जनवरी माह के शुरूआती दिनों में भी पहाड़ सूखे हैं, लोग आसमान की ओर टकटकी लगाए हैं। बादल नित धोखा दे रहे हैं। नदियाँ अपने निम्न स्तर पर पहुँच चुकी हैं। जिन पहाड़ों में शीत ऋतु के प्रारंभ में ही बारिश व बर्फबारी का नजारा होता था, नदियाँ लबालब भरी रहती थीं, वहाँ के हालात अब बदल चुके हैं। बारिश व बर्फबारी न होने से मौसम में आये बदलाव से बीमारियों में इजाफा हुआ है। पेट दर्द, जुकाम, उल्टी-दस्त, बुखार से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी है।
जलवायु परिर्वतन ने उत्तराखंड को प्रत्यक्ष प्रभावित किया है। मौसम में बदलाव, जल संकट, हिमनदों का पीछे हटना, नदियों का जल स्तर घटना, भू-क्षरण, भूस्खलन आदि यहाँ के जलवायु परिवर्तन की स्थितियों को बताते हैं। टौंस, यमुना, भागीरथी, जलकुर, बालगंगा, भिलंगना, लस्कर, मंदाकिनी, अलकनंदा, रामगंगा, सरयू सहित करीब एक दर्जन से अधिक नदियों पर इसका सीधा-सीधा प्रभाव पड़ा है। ज्ञात हो कि उत्तराखंड से दो तरह की नदियाँ निकलती हैं। पहली, हिमपोषित व दूसरी वर्षा पोषित। हिम पोषित नदियाँ हिम ग्लेशियरों में बर्फ की कमी के चलते संकट में हैं, तो वर्षा आधारित नदियाँ वर्षा न होने से संकट में दिखाई दे रही हैं। इस तरह से नदियाँ उजड़ने की कगार पर हैं। समय से पूर्व पेड़ों में फल लगना, फूलों का खिलना जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारण माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार पेड़-पौधों, वनस्पतियों को अनुकूल तापमान व वातावरण न मिलने की वजह से ये स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। फूलों, फलों व वनस्पतियों का वार्षिक चक्र गड़बड़ा रहा है। कम बर्फबारी व सूखे की स्थिति से किसानों को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। मौसम चक्र ने इस हिमालयी राज्य के फसल चक्र को भी प्रभावित किया है। कृषि उपज कम होती जा रही है, जिसका नुकसान स्थानीय किसानों को उठाना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रवाह लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है। बाढ़ व भूस्खलन बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आए हैं। वर्षा जल की कमी से कृषि भूमि व जंगल सिकुड़ रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर चलने वाली टोकरी, लकड़ी के बर्तन, रेशा उद्योग, पनचक्की सहित कृषि उत्पादों पर आधारित आजीविका भी प्रभावित हुई है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हिमालय के हिमखंडों, ग्लेशियरों, नदियों, वनों, बारिश, वर्षा, तापमान में पड़ा है। या यूँ कहें इन सब में आए परिवर्तनों ने जलवायु परिवर्तन को न्यौता दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के असर से भागीरथी नदी का उद्गम स्थल गंगोत्री ग्लेशियर पिछले दो शताब्दी में 10 मीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से पीछे हट रहा है। जंगलों में लगने वाली आग से वह वनस्पतियाँ व छोटे जीव-जंतु तबाह हो रहे हैं, जो पर्यावरण का संरक्षण करती हैं। बिन मौसम बारिश व बर्फवारी, बारिश के दिनों में प्रचंड गरमी भी इस हिमालयी राज्य में आए जलवायु परिवर्तन के द्योतक हैं। यहाँ के वनों, वनस्पतियों, पानी के स्रोतों व स्थानीय आबादी को तबाह व बेघरबार कर बनाए जा रहे छोटे-बड़े बाँधों ने यहाँ के पर्यावरण चक्र को प्रभावित किया है, जिसने पर्यावरण के मिजाज को बदला है। स्वाभाविक है कि अगर पर्यावरण का मिजाज बदलेगा तो वर्षा, तापमान, धूप आदि का संतुलन गड़बड़ायेगा। जलवायु परिवर्तन सीधा-सीधा पर्यावरण से जुड़ा है। जलवायु परिवर्तन के पीछे जल, ध्वनि, मृदा प्रदूषण जैसे सभी कारक इस राज्य के पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं। भूजल में नाइट्रेट, मैंगजीन, आर्सेनिक, फ्लोराइड की मात्रा बढ़ी है। सीवेज व सीवर का पानी नदियों में गिरने से नदियाँ प्रदूषित हुई हैं। कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग ने मृदा प्रदूषण को बढ़ाया है। राज्य के कस्बों, गाँवों तक धुआँ उगलती गाड़ियों की बढ़ती संख्या ने भी वातावरण को प्रदूषित किया है। राज्य में वायु प्रदूषण के तहत कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन एवं सल्फर आक्साइड के हवा में घुलने से भी यहाँ का वातावरण प्रभावित हुआ है। इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों में होने वाले रेडियोधर्मी, प्रकाश, थर्मल प्रदूषण से भी यह हिमालयी राज्य प्रभावित हुआ है। पॉलीथीन के बढ़ते प्रचलन ने भी यहाँ के पर्यावरण को प्रभावित किया है। बाँध व पनबिजली परियोजनाएँ भी जलवायु परिवर्तन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं।
उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन के खतरों पर पर्यावरण विशेषज्ञ कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन में उग्र मौसमी घटनाओं, तूफान, जंगलों में आग व गर्म हवाओं का योगदान है। ऐसे में उत्तराखंड में हर वर्ष गर्मियों के मौसम में लाखों हेक्टेयर वन भूमि में आग की भेंट चढ़ती है, जिसमें पर्यावरण के मित्र कहे जाने वाले जीव, जन्तुओं, वनस्पतियों की क्षति होती है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सन् 2030 तक गोमुख ग्लेशियर विलुप्त होने की आशंका जाहिर की जा रही है। आशंका यह भी है कि नदियाँ बरसाती नाले में तब्दील हो जाएँगी, पानी के लिए मारामारी होगी, बढ़ती गर्मी से लोग झुलसेंगे।
इसरो द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य हिमालय के अलकनंदा बेसिन के 126 हिमनदों में 1962 से 2004 के बीच 13 प्रतिशत, भागीरथी नदी के बेसिन के 187 हिमनद 11 प्रतिशत पीछे खिसके हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले कई सालों से ग्लेशियरों के तापमान और उसकी आर्द्रता पर प्रभाव पडा है। नासा द्वारा जारी रिपोर्ट व इनके द्वारा ली गई तस्वीरों के हवाले से पर्यावरणविद् मौसम परिवर्तन के हिमनदों पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित करते हैं। डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ 2005 की रिपोर्ट पर गौर करें तो हिमालयी ग्लेशियर जो वर्तमान में 5 लाख वर्ग किलोमीटर हैं, 2035 तक एक लाख वर्ग किमी. रह जायेंगे। पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन हिमालय, तिब्बत के पठार और उपमहाद्वीप के दक्षिणी हिस्सों के करोड़ों जिंदगियों को प्रभावित कर सकता है। सन् 60 के दशक में सर्दियों के मौसम में एक दिन में कम से कम चार फुट वर्फ गिरती थी। वह रफ्तार अब थम चुकी है। गंगोत्री ग्लेशियर में अब सालाना बर्फवारी 6 इंच रिकार्ड की जा रही है, जो पहले के मुकाबले बेहद कम है। मौसम में आ रहे बदलावों, प्रभावों व उससे निपटने के लिए उत्तराखंड सरकार ने कोई नीति नहीं बनाई है। न ही ग्लोबल वार्मिग से संबधी रिपोर्टों पर शासकीय स्तर पर गहन मंत्रणा ही की जा रही है। जलवायु, नदी, वर्षा, बर्फ, ग्लेशियर को लेकर दीर्घकालिक अध्ययन व शोध की कमी को महसूस किया जा रहा है। स्वच्छता, सुरक्षा, पेड़, पर्यावरण जैसे मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। हालांकि कुछ पर्यावरणविद् व पर्यावरण पर काम करने वाले संगठन नदी बचाओ अभियान के तहत जल यात्राएँ निकाल कर लोगों को बदलते पर्यावरण के मिजाज व जलवायु परिवर्तन के बारे में बता रहे हैं। हिमालय बचाओ अभियान के जरिए भी लोग हिमालय के पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
पेड़ों में फल न हों, पौधों में फूल न हों, चारों और हरियाली न हो, नदी में पानी न हो, पहाड़ बर्फ से न ढँके हों,वातावरण में चिड़ियों की गूँज न हों, बादल व बरसात का मेल न हो तो फिर हिमालय की सार्थकता ही क्या रह जाती है ? उत्तराखंड इन्हीं सवालों से दो-चार हो रहा है।























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