तड़ित घिल्डियाल
चुनाव से ऐन 6 माह पहले जनरल खण्डूरी की ताजपोशी के समय जहाँ कुछ नगरों में जुलूस निकले, वहीं उनके गृहनगर पौड़ी में खामोशी दिखी। उल्लेखनीय है कि 7 मार्च, 2007 को जब खण्डूरी पहली बार मुख्यमन्त्री बने तो नगर में जलूस निकला था। 27 जून को खण्डूरी के स्थान पर निशंक मुख्यमन्त्री बने तब भी निशंक के समर्थकों ने आतिशबाजी की थी। लेकिन जब 11 सितम्बर को खण्डूरी को दोबारा सूबे की कमान मिली तो उनके गृहनगर में पिन ड्रॉप साइलेन्स बना रहा।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि निशंक ने मुख्यमन्त्री रहते बहुतों को उपकृत किया, इसलिये खण्डूरी के फिर से मुख्यमन्त्री बनने पर साफ-साफ बोलने वाले दो-चार लोग भी आगे नहीं आये। यह खामोशी भाजपा के अन्दरूनी संघर्ष का ही परिणाम थी। लेकिन यदि आम जनता के दृष्टिकोण से देखें तो इस खामोशी के पीछे पूर्व मुख्यमंत्रियों के द्वारा इस नगर की उपेक्षा किया जाना ही है। पौड़ीवासी कई मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल देख चुके हैं। इनमें से जनरल खण्डूरी व निशंक तो पौड़ी नगर से ही सम्बद्ध रहे। कोश्यारी जी को छोड़ बाकी स्वामी जी व तिवारी जी ने भी यहाँ आकर जनता को आश्वासन ही दिये। इसीलिये खण्डूरी के दुबारा मुख्यमन्त्री बनने पर कोई उत्साह नहीं जगा।
कई लोगों को गलतफहमी है कि पौड़ी से दो-दो मुख्यमन्त्री बनने से इस नगर का बहुत विकास हुआ। सच्चाई यह है कि पौड़ी नगर आज राज्य बनने के समय से भी बदतर हालत में है। पिछले 11 साल में यहाँ न कोई संस्थान बना, न कोई भवन। ढाँचागत सुविधाओं का कोई विस्तार नहीं हुआ। उपेक्षा यहाँ अपने चरम पर है। अस्पताल है मगर डाक्टर नहीं। बाजार है मगर खरीददार नहीं। पर्यटक नगरी है मगर पर्यटक नहीं। विश्वविद्यालय परिसर है मगर अकादमिक माहौल नहीं। सांस्कृतिक नगर है मगर कोई सांस्कृतिक केन्द्र नहीं। मण्डलीय मुख्यालय है, मगर कोई अधिकारी नहीं बैठतां। इंजीनियरिंग कालेज है भी तो नगर से उसका कोई रिश्ता नहीं। नेता बहुत सारे हैं, मगर पहले जैसा समर्पित व निःस्वार्थ एक भी नहीं हैं। पार्टियाँ हैं लेकिन उनके कार्यकर्ता स्वार्थलिप्सा में डूबे हुए हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि राज्य आन्दोलन की चिंगारी इसी नगर से भड़की। मगर राज्य बना तो सबसे अधिक उपेक्षा इसी नगर की हुई। मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी व कभी एन.डी. तिवारी ने यहाँ आकर जनता को सब्जबाग दिखलाये। 1996 में स्वीकृत नानघाट पेयजल योजना जल्दी बनने का वादा किया। पंचायत राज व कृषि निदेशालय बनाने की घोषणा की। लेकिन ये निदेशालय अभी भी कागजों में हैं। उन्होंने यहाँ पर राजस्व बोर्ड की कोर्ट लगाने की बात की, लेकिन राजस्व कोर्ट तो दूर आयुक्त कोर्ट तक यहाँ नियमानुसार नहीं लगता। नानघाट योजना 7 सालों से बन रही है। 19 करोड़ की योजना पर लागत 80 करोड़ हो गई है। अब सरकार महज शर्म के कारण इसे बना रही है।
जनरल खण्डूरी के पहली बार मुख्यमन्त्री बनने पर पौड़ीवासियों को बहुत अपेक्षायें थीं। लेकिन तब लगातार चुनाव होते रहे और आचार संहितायें लगती रहीं। पिछले कार्यकाल में खण्डूरी ने रज्जुमार्ग बनाने, नर्सिग कालेज खोलने, पर्यटक आवासगृह बनाने व झील विकास की चर्चा शुरू की थी। पूर्व पालिकाध्यक्ष जसपाल नेगी के प्रयासों से उन्होंने रांसी स्टेडियम में खेल सुविधायें बढ़ाने के लिये पहल ही। सवा दो साल बाद उनको बदल दिया गया। निशंक आये तो उन्होंने पूर्व मुख्यमन्त्री की घोषणाओं को किनारे किया और अपना ध्यान श्रीनगर विधान सभा पर ही केन्द्रित कर दिया। उनके समय में पौड़ी जिले की योजनाओं का ज्यादातर धन उनके चुनाव क्षेत्र में ही लगा। हाँ, वादे के मुताबिक उन्होंनें पौड़ी के जिला अस्पताल में कई करोड़ की एम.आर.आई. मशीन तो भिजवाई लेकिन इसका संचालन कैसा होगा, इसका जवाब आज भी किसी के पास नहीं है। यह 6 माह से डिब्बों में बन्द पड़ी है। नगर में एक संग्रहालय बनाने की घोषणा भी निशंक जी के खाते में जाती है, किन्तु ऐसी घोषणा तो उ.प्र. की मुख्यमन्त्री मायावती ने भी पौड़ी में आकर की थी। पौड़ी से ही अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले निशंक ने सत्ता में रहते हुए पौड़ी को क्यों हाशिये पर रखा, यह वही जानते होंगे।
नगरवासियों द्वारा कुछ नये संस्थान बनाने की माँग लगातार की जाती रही है। इसी से पौड़ी का महत्व बढ़ सकता है। चूँकि केन्द्रीय विश्वविद्यालय का मेडिकल कालेज भविष्य में बनना तय है। इसे पौड़ी में स्थापित करने की माँग हो रही है। यहाँ पर विश्वविद्यालय का परिसर है। लेकिन निशंक सरकार इसे मानकों से हटकर कोटद्वार बनाने के पक्ष में थी। इस कारण जनता स्थानीय भाजपाइयों से दुखी है। पार्टी कार्यकर्ता निशंक की संभावित नाराजगी के डर से इस मुद्दे पर चुप रहे।
बहरहाल अब गेंद जनरल के पाले में है। देखना यह है कि वे उस नगर के लिये क्या देते हैं, जहाँ उनका बचपन बीता और जहाँ के लोगों ने अपने निजी हितों की अनदेखी कर राज्य दिलाने में अहम योगदान दिया।