क्यों बना होगा यह उत्तराखण्ड ?
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि एक ऐसा जलजला आये कि यह पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाये…..इसके एक करोड़ निवासी, यहाँ की 53,483 वर्ग किमी. जमीन, 35,394 वर्ग किमी. जंगल, यहाँ के 15,761 गाँव, 165 नगर-कस्बे…? क्या जरूरत है कि इस सबका अस्तित्व रहे ? जब आपकी कोई अस्मिता नहीं, अपनी कोई भाषा-बोली नहीं, अपनी जमीन अपने जंगल पर कोई अधिकार नहीं……
17 साल पहले इसी सितम्बर के महीने में ही तो हजारों-हजार लोग जलूस निकालते थे, उसी तरह जैसे अभी पिछले महीने अण्णा हजारे के अनशन के दौरान निकाल रहे थे…….आज दो अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो! दे दिया राज्य, बन गई आपकी सरकार! अब खुश ? कर खाओ जो कुछ करना है….
मुजफ्फरनगर कांड का घाव अभी भी रिसता है। उसके अपराधियों को आज तक घंटे भर की भी सजा नहीं हुई। उल्टे उनके ढेर सारे प्रमोशन हुए और अब अफवाह है कि बुआसिंह का एक बेनामी होटल भी चलता है मसूरी में। हमारी अपनी हाईकोर्ट ने अनन्तकुमार सिंह को बरी कर दिया था 200 3 में, लेकिन तब आन्दोलनकारियों में थोडा़ दम-खम बचा था। उन्होने अदालत का फैसला फूँकने का दुस्साहसिक निर्णय लिया तो अदालत को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। अब वह जज्बा भी कहाँ रहा ? आन्दोलनकारी या तो मर-खप गये हैं या थक गये हैं या अपने लिये जगह बना कर एशोआराम की जिन्दगी जी रहे हैं।
और यहाँ हाईकोर्ट का एक नया फैसला आ गया है कि उत्तराखंड में जमीन खरीदने पर कोई रोकटोक नहीं लगाई जा सकती। जो चाहे जितनी जमीन खरीदे। जो मनमर्जी आये उस जमीन पर करे ? अदालत भी क्या करे? उसे तो संविधान के संदर्भ में कानून की व्याख्या करनी है। सरकार की ओर से पैरवी करने वाले ही हाथ-पाँव छोड़ देते हैं। अदालत को यह समझाने की कोशिश ही नहीं करते कि यहाँ के लोग तो कश्मीर की तरह धारा 370 की माँग करते रहे थे आन्दोलन के दौरान। कश्मीर में कोई लड़की किसी गैर कश्मीरी से शादी कर ले तो उसके भूमि सम्बन्धी अधिकार खत्म हो जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में कोई आई.ए.एस. अधिकारी पूरी उम्र भी वहाँ नौकरी कर ले तो भी जमीन का एक टुकड़ा नहीं खरीद सकता। और यहाँ उत्तराखंड में….?
राज्य बन जाने के बाद यहाँ की सरकारों ने भूकानून के मसले को भरसक लटकाये रखने की कोशिश की। राजनैतिक दलों के स्वार्थ भूमाफियाओं से ही जुड़े होते हैं। फिर बमुश्किल एक मरियल सा कानून बन पाया था। कानून भी क्या था, तिनके की ओट में इज्जत छुपा कर रखने की एक कोशिश थी। भूमाफिया तो अपना खेल खेल ही रहे थे। सरकार, राजनैतिक दल और नौकरशाही सब उन्हीं के साथ थे। पिछले कुछ सालों में जमीन सम्बन्धी कितने तो घोटाले उत्तराखंड ने देखे। लेकिन फिर भी कहने के लिये एक कानून था। अब वह भी रद्दी की टोकरी में जाता दिखाई दे रहा है। तभी तो कहता हूँ कि क्यों बना होगा यह निगोड़ा राज्य ?