मानव अपने इतिहास में अपनी सुरक्षा, सुख-सुविधाओं आदि की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास करता रहा है। पहाड़ों को देखें तो यहाँ उच्च जातियों में पलायन की प्रवृति ज्यादा रही है। हरीश की बारात में पभ्या (पिथौरागढ़) से जोश्यूड़ा (नैनीताल) जाते हुए मैंने इस पलायन को समझने की कोशिश की। पभ्या ग्राम सभा पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग विकासखंड में स्थित है। अल्मोड़ा से वाया सेराघाट जाने पर राईंआगर से तीन किमी. पूर्व गाड़ी से उतर कर सामने करीब डेढ़ किमी दूर है पभ्या ग्राम सभा। धारी, गुर्सुटी व खेती इसके तोक गाँव हैं। हमें जाना था गुर्सुटी। यह उपाध्याय लोगों का गाँव है। इस इलाके में इस जाति के कई गाँव हैं। गुर्सुटी गाँव सहित इन गाँवों से बड़ी तेजी से पलायन
हो रहा है। इस बात का अहसास इस पूरे आयोजन के दौरान हो रहा था। गाँव के कुछ परिवार नीचे रहते हैं और कुछ आधा किमी. ऊपर। परम्परानुसार ऐसे आयोजनों में सभी लोग अपने हिस्से का कार्य निपटा जाते हैं। मगर अब इस तोक में इतने लोग नहीं हैं कि वे अकेले अपने बूते ऐसे काम-काज कर सकें। सुन्दर, मनमोहक व शांतिपूर्ण स्थान होने के बावजूद स्रोतों में पानी के अभाव में लोग परेशान, उर्वरा कृषि भूमि होने के बावजूद सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं। जंगली जानवरों के आतंक और रोजगार के अभाव में पलायन नियति बन गई है!
वर्षों पूर्व खटीमा जाकर बस गए रमेश चन्द्र उपाध्याय बताते हैं कि परिवार बढ़ गया था और मकान छोटा पड़ रहा था। अलग मकान बनाने के लिए पास जगह नहीं थी और लोग मकान लायक जमीन बेचने या अदला-बदली करने को तैयार नहीं हुए। पानी, बिजली की समस्या आज की अपेक्षा ज्यादा थी। रोजगार के साधन तब भी नहीं थे। विनिमय के आधार पर ही काम चलता था। परिवार बढ़ने के साथ खेती-पशुपालन से जीवनयापन असम्भव हो गया तो पलायन ही एकमात्र रास्ता बचा। उन दिनों जो भी यहाँ से बाहर गए सब अच्छी स्थिति में हैं। जो यहाँ रह गए उनके लिए भी सुविधा हो गई।
लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ समस्याएँ पूर्ववत हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार साधनों के अभाव में कुछ नहीं कर पाते और सामूहिक प्रयासों के लिए जन का होना आवश्यक है। सरकारी योजनाएँ तो बहुत हैं पर उनका लाभ हर किसी को नहीं मिल पाता। परेशानहाल लोग फिर पलायन ही करते हैं। लगभग ऐसा ही कानपुर से शादी में शामिल होने आए देवकीनन्दन उपाध्याय भी कहते हैं। सात पुश्त पूर्व उनके पूर्वज नेपाल से राजस्थान और फिर पहाड़ों की खाक छानते यहाँ बस गए।
यही हाल जोश्यूड़ा का भी है। बताते हैं कि इनके पूर्वज झूँसी से आए। यह ग्राम सभा नैनीताल जिले के अत्यन्त पिछड़े विकासखण्ड ओखलकांडा में है और चम्पावत जिले की सीमा के नजदीक है। साठ-सत्तर वर्ष पूर्व गाँव की जो सम्पन्नता रही होगी, उसके अवशेष यहाँ के बचे-खुचे परिवारों को अन्दर तक कचोटते हैं। स्वतंत्रता संग्रामियों का गढ़ रहा यह क्षेत्र देश की आजादी के बाद उपेक्षित ही रहा। जोश्यूड़ा सहित कई गाँवों में तीन साल पूर्व हमने पदयात्रा की थी। लेकिन इस बार हालात पहले से बदतर दिखे। हम भीड़ापानी (पन्तोली ग्रामसभा) से पतलिया होते जोश्यूड़ा गए थे। भीड़ापानी से पतलिया तक कच्ची सड़क है। इसे मिलना तो जोश्यूड़ा में था लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण सड़क नाई की ओर मोड़ दी गई है। पतलिया से चार-पाँच किमी. ऊबड़-खाबड़ मार्ग से नीचे उतर कर पहुँचते हैं जोश्यूड़ा। पचास-साठ मवासों के इस गाँव की जनसंख्या 763 है, लेकिन गाँव के एक सज्जन के अनुसार तीन माह पूर्व की गई सर्वे में यहाँ की जनसंख्या 350 निकली। रौतेलाकोट, धमना, चौंपों, पट्यूड़ी, आँखली, ताली आदि तोक गाँव हैं। अधिकांश कृषि भूमि सिंचित है पर हाल के वर्षों से जंगली जानवरों- सेही, सुअर, लंगूर व बंदरों के आतंक से फसल बुरी तरह चौपट होने लगी है। पूर्णतया कृषि व पशुपालन पर निर्भर परिवारों के लिए जीविकोपार्जन का संकट उत्पन्न हो गया है।
राजकीय इन्टर कॉलेज जोश्यूड़ा के बदतर होते हालातों से चिन्तित कक्षा 10 में पढ़ने वाले मनीष चन्द्र जोशी बताते हैं- 200 छात्र-छात्राओं वाले इस कॉलेज में मात्र दस अध्यापक हैं और एक प्रभारी प्रधानाचार्य। कार्यालय स्टाफ की भी कमी है। एक अध्यापक कक्षा 6 से 10 तक की कक्षाओं को और पी.टी.आई. कक्षा 6-7 को पढ़ाते हैं। विद्यालय भवन के कक्षों की फर्स उखड़ जाने से उनमें गड्ढे हो गए हैं। बैठने की व्यवस्था नहीं, खेल व पठन-पाठन की सामग्री का अभाव, पानी व शौचालय की समस्या। गाँव में बिजली है पर कॉलेज में नहीं है। जनरेटर व कम्प्यूटर खराब पड़े हैं। यही हाल स्वास्थ्य- चिकित्सा का है। 1950 का बना प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एक सफाईकर्मी के भरोसे चल रहा है। स्वास्थ्य परिचारिका भी नहीं है। प्राथमिक चिकित्सा न मिलने से कई अकाल मौतें हो चुकी हैं। 1988 से सड़क की माँग करते हुए भीड़ापानी से जोश्यूड़ा तक 15 किमी. सड़क स्वीकृत तो है लेकिन वह भी विवाद में पड़ ऊपर ही अटक गई है। सड़क न होने से क्षेत्र में कोई नहीं टिकता। पेयजल की समस्या भी अब विकराल होती जा रही है।
जोश्यूड़ा गाँव के एक ओर डंडा गाड़ बहती है तो दूसरी ओर लधिया गाड़, जो आगे जाकर कई अन्य गाड़-गधेरों को अपने साथ लेकर नंधौर नदी में मिल जाती है। डंटा नदी में पुल न होने से बरसात में इस गाँव का अन्य गाँवों से सम्पर्क कट जाता है। ओखलकांडा-देवीधूरा पैदल मार्ग का रखरखाव न हो पाने से इस मार्ग पर निर्भर दर्जनों गाँव कष्ट में हैं। अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में खड़ंजे व सीसी मार्ग बनाने की योजना का काम इन मार्गां में न देख आश्चर्य होता है। जबकि खड़ंजों व सीसी मार्ग के नाम पर खूब बजट बरबाद किया जा रहा है, लेकिन इन गाँवों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
52 वर्षीय पुजारी ईश्वरी दत्त जोशी कहते हैं, सरकार को इन उजड़ते गाँवों को सँवारने की कोई सुध नहीं है। अगर इन गाँवों में सम्पर्क मार्ग, सड़क आदि की सुविधा हो जाती और यहाँ के मन्दिर, पहाड़ों के बीच बसे गाँव, खेत-खलिहान, गाड़-गधेरों से लगे उपजाऊ सेरों आदि को सुधारा जाता तो गाँवों का अमन-चैन लौटता और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता। तब आबोहवा का लुत्फ उठाने प्रकृति प्रेमी पर्यटक यहाँ आ सकते थे। वे बताते हैं, ओखलकांडा और जोश्यूड़ा के बीच 6 किमी. के फासले में देवगुरू वृहस्पति का एक भव्य मन्दिर है, जिसके चारों ओर चार किमी. की परिधि में फैला बियाबान जंगल है। इस मन्दिर में औरतों का जाना वर्जित है। शुक्ल पक्ष में वहाँ पूजा होती है। चारों ओर के पुजारी और भक्तगण आते हैं। यहाँ न तेल का दीपक जलता है न कोई पकवान तेल में पकता है। सादा भोजन बनता है और पुजारियों को भी संयम व सादगी से रहना होता है। ऐसे और भी मन्दिर व दर्शनीय स्थल इस क्षेत्र में हैं।
गाँव वालों के पास न आर्थिक संसाधन हैं, न इस तरह के कार्यों को मिल जुलकर करने के लिए अब लोग हैं। बोलबाला उन्हीं का है, जिनको राजनीतिक संरक्षण मिला हो और जो तिकड़म भिडा़ने में माहिर हों या फिर आर्थिक रूप से सम्पन्न हों। ऐसा भी नहीं है कि लोग जागरूक नहीं हैं। ग्रामीण सजग हैं और इन तमाम समस्याओं को दूर करने के लिए प्रयासरत भी हैं लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। बिखरी जोतों का होना भी एक कारण है। पलायन कर गए परिवारों के खेत बंजर पड़े रहने व प्रति परिवार एक साथ जमीन न होने के कारण भी खेतों के रखरखाव तथा मनमाफिक फसल उगाने में भी लोगों को दिक्कतें आ रही हैं। उच्च जातियों में यह समस्या और भी ज्यादा है, क्योंकि कई कार्यों के लिए उन्हें अन्य जाति के लोगों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
गुरसुटी और जोश्यूड़ा जैसी स्थिति कमोबेश उत्तराखंड के सभी गाँवों में है। तब पलायन के सिवा रास्ता क्या है ?
hi pls sent me intresting view my garhwal
Bilkul sahi likha hai, uttrakhand ke lagbhag sabhi villager ki yahi kahani hai, youth kare bhi to kya kare roti makan and kapra ke karan palayan karna padta hai, main bhi un logo main se ek huan