कुछ दिन पहले काठमांडू शहर की तस्वीरों में मैंने देखा कि वहाँ के कई घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल खपरैल जैसे लगे हुए थे। यह सूर्य की किरणों द्वारा पानी गर्म करने के उपकरण थे। दो वर्ष पहले ऐसे ही पैनल मैंने तिब्बत के ल्हासा के घरों में देखे थे। उत्तराखंड नेपाल से लगा है और उसके ठीक पश्चिम में पड़ता है। धूप तथा पहाड़ दोनों में एक जैसे हैं। यदि नेपाल में सौर ऊर्जा का प्रयोग हो सकता है तो उत्तराखंड में क्यों नहीं ? उत्तराखंड राज्य में सौर ऊर्जा का एक पूरा विभाग है। लेकिन यह विभाग क्या कर रहा है, यह पूछने वाला कोई नहीं।
कुछ वर्ष पूर्व मैंने इस विभाग के गोपेश्वर कार्यालय से टेलीफोन पर कहा था कि वह मेरे जोशीमठ के घर में सौर ऊर्जा द्वारा पानी गरम करने के उपकरण लगा दे। मुझे बताया गया कि इसके लिए मुझे 25,000 रुपए उस कार्यालय में जमा करने होंगे, जिसके बाद ही वह कंपनी से उपकरण मंगाएगा। यह सही है कि मैंने यह धन जमा नहीं किया, लेकिन उस कार्यालय ने मुझसे इन वर्षों में एक बार फोन से भी पूछा नहीं कि क्या मैं पानी गर्म करने की मशीन लगाने उत्सुक हूँ ? जहाँ तक मेरी जानकारी है, इस विभाग ने हमारे चमोली जनपद में एक भी स्थान में पानी गर्म करने सौर ऊर्जा का प्रयोग नहीं किया है।
इस विभाग से मेरा संपर्क हमेशा निराशाजनक रहा है। लगभग दस वर्ष पहले मैंने इस विभाग से दो सौर ऊर्जा की बत्तियाँ, उनको ऊर्जा देने वाले दो पैनल, एक बड़ी बैटरी, एक इधर-उधर ले जा सकने वाली बत्ती, तार इत्यादि गोपेश्वर जा कर खरीदे थे। दो साल बाद उन्होंने काम करना बंद कर दिया। संभव है बैटरी ऊर्जा जमा न कर पा रही हो। मैंने उस विभाग को फोन से इस समस्या के बारे में बताया। उनके एक कर्मचारी ने कहा कि विभाग के लोग जोशीमठ आते रहते हैं, वे आकर देख लेंगे। तब से लगभग पाँच साल बीत गए हैं, लेकिन वे आए नहीं। एक बार मैंने उन्हें फोन से याद भी दिलाया लेकिन उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा उपभोक्ता हमारा वन विभाग है। वह दूरस्थ गाँवों और उनके रास्तों को प्रकाशित करने 40-50 सौर ऊर्जा की लालटेनें एक साथ देता है। वन विभाग अपने धन से यह सामग्री क्रय करता है। सौर ऊर्जा विभाग तब केवल वन विभाग की समस्याओं का समाधान करने आता है। मुझ जैसे इक्के-दुक्के लोगों की समस्याओं की वह अनदेखी करता है। न करता तो अब तक हजारों घरों में सौर ऊर्जा का प्रयोग हो चुका होता।
देहरादून में इस विभाग का मुख्यालय है। सैकड़ों कर्मचारी इस विभाग में काम करते होंगे। शासन इस पर लाखों रुपए खर्च करता होगा। लेकिन मंत्री से लेकर नीचे के स्तर तक कोई यह पूछनेवाला नहीं है कि विभाग क्या प्रगति कर रहा है। एक छोटा सा सवाल है: पिछले 20 वर्षों में सौर ऊर्जा ने उत्तराखंड में क्या प्रगति की? कितने व्यक्तियों ने यहाँ सौर ऊर्जा द्वारा पानी गर्म करने के उपकरण लगाये हैं ? कितनों ने लालटेनें खरीदी हैं ? लालटेनों के दामों पर कुछ सब्सिडी मिलती है। अतः अपने लोगों को अनुग्रहीत करने के लिये इस विभाग के कर्मचारियों ने लालटेनें अवश्य दी हैं।
सौर ऊर्जा के विभिन्न उपकरण अब दिल्ली-गाजियाबाद, मेरठ इत्यादि शहरों में बिक रहे हैं। उत्तराखंड का वैकल्पिक ऊर्जा विभाग इन उपकरणों का प्रचलन क्यों नहीं करता ? यह व्यापारिक काम समझा जाता है और सरकारी अफसर व्यापार का काम नहीं करना चाहते। लेकिन वहीं नदियों के जल को सुरंगों में डाल, बिजली बनाने का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है। इस काम का ठेका देने में शायद अधिकारियों का अच्छा पैसा बनता होगा, इसीलिए स्थानीय लोगों के लगातार विरोध के बावजूद ऐसी परियोजनायें बनाई जा रही हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ों में हवा बहुत और खूब तेज चलती है। पंखे लगा कर हवा से दुनिया भर में ऊर्जा का निर्माण किया जा रहा है। डेनमार्क तथा हॉलैंड में 30 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा हवा से बनाई जाती है। इस नये राज्य के चमोली जनपद में भी हॉलैंड से मँगाए गए दो हवा-चालित पंखे लगाए गए हैं: एक जोशीमठ के ऊपर औली में तथा एक बदरीनाथ में। इनमें से एक भी एक मिनट नहीं चला। लगभग 25 सालों से उनके खंभे पिशाच की तरह खडे़ हैं। योरोप से खरीद कर इन्हें लाने में अवश्य धन लगा होगा। लेकिन जनता की गाड़ी कमाई के इस सरकारी धन के दुरुपयोग की कौन परवाह करता है ?
बाहर से लाए इन पंखों में कोई बडी खराबी नहीं होगी। किसी जानकार का कहना है कि उनमें लगे ‘बियरिंग’ इन स्थानों में ठंड के कारण जकड़ गए हैं। इतने वर्षों में किसी ने उनको बदलने या ठीक करने का काम नहीं करवाया। यह कोई बड़ा या पेचीदा काम नहीं है। बडे़-बड़े अधिकारी भी जोशीमठ होते हुए ही बदरीनाथ जाते हैं। उन सबने इन पवन-ऊर्जा के इन शांत पडे़ खंभों-पंखों को देखा होगा। मगर किसी ने भी अभी तक उनकी सुध नहीं ली।
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