बहुत समय नहीं हुआ……………कोई सालेक बीता होगा। मैं एक पार्टी में अनायास ही पहुँच गया। पार्टी बड़े लोगों की थी। दो अफसरों को मैं पहचानता था, क्योंकि दोनों अपनी देव-भूमि और निशंक जी के शब्दों को उधार लूँ तो ‘भारत के भाल’ में प्रभावशाली पदों पर हैं। एक साहब फोरेस्ट में डी.एफ.ओ. बताए जा रहे थे। एक जो टी.वी. पत्रकार हैं- पहले से ही मेरे परिचित थे। पार्टी के आयोजक का नाम मैं बता नहीं सकता- कान्फिडेंशियल मैटर है।
बड़े लोगों की पार्टी हो तो दारू छकवा हो जाती है। वहाँ भी हुई। उन लोगों की वार्ता के विषय चढ़ते शरूर के अनुसार बदलते जा रहे थे। पता नहीं कहाँ से बात सचिवालय में तैनात किसी महिला अफसर की हो आई और उसके बाद जो नॉन वैज गप्पें शुरू हुई, उनसे मुझे गुजरे जमाने के डी.ए.वी. की लम्पट मण्डली याद हो आई। मुझे नहीं पता कि वह युवा आई.ए.एस कभी डी.ए.वी. कॉलेज में रहे थे या नहीं- लेकिन उनकी स्टाइल में डीएवियन छाप साफ नजर आ रही थी।
साल भर पुरानी यह घटना मुझे आज अनायास याद हो आई। दरअसल आज आईआईटी का रिज़ल्ट आया है। टी.वी. पर जो चर्चाएँ सुनीं उनमें सभी सफल प्रतिभागियों ने अपनी अल्टीमेट चॉइस आई.ए.एस. बताई। यानी आईआईटी उनके लिए आई.ए.एस. तक पहुँचने की सीढ़ी है। यही मेडिकल में भी होता है। यूपीएससी के सालाना परिणाम साफ दर्शाते हैं कि डॉक्टरों और इंजीनीयरों की पहली रुचि आई.ए.एस. अफसर होना होती जा रही है। उनका कहना यही होता है कि देश की सेवा, विशेष रूप से गरीबों, वंचितों और मजलूमों की सेवा वे डॉक्टर या इंजीनियर होते हुए नहीं कर सकते। देश की चिन्ता उनको आई.ए.एस. के पायदान तक खींच लाती है। सर मोक्षगुण्डम विश्वेसरैया इंजीनियर होते हुए जो देशसेवा नहीं कर पाए, वह अब ये देशभक्त करने वाले हैं। मुझे जनवरी 1996 की वह ठंडी सुबह याद आती है, जब चमोली के डी.एम. ने केवल इसलिए मुझे बंद करवाने की धमकी दे डाली थी कि आम आदमी होते हुए आखिर किस अधिकार से मैं बिना पूर्व अनुमति के उनसे मुखातिब हुआ। ऐसी संस्कृति में जाकर यकीनन गरीबों, वंचितों, आदिवासियों और दलितों की सेवा हो जाती होगी।
इंजीनियर और डॉक्टर बनने वाले लड़कों को कभी आपने उनके माता-पिता या रिश्तेदारों से लेक्चर पीते हुए देखा-सुना है ? उनको यही समझाया जाता है कि ‘सुक्खी’ तनख्वाह से उनका जीवन बर्बाद हो जाएगा। डॉक्टर बने तो मजे…….इंजीनियर बने तो मजे। सरकारी नौकरी में आये तो पाँचों उँगलियाँ घी में और कहीं अपना धंधा खोल बैठे तो सिर भी कढ़ाही में। लेकिन डॉक्टर या इंजीनियर बनने के बाद कइयों को लगता है कि भारत में सड़कों, पुलों, सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, रेलवे, उड्डयन जैसे क्षेत्रों में पेशेवरों की अब जरूरत नहीं रही। उनको देशसेवा करने की सनक चढ़ जाती है। मेडिकल और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध की सबसे ज्यादा संभावना है और आज के वैश्विक परिदृश्य में किसी राष्ट्र के महत्व का पैमाना भी इन्हीं क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक रिसर्च से होता है। भारत से प्रति वर्ष यूरोप जाने वाले डॉक्टर और इंजीनियर इन्हीं क्षेत्रों में नाम कमाते हैं। लेकिन अपने यहाँ पता नहीं क्यों डॉक्टरों और इंजीनियरों को देशसेवा का जुगाड़ केवल आई.ए.एस. बनने में नजर आता है। क्या आप मुजफ्फरनगर में उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान तैनात उस ‘सेवक’ को भूल गये हैं, जिसने बेहद लॉजिकल अंदाज में अखबारनवीसों से कहा था कि अगर गन्ने के खेत में कोई औरत अकेली चली जाए तो उसके साथ रेप होना लाज़मी है। एक ‘सेवक’ को आप इन दिनों टी.वी. पर हँसता देख रहे होंगे कि उसने कितनी बहादुरी से एक सोलह साल की उभरती टेनिस खिलाड़ी को इतना तंग किया कि उसको अन्ततः आत्महत्या करनी पड़ी। अनेक ‘सेवकों’ को आप सी.बी.आई. और अन्य जाँच एजेंसियों की गिरफ्त में देखते ही हैं। जब यूपीएससी के परिणाम आते हैं तब टॉपरों के इंटरव्यू आपको कई जगह मिल जायेंगे। इनको जरूर पढ़िए। आपको बड़ी राहत मिलेगी कि आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हमारे समाज में देश की चिन्ता में पिघलते ऐसे युवा भी हैं। दो-तीन साल बाद कभी इनके आसन तक जरूर जाइए। पैसे और पावर की अंधी महत्वाकांक्षा का पूरा खेल सामने आ जाता है। इसीलिए शायद वीरप्पा मोइली कहते हैं कि अफसरों पर लगाम लगाने के लिए विधान बदला जाना चाहिए। लोकतंत्र में नौकरशाह को इतना सुरक्षित क्यों बनाया जाए कि उसकी छुट्टी करने की दरख्वास्त राष्ट्रपति तक पहुँचानी पड़े। लोकसेवकों की पूरी चयन प्रक्रिया को दुरुस्त करने के लिए सतीश चन्द्र कमेटी सहित अनेक आयोग बने। चयन प्रक्रिया में छिट-पुट परिवर्तन भी किये गये, लेकिन यह बात आज तक किसी भारतीय की समझ में नहीं आई कि आखिर वह कौन सी वजह है जो इतने उत्साही देशसेवकों को कुर्सी पर काबिज होते ही निठल्ला और भ्रष्ट बना देती है। राजनीतिक दबाव एक वजह हो सकती है, लेकिन यह कुल वजह नहीं है। लोक सेवा नियमावली किसी भी नौकरशाह को इतना मजबूत कवच देती है कि अगर वह सचमुच काम करना चाहे तो कोई उसका रास्ता नहीं रोक सकता।
असल में, आइ.आइ.टी. और आई.ए.एस. का यह भूत संकीर्ण स्वार्थों की प्रतिपूर्ति के लिये ही पनपाया गया है। कुछ युवाओं को इस आत्मघाती क्रेज से मलाई चाटने और तानाशाही करने का अवसर भले मिल जाता हो लेकिन लाखों युवा इस मृगतृष्णा में अपना जीवन बरबाद कर डालते हैं। कुछ सफल लड़कों की सूची में उन असफल युवाओं की फेहरिस्त दबा दी जाती है जो तमाम संभावनाओं के बावजूद आईआईटी के क्रेज के चलते जीवन भर के लिये निराश हो जाते हैं। इस अंधी दौड़ पर लगाम लगायी जानी चाहिये। बैंकिंग, बीमा, आई.टी, उड्डयन, कम्प्यूटर, समुद्र-विज्ञान, अंतरिक्ष – अन्वेषण, चिकित्सा-शास्त्र और भूगर्भ विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्र हैं जहाँ व्यावसायिक कौशल प्राप्त युवाओं का जबरदस्त टोटा है। अनेक कम्पनियाँ रिक्तियों को केवल इसलिये नहीं भर पा रही हैं कि योग्य और पेशेवर युवा उपलब्ध ही नहीं हैं। देहरादून जैसे शहरों में थोक के भाव खुले इंस्टीट्यूटों के संचालक जब शराब और खनन उद्योग से जुड़ें हों, तब उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे युवाओं को नई प्रौद्योगिकी और ज्ञान के मुताबिक तैयार कर पायेंगे। ऐसे दुकाननुमा इंस्टीट्यूटों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती।
सवाल यह है कि प्रतिष्ठित संस्थानों से निकले डॉक्टर या इंजीनियर जब अस्पताल और फील्ड छोड़कर सचिवालयों में नेताओं के पैर दबाने लगेंगे तब देश में चिकित्सा और अभियांत्रिकी का भविष्य क्या होगा ? सब्सिडाइज्ड फीस से सरकारें इनको क्या इसलिये पढ़ाती हैं कि बाद में ये अपना मूल काम छोड़कर ‘देशसेवा’ में लग जायें ? क्या इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगनी चाहिये।
आइ.आइ.टी., मेडिकल और सिविल सर्विस के इस गठजोड़ से उभरे या कहें कि उभारे गये सपने ने अनेक कोचिंग इंस्टीट्यूट को उभारने का अवसर मुहैया करवाया है। समाज में इस क्रेज को बढ़ाने के लिये मीडिया की मदद से जबरदस्त प्रचार किया जा रहा है। वस्तुतः यह एक सशक्त शिक्षा माफिया है जिसकी मुखालफत बुजुर्ग शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर यशपाल बराबर करते आ रहे हैं। यह माफिया इस युवा राष्ट्र के मानव संसाधन को निराशा और हताशा के अंधे कुएँ में धकेल रहा है। कपिल सिब्बल चाहते तो पहली मार इस गठजोड़ पर करते, लेकिन उनकी सलाहकार मंडली में भी ‘देशसेवक’ जमे होंगे। समय आ गया है कि देश का पैसा खर्च कर तैयार किये गये डॉक्टरों या इंजीनियरों को ‘देश सेवा’ करने के बजाय उनके मूल काम करने दिये जायें। और अगर इनको देश की सेवा करने का इतना ही क्रेज हो गया है तो पहले इनसे लाखों रुपये की वह राशि वसूल कर ली जानी चाहिये जो राष्ट्र के करदाताओं ने इनकी डॉक्टर या इंजीनियर बनाने में खर्च की है। आई.ए.एस. सहित तमाम नौकरशाहों को ब्रिटिश काल से दिये गये अधिकार वापस ले लिये जायें और उनको स्टेट रेगुलेशन में कस दिया जाये तो अपना असली कौशल छोड़कर ‘देश सेवा’ में आये सेवक माथा पीटते नज़र आयेंगे और जो दौड़ में शामिल हैं, वे मैदान छोड़ कर भागते नज़र आयेंगे। आप सुन रहे हैं न सिब्बल साहब…..!


























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