चाँई गाँव में भूमि धँसने से मकानों का टूटना एकदम नई बात नहीं है। उसके नीचे से अलकनंदा का पानी लाने की सुरंग बनाने से इस गाँव की भूमि लगभग पाँच सालों से धँसती जा रही है। अब उसने इतना भयंकर रूप ले लिया है कि वहाँ के निवासियों का जीवन बचाने शासन उन्हें अस्थायी तौर पर कहीं और रहने ले जाने लगा है।
अभी तक कहा जाता रहा है कि नदी के प्रवाह पर बिजली बनाने से कोई खतरा नहीं होता, बाँधों से होता है। सो टिहरी के बाद पहाड़ों में बड़े बाँधों का बनना बंद हो गया। लेकिन यहाँ विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना में हाथी पहाड़ के अंदर से पानी लाने की 12 किलोमीटर लम्बी सुरंग भूमि धँसने का संकट ले कर आ गई। इस तरह की सुरंगें इस क्षेत्र में छः और परियोजनाओं के लिए बनेंगी। इनमें से नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन की 530 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना पर तो काम भी शुरू हो गया है। उसके लिए धौली गंगा का पानी ले जाने 12 किलोमीटर की सुरंग बनेगी।
पिछले साल पूरी हुई विष्णुप्रयाग परियोजना की सुरंग के ऊपर तो केवल एक ही गाँव, चाँईं है। किन्तु अन्य निर्माणाधीन सुरंगों के ऊपर आधा दर्जन गाँव और इस सरहद का आखिरी शहर, जोशोमठ बसा है। क्या इनके बनने से चाँईं जैसा भूमि धँसाव होनेवाला है ? यदि होता है, जिसकी आशंका चाँईं की स्थिति को देखते हुए बन गई है, तो इस पूरे क्षेत्र से लोगों को हटाना पड़ेगा। इन योजनाओं में से एक का अधिकारी कह रहा था कि बिजली बनाने से इतनी कमाई होती है कि उसके लिए यहाँ के हजारों लोगों के पुनर्वास करने जितना भी धन देना पड़े तो वह बिजली कम्पनियाँ दे देंगी, क्योंकि उनकी बिजली से आय उससे कई गुना अधिक होगी। किन्तु क्या यहाँ के हजारों लोग अपना घर-बार, खेती-बाड़ी, वातावरण और समाज छोड़, दूर कहीं और बसने तय्यार होंगे ? टिहरी बाँध के सभी विस्थापितों का 20 साल बाद भी पुनर्वास नहीं हो पाया है और जिन लोगों को बसने और जगह ले जाया गया, वे वहाँ जम नहीं पा रहे हैं।
हाथी पहाड़, जिसमें सुरंग बनने से भूमि धँस रही है, भूगर्भ विज्ञानियों के अनुसार, मज़बूत, ठोस चट्टानों का बना है, जिसमें सुरंग बनाने से कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना था। जोशीमठ और उसके आगे के गाँव, जिनके नीचे से धौली गंगा का पानी लाने वाली सुरंग बनेगी। भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, मज़बूत चट्टानों पर नहीं, बल्कि एक बहुत पुराने मलबे के ढेर (मोरेन) पर बसे हैं। मज़बूत चट्टानों के बिना इस कच्ची बुनियाद पर बसे इस शहर और गाँवों को तो इनके नीचे बनने वाली सुरंग और आसानी से धँसा कर नष्ट कर देगी।
लगभग सात साल पूर्व, चाँईं और हाथी पहाड़ को खतरे से बचाने इस क्षेत्र के निवासियों ने तब पौड़ी के सांसद भुवनचन्द्र खंडूड़ी (अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री), बदरी-केदार के विधायक केदार सिंह फोनिया तथा मुझे जे.पी. एसोसिएट्स के चेयरमैन जे. पी. गौड़ तथा केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों से इस समस्या पर बात करने दिल्ली भेजा था। जे.पी. एसोसिएट्स को विष्णुप्रयाग में अलकनंदा के पानी से 400 मेगावट बिजली बनाने का ठेका मिला था और इस कंपनी ने हाथी पर्वत के अंदर से पानी लाने सुरंग बनाने का काम आरंभ कर दिया था। इस सुरंग के कारण चाँईं गाँव में रहने वाले एक सौ परिवार बहुत चिंतित थे। आरंभ में ही विस्फोटों से सुरंग बनाने का जो काम हुआ था उससे पूरा हाथी पहाड़ और गाँव हिल गया था। दिल्ली में हम तीनों गौड़ से मिले। उन्होंने आश्वासन दिया कि उनकी परियोजना से उस क्षेत्र में कोई क्षति नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि वे जोशीमठ आकर लोगों के सुझाव सुनेंगे और उन पर अमल करेंगे। यह जान कर कि खंडूरी तथा फोनिया भाजपा के नेता हैं, उन्होंने उस पार्टी का बड़ा गुणगान भी किया और कहा कि कल्याणसिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए ही उन्हें विष्णुप्रयाग परियोजना दी गई थी। मेरे यह कहने पर कि उनके विस्फोटक हाथी पहाड़ को ही नहीं, बल्कि सामने के पहाड़ पर बसे जोशीमठ को भी हिला रहे हैं, उन्होंने कहा कि वे शीघ्र ही एक बड़ी टनल बोरिंग मशीन से काम करेंगे और विस्फोट करना पूरी तरह बंद कर देंगे। यह पूछने पर कि आप उस तंग सड़क पर कैसे 10 से भी अधिक पहियों की बडी मोटर गाड़ी ले जायेंगे, उन्होंने कहा कि वे स्वयं इंजीनियर हैं और मशीन को खोल, उसको टुकड़े-टुकड़ों में विष्णुप्रयाग पहुचायेंगे और फिर वहाँ उसे दुबारा जोड़ लेंगे।
लेकिन उनकी वह सुरंग बनाने वाली मशीन विष्णुप्रयाग कभी नहीं आई और सारी 12 किलोमीटर सुरंग विस्फोटों द्वारा ही बनाई गई, जिससे सारा पहाड हिल गया और चाँईं गाँव के बहुत से घर टूट गए। क्या सरकार सचमुच इस सारे पहाड़ी सीमांत क्षेत्र को आनेवाले समय में लोगों से खाली करवा देगी ?