पत्रकारिता में आज दो तरह के लोग हैं। एक वे जो कुछ करना चाहते हैं और लगातार खबरों की खोज में रहते हैं। जनहित के सवालों और मुद्दों को उठाते हैं। आम आदमी के संघर्षों में उसके साथ खड़े रहते हैं। दूसरे वे लोग हैं जो खबरों की खोज में नहीं रहते बल्कि खबरों को गढ़ लेते हैं। ऐसे लोगों की जेब में हमेशा दो-चार खबरें रहती हैं, जो जरूरत के हिसाब से प्रकाशित और प्रसारित होती हैं।
पहली तरह के लोगों के कारण ही पत्रकारिता बची है। दूसरी तरह के लोगों के कारण पत्रकारिता पर हमेशा सवाल उठते हैं। ऐसे लोग खबरों को खबरों की तरह नहीं, बल्कि एक ‘जुगाड़’ की तरह देखते हैं। यह देखते हैं कि फलाँ खबर से कितना पैसा बनाया जा सकता है ? फिर यह खेल ब्लैकमेलिंग तक पहुँच जाता है। गत 8 मार्च को रुद्रपुर में ऐसे ही दो कथित पत्रकारों को एक डॉक्टर से वसूली किए जाने के आरोप में जेल भेज दिया गया।
खुद को न्यूज चैनल ‘यो’ का पत्रकार बताने वाले सतपाल सिंह निवासी किच्छा तथा हेमन्त जैन निवासी रुद्रपुर पर खेड़ा, रुद्रपुर के डॉक्टर देवकी नन्दन यादव ने आरोप लगाया कि ये लोग उनके ऊपर अवैध रूप से गर्भपात करने का आरोप लगाकर 50 हजार रुपयों की माँग कर रहे थे और धमकी दे रहे थे यदि रुपया नहीं दिया गया तो इस सम्बन्ध में समाचार प्रसारित करवा देंगे। डॉ. यादव ने इन्हें अपने क्लीनिक में बुलवा लिया और रुपए लाने का बहाना कर, दोनों युवकों को कमरे में बन्द कर पुलिस को सूचित कर दिया। पुलिस ने रंगदारी माँगने के आरोप में दोनों को गिरफ्तार कर लिया। उनका ईश्वरी कॉलोनी (रुद्रपुर) स्थित कार्यालय भी सील कर दिया गया। पुलिस के अनुसार उनके कार्यालय से कुछ अश्लील क्लीपिंग भी बरामद हुई। सतपाल पर पैसे माँगने का आरोप नगर के एक होटल मालिक राकेश श्रीधर ने भी लगाया है। यादव ने इन दो युवकों के साथ एक अन्य युवक रंजीत के खिलाफ रंगदारी माँगने की रिपोर्ट दर्ज करवाई है। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहाँ से उन्हें चौदह दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। डॉक्टर के आरोपों के विपरीत सतपाल का कहना है कि एक खबर के बारे में वह डॉक्टर का बयान लेने गया था और उन्हें साजिश के तहत फँसा दिया गया। सवाल यह है कि यदि कोई पत्रकार किसी खबर के बारे में प्रतिक्रिया जानना चाहता है तो सामने वाला उसे क्यों फँसाएगा ? यदि डॉक्टर बयान देने में कोई आनाकानी कर रहा था तो बिना उसकी प्रतिक्रिया लिए, यह कहते हुए कि सम्बन्धित व्यक्ति ने प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया, भी खबर को प्रकाशित किया जा सकता था।
दरअसल आज अधिसंख्य लोग जनसरोकारों के लिए नहीं, बल्कि ग्लैमर के लिए पत्रकारिता में आ रहे हैं। कुछ बड़े अखबारों व चैनलों के स्थायी संवाददाताओं और सम्पादकीय टीम के सदस्यों को छोड़ दें तो आज भी अधिकांश अखबारों, चैनलों के छोटे-छोटे शहरों, कस्बों में नियुक्त पत्रकारों को ठीक-ठाक वेतन नहीं मिलता। कागजों में ये लोग अंशकालिक दिखाये जाते हैं, लेकिन काम इनसे लिया जाता है पूर्णकालिक। का। आय के स्रोत तलाशने का कार्य भी इन्हें करना होता है। पत्रकारिता के ग्लैमर की दुनिया का असलियत इन्हें कुछ समय बाद ही समझ में आ पाती है। मगर कई स्थानों पर उसको जो कथित ‘सम्मान’ मिलता है और कुछ हद तक कई मामलों में उसकी जब ‘चलती’ है तो वह चाह कर भी पत्रकारिता से किनारा नहीं कर पाता। नेताओं, अधिकारियों या व्यवसायियों से उसकी नजदीकी इसी पत्रकारिता के कारण हो जाती है। यही उसे पथभ्रष्ट भी करती है, क्योंकि वह अपनी पत्रकारिता का उपयोग इन ‘नजदीकियों’ को बचाने में करने लगता है। इसके एवज में वह ऐसे लोगों से किसी न किसी रूप में उपकृत भी होता है, ताकि फिर आगे वह उनके ‘काम’ आए।
इस कड़वे सच को देख, समझ और भोग कर वह नया पत्रकार पत्रकारिता को रौब और पैसा कमाने के साधन के रूप में देखने लगता है। जब उसके सामने किसी गैर-कानूनी कार्य की जानकारी आती है तो वह पहली नजर में उसमें पैसा ‘बनाने’ की सोचता है। ऐसे मामलों में बात तब बिगड़ती है जब सामने वाला भी उतना ही प्रभावशाली हो, साथ ही उसकी सेटिंग भी ऊपर से नीचे तक हो। लिखने व प्रसारित करने की बजाय पैसा बनाने वाले पत्रकार को जब इसकी जानकारी नहीं होती और वह अपने ‘वजन’ से ज्यादा मुँह खोलता है तो रुद्रपुर जैसा काण्ड सामने आता है। डॉक्टर यादव गैर कानूनी गर्भपात करता था या नहीं, यह तो ईमानदारी से जाँच का विषय है, लेकिन पुलिस ने डॉक्टर की तहरीर पर तीन कथित पत्रकारों को गिरफ्तार कर रंगदारी का मामला बना दिया। लेकिन इस घटना का असली सच सामने आना अभी बाकी है। इस तरह की कथित रंगदारी के कारण पत्रकारिता के गिरते स्तर को बचाने के लिए यह जरूरी है कि पत्रकारिता की एक निश्चित आचार संहिता बने।
patrakarita main bhi rajneeti havi ho gayi hai press club ke pado par jugaru log kabij hain jo achche wo imandar logon ko aage nahi aane dena chate hain aaise main patrakarita ki durgati to honi hai.kewal naye patrakar he galat hain ye soch sahi nahi hai .balki kuch purane patrakar bhi aise hain jinka aham patrakarita ki jaron main maththa dalne ka kam kar raha hai .
dinesh tiwari
khatima
बिल्कुल सही कहना है आपका . आज पत्रकारिता मात्र रौब दिखाने और पैसा बनाने का साधन बन गई है ,अपने नेता को खुश करने का साधन बन गई है ,ताकि विधायक निधि बन सके . उदाहरण के लिये जैँती अल्मोडा के पत्रकारोँ को ले लीजिये यहाँ की राजनैतिक गतिविधियोँ की जानकारी एक अखबार मेँ होती है तो दूसरे मेँ नही। विधायक के मन की लिखो तो वाह वाही नही तो सार्वजनिक मँच से पत्रकार को कोसते हैँ
आप बिलकुल सही फरमा रहे हैं कुछ लोगों को तो पत्रकारिता की समझ भी नहीं होती है, केवल रोब झाड़ने की लिए पत्रकार की पट्टी लगा लेते हैं।
आनन्द सिंह राणा,
मसूरी