‘गोविन्द पशु विहार’ उत्तरकाशी के खाँकरी रेंज में एक आईएएस अधिकारी द्वारा अपनी पत्नी के नाम अवैध रूप से जमीन कब्जाने एवं हरे पेड़ों को काटने का मामला कोई नया नहीं है। हाल के वर्षों में उत्तराखण्ड में ही नहीं, अन्य प्रदेशों में कार्यरत अधिकारियों द्वारा अपने परिजनों के नाम थोड़ी सी जमीन खरीद कर आसपास के क्षेत्रों में अतिक्रमण करने व वहाँ की हरियाली को नष्ट करने के कई मामले प्रकाश में आये। पर किसी भी मामले में कोई सकारात्मक कार्रवाही नहीं हुई। आईएएस अधिकारी ही अगर गैरकानूनी कार्यों में लिप्त हों तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि राज्य में सक्रिय भू व वन माफियाओं पर अंकुश लग सकेगा। अक्सर इन मामलों में अपराधियों को प्रभावशाली राजनीतिज्ञों एवं अफसर लॉबी का संरक्षण प्राप्त होता है।
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शंकर अग्रवाल की पत्नी नीता अग्रवाल के बंगले के लिए अवैध रूप से हरे वृक्ष काटे जाने का मामला प्रकाश में आया तो सेंक्चुरी प्रशासन और राजस्व विभाग में हड़कम्प मच गया। एसडीएम व राजस्व विभाग तथा सैंक्चुरी प्रशासन ने क्षेत्र का निरीक्षण कर देवदार व कैल के 200 पेड़ काटे जाने की पुष्टि की और 107 तख्ते व 105 स्लीपर सहित आरा मशीन को सीज कर दिया। जाँच में नीता अग्रवाल द्वारा राजस्व विभाग की 32 नाली भूमि कब्जाई मिली, जबकि उसके नाम मात्र 25 नाली (0.489 हैक्टेयर) भूमि ही राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। इस मामले में दो और मुकदमे दर्ज किये जा चुके हैं। शंकर अग्रवाल, मैनेजर राजेश शर्मा और चौकीदार इन्द्र सिंह नेपाली व श्याम बहादुर के खिलाफ वन अधिनियम 1927 और जैवविविधता अधिनियम 2002 की धारा 41/52, 26/26 के तहत पहले ही मामला दर्ज किया जा चुका था।
गोविन्द पशु विहार क्षेत्र में अतिक्रमण करने व हरे वृक्षों के कटान तथा सरकारी भूमि में अवैध कब्जे की की जानकारी वन विभाग व राजस्व विभाग को न हो ऐसा नहीं हो सकता। इससे पूर्व यात्रा मार्गों में आश्रमों- कुटियाओं के नाम पर जगह-जगह अतिक्रमण हुए हैं जिनके आसपास हरे वृक्षों के पातन व उन आश्रमों में जल रहे ईंधन से पर्यावरण को हो रहे नुकसान की जानकारी कई स्रोतों से प्रकाश में आई है। कई मामलों में लिखित शिकायत भी दर्ज की गई है, पर सेंक्चुरी प्रशासन ने इन पर कार्यवाही करने के बजाय उन लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया, जो यहाँ की प्रकृति व हरियाली को बचाने में लगे हैं। कमोबेश यही स्थिति आम जनता के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों, यात्रा मार्गां और सड़क किनारे के पर्वतीय गाँवों की है। बिनसर वन्यजीव विहार के कोर जोन के आसपास आये दिन जमीन अथवा पुराने भवनों को खरीद कर नये भवनों का निर्माण हो रहा है और उनमें देवदार व अन्य प्रजातियों के हरे वृक्षों को काट कर चिरवाई गई लकड़ी लगाई जा रही है। इनके बंगलों को सड़क बन जा रही है। स्वयं वन्य जीव विहार के राजि कार्यालय अयारपानी व बिनसर क्षेत्र में हो रहे निर्माण में जो बेशकीमती लकड़ी लगाई जाती है, वह भी इसी प्रतिबंधित क्षेत्र की होती है। नियम कानून सिर्फ आम व कमजोर के लिए ही बने हैं। कॉर्बेट पार्क हो या नन्दादेवी राष्ट्रीय पार्क या गोविन्द पशु विहार, सभी जगह अतिक्रमण हो रहा है, जंगल काटे जा रहे हैं और वन्य जन्तुओं की निर्मम हत्या भी हो रही है। इसकी जाँच कभी नहीं होती। मजेदार बात है कि इन क्षेत्रों के कार्यरत अधिकारियों को अपने वनों की सीमाओं का ज्ञान ही नहीं होता। मामले के चर्चा में उछलने से अपराधी अपने बचाव में सक्रिय हो जाते हैं और जाँच प्रभावित हो जाती है।