इतर कुछ यथार्थ को समझते हैं -
वो खेतों के बिजूके-
मेरा गाँव है सेमल्थ। टिहरी जिले का ऐसा गाँव जो 3 किलोमीटर सड़क के लिए 29 सालों से संघर्ष कर रहा है मगर अभी तक वहां सड़क नहीं पहुँची। बाकी पहाड़ों के जैसे सेमल्थ में भी 147 परिवार ग्राम पंचायत के परिवार रजिस्टर में फलते-फूलते दिखाई देते हैं मगर वास्तव में गाँव में तीन लोहार, 4 औजी और 9 सवर्ण परिवार ही वास करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से 21 वृद्ध दंपति यहाँ निवास करते हैं। कुल मिलाकर में 102 छोटे बड़े लोग हैं गाँव में। कहानी ये कि सारे खेत बंजर हैं जिनमें खूब झाडि़याँ उग आई हैं। इन झाडि़यों में जंगली जानवर कांकड़, सुअर और जंगली मुर्गों का डेरा है। गाँव के पास के सभी सिंचित खेत जैसे-तैसे आबाद तो हैं, लेकिन इनकी रक्षा करने के लिए पर्याप्त आदमी नहीं हैं। इंसानों की जगह खेतों की रखवाली करने के लिए सभी खेतों में हर चार मीटर की दूरी पर एक बिजूका (डरोंण्यां) खड़ा किया गया है। चुनिंदे इंसानों ने सैकड़ों बिजूके इस सलीके से बनाए हैं कि असली पुरुष और महिला जैसे लगते हैं। इन्हें बनाने में समय और कपड़े, लकड़ी खूब लगती है तो एक फसल खतम होने के बाद इन्हें बड़े सलीके से संभाल कर रखा जाता है, गोया ये कोई नायाब कलाकृतियाँ हों! ऐसे में सरकार के इरादों को दाद देनी होगी कि अकेले 2008-09 में यहाँ की सिंचाई गूलों पर 9 लाख खर्च कर दिए गये और हर साल 5 लाख के औसत से यहाँ चैकडैम, खड़ंजे बिछते हैं। सरकार पलायन से कितनी चिंतित है ? अभी तो बिजूके इंसानों का साथ दे रहे हैं पर जब वो भी साथ छोड़ दें तो…… राज किस पर करोगे जनाब ?
रास्ते का पत्थर-
आदि बद्री से 3 किलोमीटर ऊपर एक गाँव में सुबह-सबेरे दो शिक्षकों की तू-तू, मैं-मैं हो रही थी। सुनने वालों को मुद्दा सुनाई देता था ‘रास्ते का पत्थर’। पर ये रास्ते का पत्थर क्यों गुरुजी लोगों का रोड़ा बना है, किसी की समझ में नहीं आ रहा था। बस कुछ चुगलेर कानों पर जोर दे कर सुनते रहे तो कहानी कुछ यूँ सामने आई। इस दूर-दराज स्कूल में 40 बच्चे हैं और गुरुजी सरकार की मेहरबानी से 2 की संख्या में नियुक्त हैं। अब दोनों एक साथ पढ़ाई कराने का अनर्थ करें ये कैसे संभव था ? वैसे भी बेचारों की तनख्वाह सरकार ने छठे वेतनमान में मात्र 30 हजार प्रति शिक्षक ही कर रखी है। तो इन्होंने अपने समय के सदुपयोग का नायाब तरीका ये निकाला कि गाँव की तरफ जाने वाले रास्ते तक दोनों गुरुजी जरूर जायेंगे और आगे जिसको फुरसत हैं वो जायेगा तो एक पत्थर नियत जगह पर रख लेगा। बाद में जाने वाले को अगर पत्थर दिखा तो वापिस अपने घर की राह पकड़ लेगा और अपने समय का सदुपयोग घर में या बाजार में ताश वगैरा-वगैरा खेलने में करेगा। उस दिन हुआ यह था कि नियत जगह का पत्थर किसी राहगीर ने ऐसे ही रोड़ा समझकर फेंक दिया था। उसे क्या पता था कि ये दूसरे का रोड़ा बन जायेगा। रोड़ा तो शिक्षकों की कमी और फिर जहाँ पर्याप्त हैं वहाँ इस तरह की व्यवस्थाओं की है हमारे बच्चों की शिक्षा में तो भाई मिशन में ये भी शामिल है या ऐसे ही शामिल रहेगा ?
बेचारों के सर किराये का डंडा-
कड़क मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी जी आपके नाम बेचारों का ये संदेश! आपने तो ओवरलोडिंग नियंत्रण को टैक्सी की अगाड़ी सीट में एक डंडा लगाया था। वो बीच में गायब रहने के बाद आपके प्रकट होने पर पुनः स्थापित कर दिया। लेकिन सदियों से चला आ रहा मनमाने किराये का डंडा हम बेचारों के सर पर आज भी पड़ता है। जैसे ही भूस्खलन से सड़कें खराब होती हैं या शादी-ब्याह में टैक्सियाँ बुक हो जाती हैं या यात्रा सीजन चल पड़ता है तो हम बेचारे मुसाफिरों को दुगुना-तिगुना किराया देना पड़ता है और खास कर के छोटे रुट पर। आपके पुलिस और आरटीओ वाले ओवरलोड या कागज पूरे होने की तो जाँच करते हैं पर इस बहाने अपनी कमाई का ख्याल रखते हुए वो ड्राइवर से कभी नहीं पूछते कि किराया क्या ले या दे रहे हो। जिसकी जेब भरी है वो तो दे दे पर जिनकी खाली है वो क्या करते होंगे ? जरा गौर करना….! बड़े पत्रकारों के लिए तो बड़े मुद्दे हैं पर हम सड़क छाप पत्रकारों को तो बेचारों का यही बड़ा मुद्दा है..
और अंत में आपदा प्रबंधन-
हमारे नौनिहाल में भूस्खलन से मरे और हर साल मर ही रहे हैं। भूकम्प भी यहाँ आना ही है, वनाग्नि भी होनी ही है। हम हर साल मर रहे हैं पर किसको चिंता है। ये है उत्तराखंड के सभी जिलों की बाल पत्रकारों के द्वारा हाल ही में किए गये आपदा प्रबंधन की रिपोर्ट के अंश। उमंग कार्यक्रम से जुड़े राज्य के 3250 बाल पत्रकारों ने 140 स्कूलों में पाया कि वहाँ भवन भूकंपरोधी नहीं हैं। 90 फीसदी गुरुजी को नहीं पता कि प्राकृतिक आपदा से कैसे बचेंगे ? गाँव की स्कूल प्रबंधन समिति तो गठित है पर भूकम्प अवरोधी स्कूल भवन किसे कहते हैं और कैसे बनाते हैं इसकी किसी को जानकारी नहीं है। इससे भी चैंकाने वाली बात यह कि जिले स्तर पर आपदा प्रबंधन के सेवन डेस्क के अधिकारी अपने कागजों में सभी शिक्षकों और प्रबंध समिति के सदस्यों का पूरा प्रशिक्षण होना कागजों के हवाले से बता गये पर गाँव में तो लोगों को किसी प्रशिक्षण का पता ही नहीं है। फिर करोड़ों के प्रशिक्षण और व्यवस्थाओं का क्या हुआ ?
रिपोर्ट में और भी कई तथ्य हैं जिन पर शायद ही मिशनखोरों का ध्यान जाए पर बच्चे हैं कि खोद-खोद कर सच्चाई लाये हैं सामने।