प्रस्तुति : विनोद पांडे
आजकल तरह-तरह के दिवस को मनाने का फैशन हो चला है। अर्थ डे, वेलेंटाइन डे, पेरेंट डे, मदर डे, फ्रेंड्स डे, वीमेंस डे, और न जाने क्या-क्या। किसी के प्रति जिम्मेदारी निभाओ या न निभाओ, श्राद्ध के तर्पण के कर्मकांड की तरह उसे एक दिन याद कर देने से सारी कमी पूरी हो जाती है। फिर भला लोग पर्यावरण के बारे में क्यों पीछे रहें। पर्यावरण भी भला किसी फैशन से कम तो है नहीं। तमाम तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुँचाइये और एक दिन उसका तर्पण कर देने से उसके ऋण से मुक्त हो जायें।
तारीख 5 जून का कइयों को इंतजार रहता है। पिछले साल वन विभाग के नये चीफ आये थे। उन्होंने उत्तराखण्ड के सबसे बड़े महकमे का मालिक होने के नाते मुनादी पिटवा दी कि चप्पे-चप्पे में पर्यावरण दिवस मनाया जाये। जंगलात के सारे कर्मचारी 5 जून को इसी काम के लिए झोंक दिये। नियमानुसार देहरादून से ही सारे कार्यक्रम तय कर दिये। जनता आप के साथ आये या न आये, स्कूल के बच्चे तो फोकट में मिल ही जाते हैं। फिर पर्यावरण जैसे जरूरी विषय या जिसे होली काउ (पवित्र गाय) कहा जा सकता है, में शामिल होने से इंकार करने की हिम्मत किसी की हो भी नहीं सकती, सी.एमसे लेकर डी.एम. तक। पिछले साल जंगल भी खूब जले। सारे उत्तराखण्ड में गर्मियों के सुहाने मौसम में धुएँ के बादल छाये रहे। आग इतनी भयंकर थी कि कई बार तो सड़को में यातायात तक अवरुद्ध़ हो गया था। चारों ओर वन विभाग की पोल खुलने से इज्जत बचानी मुश्किल हो रही थी। इन्वायरमेंट डे के बहाने सब कुछ बहाया जा सकता था। इन्वायरनमेंट डे का नजारा देखने लायक था। सुबह से स्कूली बच्चों की प्रभात-फेरी निकलवायी। आमतौर पर प्रभात-फेरी व अन्य जुलूसों में सरकारी स्कूलों के बच्चे ही आते हैं। पर पर्यावरणीय फैशन के चलते पब्लिक स्कूल के बच्चों की शिरकत देखते ही बनती थी। स्थानीय व स्वयंभू पर्यावरणविदों से पर्यावरण की नयी परिभाषा करने वाले भाषणों से बच्चों की उसी भीड़ को अपने ज्ञान से पवित्र किया। फिर उसी असहाय भीड़ का जू तक लंबा जुलूस निकलवाकर वहाँ कमिश्नर साहब से फिर एक सभा करवा दी। बचे-खुचे पर्यावरणविदों ने वहाँ पर अपना ज्ञान का बखान कर संतुष्टि पायी। पर्यावरण दिवस में बाल दिवस का कट पेस्ट कर दिया।
इस बार के पर्यावरण दिवस में ऐसी प्रतिबद्धता नहीं दिखी। शायद चीफ साहब पुराने हो गये। या इस साल इंद्रदेव की कृपा से जंगल धधके नहीं, तो अपराध बोध कम रहा होगा। लेकिन जहाँ-तहाँ पेड़ लगाने और भाषणबाजी के कार्यक्रमों की घटनाओं की सचित्र सूचना अखबारों के माध्यम से मिल गयी। हमारे यहाँ तो हरेले के दिन से ही पौधे लगाने का लोक विज्ञान था। पर अब इन्वायरनमेंट डे होने के कारण नौकरशाहों व नेताओं की राजाज्ञाओं से जब-तब, जहाँ-तहाँ पौंधे रोपे जाने का रिवाज प्रचलित हो चुका है। जब सब पर उनका हुक्म चलता है तो भला प्रकृति की क्या बिसात ? देहरादून से आये एक एन.जी.ओ., जो नैनीताल को बचाने के उद्देश्य से यहाँ पेड़ लगाने आये थे, को कहीं पर पौघे लगाने की जगह नहीं मिल पायी तो यहाँ के वन विभाग पर अपना गुस्सा उतारते देखे गये। उन्हें अफसोस था कि यदि पौंधे इन्वायरनमेंट डे के बाद लगाये तो क्या फायदा ? एकादशी के व्रत का लाभ दूसरे दिन करके पुण्य कैसे हो सकता है ?
तर्पण करने से पितृपक्ष शांत हो जाता है। वरना अतृप्त पितर ‘हंकार’ बन कर परेशान कर देते हैं। तरह-तरह के छम-बिछम, रूप-कुरूप दिखा देते हैं। कुछ ऐसा ही लगता है इस बार पर्यावरण रूपी पितर अपना डे ठीक से न मनाये जाने के कारण इस बार कुपित हो बैठा। पर्यावरण दिवस को बीते चार दिन भी नहीं हुए थे, यानी अखबारों में अभी पर्यावरण दिवस के समाचार आ ही रहे थे या कि पर्यावरणविद और नौकरशाह इन्वायरनमेंट डे की खुमारी मिटा भी न पाये थे कि नैनीताल की सुबह का मौसम चटक साफ होने के बाद भी दोपहर में मूसलाधार बारिश के रूप में कुदरत ने अपनी ताकत दिखा ही दी। बस क्या था ? जैसे पर्यावरण का हंकार नाचने लगा। माल रोड से लेकर सभी सड़कें नदियों व नहरों के रूप में बदल गयीं। उनमें पानी सप्लाई करने में सीवर के मैनहोलों से उफनते पानी का सराहनीय योगदान रहा। माल रोड के गहरे हिस्सों में सीवर की गंदगी से पट गयी। तालाब छत्तीस किस्म के कूड़ें से भर गया। इन्वायरमेंट डे का ऐसा उपसंहार जिलाधिकारी महोदय को, सुना है, नागवार गुजरा। उन्होने तुरत-फुरत में नगर के पर्यावरणविदों की बैठक बुला दी। पता नहीं क्या-क्या निर्णय हुए। लेकिन दूसरे दिन की गतिविधियों से दो बातें निकलकर तो साफ आयीं। पहला यह कि तालाब को साफ कर दो, उसका जलागम क्षेत्र साफ हो जायेगा। पहले हमारा लोक विज्ञान कहता था कि हिमालय को साफ कर दो, गंगा साफ हो जायेगी। लेकिन नये समय में नयी-नयी खोजें होती रहती रहती हैं। कई रोगों के इलाज के तरीके बदल जाते हैं। पर्यावरणविदों ने नयी खेाज कर ली होगी। मीटिंग की सलाह का असर इतना प्रबल था कि अखबारों में जिलाधिकारी महोदय भी दूसरे दिन तालाब से कूड़ा हटाते हुए सचित्र देखे गये।
दूसरी बात से मेरे पड़ोसी को लाभ मिला। जैसा कि आप जानते ही हैं जैसे अलग-अलग सीजनो में शोरूमों में सेल और छूट की तरह नैनीताल विकास प्राधिकरण में भी मकान बनाने के लिए अघोषित छूट होते रहती है। ऐसी ही पिछली एक छूट का लाभ उठाते हुए पड़ोसी ने अपने मकान में दो कमरे जोड़ लिये थे। लेकिन मलबा इतना निकला था कि खच्चर वाले व पिकअप वाले 25-30 हजार से कम में मान ही नहीं रहे थे। वे परेशान थे। कल सुबह वे बड़े खुश नजर आये। डी.एम. सा’ब के आदेश का असर था। आदेश था- जिसके घर में मलबा पाया जायेगा, उसे 5 हजार का जुर्माना होगा। अब मलबा भले ही एक बोरा हो या हजार बोरा। पड़ोसी महोदय ने आदेश का अपने हित में थोड़ा सा और परिवर्तित कर दिया। उन्होने सारा मलबा घर के नजदीक के नाले में डाल दिया है। उनके तर्क सराहनीय हैं- पहला तो हो सकता है कि उसी तरह की बारिश एक दिन और आ जाये तो मामला साफ। अगर वैसी बारिश न भी आये तो चैक करने कौन आता है ? चैक करने वाला जरूरी नहीं कि बेईमान न हो। बेईमान हो तो ठीक, अगर खुदा न खास्ता ईमानदार भी निकला तो फाइन होगा 5000 हजार। इस तरह फाइन की संभावना लगभग 25 प्रतिशत है। उनका 25,000 रु. का मामला अधिक से अधिक 5000 में निबटता लगता है।
वैसे तो जितनी भी नयी खोजें होती हैं, उनमें से पर्यावरण के क्षेत्र में सबसे अधिक होती हैं। शायद इन खोजों से पर्यावरण खूब हृष्ट-पुष्ट हो जाये। कोई संदेह नहीं जब पर्यावरणविद हृष्ट-पुष्ट हो रहे हैं तो कभी पर्यावरण भी हृष्ट-पुष्ट होगा ही।


























आपकी टिप्पणीयाँ