उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह द्वारा 27 प्रतिशत आरक्षण उत्तराखंड पर बलात थोपने के कारण 1994 में जन आंदोलन पृथक राज्य के लिये ज्यादा उग्र हुआ। 42 से अधिक लोगों के शहीद व हजारों लोगों के जेल जाने तथा महिलाओं पर मुजफ्फरनगर में ज्यादतियाँ होने के फलस्वरूप 2000 में पृथक राज्य बना। उ.प्र. के 20 विधायकों को उत्तराखंड में राज करने का मौका मिला। भाजपा की बल्ले-बल्ले हुई। उत्तराखंड की अपनी विधान सभा के लिये 22 विधायकों से 70 विधायकों को रोजगार मिला। पूर्व में रोजगार के जो दरवाज़े थे, वे बंद कर दिये गये। बेरोजगार हाथ मलते रह गये। पलायन रुकने की बजाय ज्यादा लोगों को दिल्ली, लखनऊ व अन्य बड़े शहरों में बर्तन माँजने की नौकरी भी नहीं मिली। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:-
1. लोनिवि की सड़कों में गैंग कुली का रोजगार छीन कर सत्ता में बैठे विधायकों ने मस्टररोल प्रथा बंद कर अपने चहेते ठेकेदारों को काम देकर अपना वोट बैंक पुख्ता किया। पूर्व में लोनिवि की सड़कों में 15 किमी पर एक गैंग मेट व 10 श्रमिक हुआ करते थे। अब मात्र दो या तीन गैंग कुली मात्र रह गये हैं। सड़क में गड्ढे नहीं, गड्ढों में सड़क है। दुर्घटना होने पर सरकार मृतकों के आश्रितों को लाख दो लाख मुआवजा देती है।
2. जिला पंचायतों द्वारा ब्रिटिश काल से नियुक्त गैंग कुलियों का नामोनिशान मिटा दिया, जिसमें आरक्षित लोगों को आसानी से गैंग कुली में रोजगार मिलता था।
3. प्रजनन उद्यान में 12 से 14 लोगों को डेली वेज पर रखा जाता था, किन्तु आज लगभग पूरे उत्तराखंड के 5 हजार से अधिक प्रजनन उद्यान बंद कर वह भूमि 25 साल के लिये अपने चहेतों को लीज़ पर दे दिये गये हैं। इन प्रजनन उद्यानों से गरीब जनता सस्ते में फलदार पेड़ लगाती थी, जो अब बंद है। ![]()
4. उद्योग धंधों के नाम पर भाजपा व कांग्रेस के मुख्य मंत्रियों ने मैदानी क्षेत्र रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार में भूमाफिया को कौड़ियों के भाव जमीन देकर जो कल-कारखाने खुलवाये, उनमें उत्तराखंड की जनता को 70 प्रतिशत नौकरी देने का वायदा किया, उसका हस्र जगज़ाहिर है। रात-दिन श्रमिक आंदोलनों से पता लग रहा है। यह उत्तराखंड की जनता का दुर्भाग्य है कि यहाँ कोई राजनैतिक दल ईमानदार नहीं है। काँग्रेस के बाद भाजपा व भाजपा के बाद काँग्रेस, क्षेत्रीय ने जो धोखा यहाँ की जनता को दिया उसी के फलस्वरूप राष्ट्रीय पार्टियाँ इस उत्तराखंड को लूट रही हैं, चाहे वे जलविद्युत के नाम पर या कल-कारखानों के नाम पर दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं व उनके पिछलग्गू लाल बत्ती धारकों ने अपने सात पुश्तों के लिये कफन जोड़ दिये हैं।
5. केन्द्र द्वारा चालित नरेगा का पूरे देश में व हर प्रान्त जिला व खंड विकासों के द्वारा किए कार्य व पंजीकृत व बेरोजगारों की गहराई से जाँच की जाये तो भ्रष्टाचार का पुलिन्दा जो खुलेगा उसकी कोई मिसाल नहीं मिलेगी। नरेगा से जो सूखे खाल (बरसाती पानी को रोकने के लिये) बन रहे हैं उनका कोई औचित्य नहीं। मैंने जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों से निवेदन किया था कि जहाँ छोटे-छोटे नालों में जल स्रोत हैं वहाँ पिरूल (चीड़ की पत्ती) व गारे से छोटे चैक डाम बनाये जायें व चौड़ी पत्ती का वृक्षारोपण कर दिया जाये, जिससे किसानों को सिंचाई के लिये पानी प्राप्त होगा व बरसात में जो मलवा जाता है उसे रोका जा सके। वन पंचायतों व वन विभाग को चाहिये कि वे जल संस्थान, जल निगम व सिंचाई नहरों के इनटेक जहाँ से पानी टेप किया गया है, वहाँ पर 200 मीटर की गोलाई पर सघन वृक्षारोपण कर 10 साल के लिये स्थाई चौकीदार रखा जाये।
हयात सिंह कैड़, पूर्व प्रमुख
बिन्ता, अल्मोड़ा

























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