मेरी दुकान,मकान लूट लिया गया और पुलिस ने कुछ नहीं किया
मैं आपके निष्पक्ष पत्र की ख्याति सुनकर अपनी व्यथा लिख भेज रहा हूँ। आशा है मुझे न्याय दिलवाने की कृपा करेंगे। मैं ग्राम छुलापे बर्दाखान, तहसील लोहाघाट, जिला चम्पावत का स्थायी निवासी हूँ। बर्दाखान में मेरे दादा स्व. टीकाराम पंत के समय से दुकान है और पाँच मकान हैं। मैं बर्दाखान शाखा पोस्ट ऑफिस में डाकपाल भी रहा हूँ। मैं अपने वृद्ध माता-पिता के साथ दुकान व डाकखाना चला रहा था और मकानों से किराया भी आ रहा था। मेरे पिताजी अवकाशप्राप्त अध्यापक हैं। हमारा जीवन व्यवस्थित चल रहा था। लेकिन दिनांक 6-7-2009 को रात 11 बजे ग्राम लुवाकोट का हरीश सिंह अधिकारी ने अपने पूरे गिरोह के साथ आ कर मेरी दुकान, मकान तथा डाकघर का सारा सामान तोड़फोड़ कर बर्बाद कर दिया और डाकघर के सारे कागजाद व सामान फाड़ व तोड़ कर छुलापे गधेरे में फेंक दिया। मैं तब अपने बच्चों के साथ दुकान से कुछ दूर गाँव में था। सूचना मिलने के बाद मैंने एस.डी.एम., लोहाघाट को फोन किया तो उन्होंने पुलिस भेजी। मैं पुलिस के आने पर दुकान में आया तो हरीश सिंह व उसके 6 अन्य साथी तोड़-फोड़ कर रहे थे।
पुलिस को देखकर उसके साथी भाग गये और हरीश को पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ लिया। लेकिन हरीश के साथियों को न पकड़ा गया और न उनसे पूछताछ ही की गई। हरीश के साथियों के हौंसले बुलन्द हैं। पुलिस ने मुझसे कहा कि यह उनका क्षेत्र नहीं है, लिहाजा नायब तहसीलदार को रिपोर्ट करो। मैंने 9 जुलाई को नायब तहसीलदार को रिपोर्ट की, लेकिन उन्होंने मेरी रिपोर्ट को बदल कर केवल हरीश सिंह को मुल्जिम बनाया। इन छूटे व्यक्तियों ने गाँव में मुझे व मेरे परिवार को खत्म करने की योजना बनाई, जिससे भयभीत होकर 9 जुलाय को मैं अपने पुश्तैनी कारोबार-दुकान, जमीन, जायदाद सब छोड़ कर पिथौरागढ़ आ गया हूँ। मैंने शासन-प्रशासन से अपनी सुरक्षा की माँग की, लेकिन किसी ने भी मेरी व मेरे परिवार की सुध लेने की चेष्टा नहीं की। उल्टा हमें डराया। उत्तराखंड में ग्रामीण इलाकों में गुंडे-बदमाशों की समानान्तर सरकार चल रही है। उनके सामने पुलिस, पटवारी, कानूनगो सभी बौने हो गये हैं।
अतः आपसे निवेदन है कि मेरी व्यथा छापने के साथ ही मुझे न्याय दिलाने की भरसक कोशिश करने की कृपा करें।
प्रकाश चन्द्र पन्त द्वारा जोशी गारमेंट्स, सुभाष चौक, पिथौरागढ़
लोग शहीदों को इतनी जल्दी क्यों भूल जाते हैं ?
आखिर हम लोग शहीदों को इतनी जल्दी क्यों भूल जाते हैं ? जो लोग दुर्गम कारगिल पहाड़ियों में जान हथेली पर लेकर सीमा की रक्षा करते हैं। उनके शहीद हो जाने पर नेता उनकी बहादुरी का बखान करते नहीं थकते और प्रशासन पुरस्कार बाँटते। फिर समय बीतते ही भूल जाते हैं शहीद और शहादत को। क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि शहीदों की बरसी पर उनकी वीरता के किस्सों को गर्व से याद करें। उन शहीदों को नमन करें जो सीमा पर देश के काम आये।
कुछ मिनट मौन रहकर श्रद्धांजलि पाने के लिये एक सैनिक फौज में भर्ती नहीं होता। सेना में भर्ती के समय लम्बी कतारों में खड़े नौजवानों के दिल में जोश और जज्बा होता है कि कब दुश्मन के दाँत खट्टे करें। उनके शहीद हो जाने पर प्रशासन और स्थानीय लोग उनकी शहादत पर गर्व महसूस करते हैं और उनके नाम पर स्कूल, सड़क का नाम रखकर एक मूर्ति लगाकर, स्मारक बनाकर इति श्री कर लेते हैं। जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, लोग शहीद और शहादत को भूल जाते हैं। बढ़-चढ़ कर भाषण देने वाले नेता और प्रशासनिक अधिकारी अखबारों व न्यूज चैनलों के बार-बार बताने के बाद भी उपस्थित नहीं होते और गाहे बगाहे आ भी गये तो एक औपचारिकता निभा कर चले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि हम शहीदों के स्मारकों के सामने खड़े होकर उन्हें शर्मिन्दा तो नहीं कर रहे हैं।
ऐसा ही हुआ नैनीताल में मेजर शहीद राजेश अधिकारी की दसवीं बरसी पर। 26 जुलाय 2009 रविवार को भले ही देश भर में कारगिल विजय दिवस मनाया गया हो, पर यहाँ विजय दिवस का उल्लास नदारद था। शहीद राजेश अधिकारी के बड़े भाई श्याम सिंह अधिकारी व भाभी करुणा अधिकारी, कुमाऊँ मंडल विकास निगम के कर्मचारी और नैनीताल शहर के कुछ रंगकर्मी ही उपस्थित थे। उन्होंने ही मोमबत्तियाँ जला कर शहीद राजेश अधिकारी को श्रद्धांजलि दी। न प्रशासन की ओर से कोई आया, न नगरपालिका की ओर से। जब शहीद राजेश अधिकारी मार्ग का उद्घाटन हुआ था तो प्रशासन, स्थानीय लोगों और राजनैतिक दलों ने बढ़-चढ़ कर भागेदारी की थी। शहादत की दसवीं बरसी पर किसी को भी शहीद राजेश अधिकारी की याद नहीं आयी।
भुवन बिष्ट नैनीताल
फोटो : साभार इन्डिया टुडे
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