प्रस्तुति : गजेन्द्र नौटियाल
उत्तराखंड में विकास दर 9 फीसदी से ज्यादा हो गई है और राज्य के जंगल विश्व की 11 फीसदी से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन को सोखने में सक्षम हैं। ये दो बातें हैं जिस पर हमारे प्रदेश के मुखिया और नौकरशाह खूब इतरा रहे हैं। दोनों का यहाँ की जनता से कोई वास्ता नहीं है लेकिन इस इतराहट की अकुलाहट पर खासी बहस जनता और इस राज्य के हितैषियों को करने की जरूरत जरूर है।
राज्य बने हुए 9 साल से ज्यादा का वक्त हो गया जिसमें ज्यादा समय भाजपा शासन का है तो कम समय ही सही कांग्रेस का भी है। यहाँ इनके शासन के दिन गिनने से ज्यादा यह चर्चा महत्वपूर्ण है कि हमाम में नंगे ये शहंशाह ही हैं जिनके कारण हमारा प्रदेश मुट्ठी भर लोगों को 9 फीसदी की विकास दर का तोहफा दे जाता है और आम जनता को निकम्मा बना जाता है या अपंग-असहाय।
प्रदेश में क्या विकास हुआ इस पर बहस करने के बजाय सत्तासीन जब कहते हैं कि हमने नौ फीसद से ज्यादा विकास दर अर्जित कर ली है तो संशय का माद्दा और बलवती हो उठता है। किसने विकास किया-गाँव के आम आदमी ने या यहाँ की संपदा के लुटेरों ने। और यह भी कि वो विकास का आधार जो धन है कहाँ उपयोग हो रहा है और किसके लिए।
पहले विकास की बात करें। अब तक सरकार ने 250 से बढ़ा कर सभी प्रमुख नदियों पर 558 बाँध बनाने का प्रमुख प्रयास किया है। इन बाँधों में से मात्र एक बाँध है जो यहाँ के मूल निवासी के पास है जिला टिहरी में बाल गंगा घाटी पर। शेष जितने बाँध बन रहे हैं वे सबके सब बाहरी कंपनियों के हैं। इन कंपनियों को सरकारी भूमि के अलावा प्रदेश में मात्र 47 परियोजनाओं के लिए 1 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि लीज पर दे दी है। सरकार कहती है कि निजी कंपनियाँ 35 वर्ष तक योजनाओं को चलायेंगी और उसके बाद सरकार को सौंप देगी। यह बात सच मानें तो वन भूमि वापिसी की कोई गारंटी नहीं क्योंकि निर्माण के 8-10 वर्ष और जोड़ दें तो इन कंपनियों के पास वन भूमि 45 वर्ष तक रह चुकी होगी और कानूनी पेंच फंसा कर ये इसे हड़प चुके होंगे। इसी तरह सरकार पर्यटन विकास और औद्योगिक विकास की हवा में मार्च 2007 तक 9776.47 हेक्टिेयर वन भूमि को भू माफियाओं के हाथ गंवा चुकी है। उसमें औली स्कीइंग स्लोप से लेकर कार्बेट रिजर्व जैसे अति संवेदनशील वन क्षेत्र भी शामिल हैं। प्रदेश में भले ही 68 प्रतिशत वन क्षेत्र हों पर यहाँ मात्र 34 फीसदी ही जंगल बचे हैं। ऐसे में वन भूमि और वन दोनों की शामत सरकार ला रही है जिससे जनता का सीधा वास्ता है। इस बंदरबाँट विकास में लोगों के घराट, चरागाह, मुर्दाघाट और सैकड़ों हैक्टिेयर जमीन मुवावजे के नाम पर भेंट की गई है।
अब यथार्थ में तिलोथ गाँव को ही देखें- कहते हैं कि यहाँ जिला उत्तरकाशी की सबसे ज्यादा तिल और दलहन उत्पादन की 2 सौ एकड़ जमीन थी जिसे मनेरी भाली द्वितीय चरण के लिए सरकार ने कब्जा लिया। जब तक मुआवजे की राशि थी तब तक यहाँ के लोगों ने अपने सभी तरह के अरमान कुछ ही सालों में पूरे कर लिए और आज जब तिलोथ के तिलों का वो मुआवजा खत्म हो गया तो गाँव के लोग या तो पलायन कर गये हैं या मजदूरी कर पेट पाल रहे हैं। इसी तरह लोहारी पाला परियोजना से राजमा बेल्ट कहे जाने वाले गांव सुखी तिहार, कुंजन के लोग अब राजमा नहीं घोड़े-खच्चर से कथित साहसिक पर्यटन में रोजगार कमा रहे हैं या बोझी (पोर्टर) बन गये हैं।
टिहरी के एक ग्राम स्तर के जन प्रतिनिधि टिप्पणी करते हैं कि गाँव में तो चोकर बचा है आटा तो गाँव छोड़ कर चला गया है। पूरे पर्वतीय क्षेत्र में लोग गाँवों को छोड़कर कस्बों या शहरों का रुख कर रहे हैं। इन्ही कस्बों से गाँव की राजनीति चलती है और विवशता में गाँवों में रह रहे लोग अपने छोटे से छोटे हितों के चक्कर में अपने विकास के साथ हर तरह का समझौता कर रहे हैं। गांवों के पनघट पर पानी नहीं है और खेतों में हरियाली पर लाखों की योजनाएँ इन्हीं दो कामों के लिए कथित खाल-चाल योजनाओं पर लग गये हैं। जल संभरण क्षे़त्रो के बजाय ‘निरभगि’ कहीं भी खोद ‘धूंण’ कर धन बर्बाद कर रहे हैं और ठेकेदार और अधिकारियों की जेब और तिजोरी का ‘वजन’ बढ़ा रहे हैं। भई इनको कौन और कैसे समझाये कि ‘निहोण्या-निरपांज्यों’ प्रदेश की विकास दर बढ़ा रहे हो पर ‘अपना घर फूँक तमाशा’ तुम क्यों बना रहे हो।
जनगणना 2001 के अनुसार 18 वर्ष तक के बच्चे और युवाओं की संख्या 48 प्रतिशत दर्ज हुई है और इसमें 15-25 सी का आंकलन हो तो 60 फीसदी युवाओं का यह प्रदेश आज तक इस बड़ी उर्जावान फौज के लिए न तो कोई नीति बना पाया है ना ही कोई व्यवस्था कर पाया है। यह तबका राजनेताओं का फिछलग्गू बन रहा है। बाँध निर्माण यहाँ 558 या तो बन रहे हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं। और इससे कहीं ज्यादा विदेशी शराब की सरकारी दुकानें हैं। इन सरकारी ‘मंदिरों’ के पास ही महाविद्यालय भी थोक के भाव स्थापित हैं जो युवा ऊर्जा को बेजा बरबादी की गर्त में ढकेलने के उपक्रम साबित हो रहे हैं। छात्र संघ चुनाव में विजयी युवाओं को बिना मांगे शराब की गंगा में नहाने का बहाना बाँध और मदिरालय दे देते हैं। यही आदत आगे कुछ इस तरह परवान चढ़ती है कि हर त्यौहार पर युवा छात्र मदिरालयों से फोकट की शराब गटकते हैं और बाँधों में ठेके लेकर अपने ही गाँव, अपने चरागाह, नहर, खेत और मरघट तक बेच देते हैं। इस क्रांतिकारी काम में कस्बे के महारथी नेता उनके कंधे से कंधा मिलाते दिखते हैं। मैने देखा है गैरसैंण जैसे बाँध विहीन कस्बे में भी छात्र नेता नव वर्ष पर शराब के अड्डे वाले से नशा कर नशा बोतल में वसूलते हैं और ताज्जुब ये कि वही शराब ब्यापारी कहता है कि ज्यादा नहीं दे सकता, अभी तो आपके शहर के और ‘महान नेता’ भी आयेंगे, मेरी जितनी बिक्री होगी उससे ज्यादा तो आज बाँटनी पड़ेगी।
ऐसा ही एक वाकया एक पत्रकार संगठन की बैठक का है। दिन भर बाँध से हुए अपने गाँव-मुलुक की लूट पर बहस होती रही और सायं जब पेट पूजा की बात आई तो पता चला कि एक बाँध निर्माण कंपनी ने उत्तम भोज की और नजदीकी किसी शराब के ब्यापारी ने पीने की व्यवस्था की थी। पत्रकार संघ के अध्यक्ष और कुछ साथी तो चलते बने पर कुछ खाँटी पत्रकार चटकारे ले कर भोज का आनन्द लेते रहे। वहीं कुछ नये पत्रकार किंकर्तब्य विमूढ़ हो न भोज का आनंद ले सके ना ही अपने पत्रकार होने का अर्थ समझ पाये।
ये दोनो उदाहरण छोटे नमूने भर हैं, इसी मानसिकता को पनपाया जा रहा है। विकल्प कुछ नहीं है। बस कुछ नेताओं और इज़ारेदारों के इशारे पर वो ऊर्जा जाया हो रही है जिससे प्रदेश का कायाकल्प हो सकता था। ![]()
वन बढ़ रहे हैं और उनकी कार्बन उत्सर्जन को सोखने की ताकत भी बढ़ी है। बिल्कुल सही आंकलन है क्योंकि गाँव तो बंजर पड़ गये हैं और खेत भी जंगल उगा रहे हैं तो स्थिति ऐसे ही होनी है। ताज्जुब़ इस बात का कि इस सच को बताते तथा इस पर ताल ठोंकते नेता-अफसरों को शर्म भी नहीं आती। शर्म तो गांव के वाशिन्दों को भी नहीं आती। टिहरी जिले का एक सेमल्थ गांव है। पिछले वर्ष यहाँ वनाग्नि में कुछ छानियाँ जलकर खाक हो गई और हमारे पत्रकार मित्रों की अज्ञानता के कारण इन छानियों के मुआवजे का खूब हो हल्ला उछला। गाँव में जहाँ छाने जले उन पर एक दशक से कोई रहता नहीं, खेत बंजर पड़े हैं जहाँ जंगली जानवरों का डेरा जीता जागता चिड़ियाघर मौजूद है। इसी गाँव में 9 लाख की नहरें बनी और ठेकेदारी को लेकर पूरे गाँव में खूब हो हल्ला हुआ। दरअसल गाँव के गधेरे के मूल पर बादल फटा या कहें इन चालाक लोगों और विकास अधिकारियों के भाग का छींका टूटा और जंगल-जल स्रोतों की सुध लेने के बजाय 9 लाख की नहरें बन गईं जिन पर एक बूंद पानी नहीं आता, गधेरा सूखा है गाँव में पानी के लिए हाहाकार है और इसकी परवाह किये बगैर गाँव तक सड़क का निर्माण हो रहा है ताकि लोगों को पलायन करने में कोई दिक्कत न हो।
पूरे गढ़वाल और कुमाऊँ मंडल में पहाड़ और भू आकृतियों में भले कोई साम्य न हो पर एक साम्य है- सभी जगह निर्माण कार्य सूखी धार पर नहरें, खाल-चाल की जगह कुंए, सूखे गधेरों पर पुल, बंजर होते गाँवों के लिए सड़कों का निर्माण, आबादी से दूर बने महिला प्रसूती गृह और न जाने क्या-क्या इन सब में समानता है। और इस महान कार्य को करने और करवाने वाले सभी इसी देव भूमि के देवदूत हैं, वहीं के निवासी जो ‘घर फूक’ की आदत से अपने भविष्य को फूँकने पर तुले हैं। कल की चिंता न बुजर्गों को है न नौजवान पीढ़ी की चिंता का विषय, वो पीढ़ी जो लुटे-पिटे पहाड़ में अपना जीवन बिताने को तैयार हो रहे हैं।
भई दिल तो और भी खरी खोटी बयाँ करने को करता है पर शायद ये ‘डोज’ एक ही बार में साइड इफेक्ट कर देगी इस अंक में। इस आशा के साथ कि मेरे मुलुक का नौजवान जरूर जागेगा और पथ भ्रष्ट हो रहे अपने बड़े बुजर्गों का विनाश रथ जरूर रोकेगा और मेरे गाँव-मुलुक के बड़े-बुजुर्ग भी जरा ठिठक कर अपने इतिहास को याद करेंगे कि किस तरह से हमारे पूर्वजों ने पहाड़ों को काट कर जीवन को जीने लायक बनाया था और देव संस्कृति को देश-दुनिया को दे कर वसुधैव कुटंबकम की कल्पना की थी।