520 मेगावाट की तपोवन- विष्णुगाड़ जल- विद्युत परियोजना कठिनाई में पड़ गई है। यदि यही स्थिति रही तो यह समाप्त भी हो सकती है। इस परियोजना के विरुद्ध जोशीमठ नगर तथा आसपास के प्रभावित ग्रामीण सालों से आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच जो सबसे बडी समस्या उभर आई है, वह है इस योजना के लिए धौली नदी का पानी लानेवाली सुरंग में से एक बडी जलधारा का फूट निकलना, जो बंद होने का नाम ही नहीं ले रही है। इसके फूटने के बाद कई नदियाँ-गधेरे तथा जलस्रोत सूख गए हैं। पानी के लिये हाय-हाय मच गई है। 11 किमी. से अधिक की यह प्रस्तावित सुरंग, जो जोशीमठ तथा कई गाँवों के नीचे से जाएगी, अभी चार किमी से भी कम खुद पायी है। पूरी होने पर यह क्या कहर ढायेगी, यह सोच कर लोग भयभीत हैं।
लोगों ने एक संयुक्त संघर्ष समिति बना कर चार माँगें रखी हैं: इस सारे क्षेत्र, जहाँ परियोजना बन रही है, को प्रभावित क्षेत्र घोषित किया जाय; इसमें पेयजल की व्यवस्था की जाये; इस इलाके में प्रत्येक घर-खेतों का बीमा किया जाये ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें मुआवजा मिल सके; तथा एक उच्च स्तरीय समिति, जिसमें भूगर्भीय वैज्ञानिक, सरकारी अफसर तथा स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता हों, बनाई जाये जो इस योजना की समीक्षा करे और उसके बनने या न बनने पर अपना निर्णय दे। इन माँगों के समर्थन में पिछले तीन महिनों से जोशीमठ तहसील के बाहर प्रतिदिन धरना चल रहा है। पहली अप्रेल से वहाँ क्रमिक अनशन भी आरंभ हो गया है। 33,000 करोड़ रुपए इस परियोजना को बनाने जा रही केंद्र सरकार की नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन ने आश्वासन दिया है कि इस क्षेत्र के पीने के पानी की व्यवस्था करने के लिए जो कुछ खर्च आएगा वह सब कंपनी वहन करेगी। उसने कहा है कि उत्तराखंड जल संस्थान तथा जल निगम पानी के स्रोतों का पता लगा लें और तब वहाँ से शहर-गाँवों तक पीने का पानी लाने का काम कंपनी अपने खर्चे से करेगी। सुरंग बनने से यदि घर-खेत धँस कर टूटते हैं तो उनका बीमा करने के बारे में या सारे क्षेत्र को योजना-प्रभावित घोषित किए जाने के बारे में उसने कोई आश्वासन नहीं दिया है।
कम्पनी ने संघर्ष समिति को पत्र लिख कर कहा है कि वह फिलहाल अपना धरना तथा भूख हड़ताल स्थगित कर दे, ताकि उसकी माँगों पर निर्णय लिया जा सके। इसके लिए समिति एक महीने का समय देने तैयार है। इस बीच अप्रेल अन्त में मुख्यमंत्री यहाँ ब्लॉक के नये भवन के उद्घाटन के लिए आने वाले हैं। इस शहर, जहाँ वे शिक्षक रह चुके हैं, से उनका पुराना संबंध है। यहाँ की जनता आशा लगाये है कि वह इस संकट के निवारण के लिए कुछ फैसला लेंगे।
परियोजना में अवरोध कंपनी की भीमकाय सुरंग खोदने की मशीन के भूमि के नीचे तीन किलोमीटर अंदर फँस जाने से आया है। खोदते समय दिसंबर में 600 लिटर प्रति सेकिंड बहने वाली एक बडी जलधारा पहाड़ से फूट कर निकल आई। तबसे वह लगातार निर्बाध बह रही है और कम नहीं हुई। उसी के कारण इस क्षेत्र के अधिकतर जल स्रोत सूख गए हैं। सुरंग से पानी के बहाव के कारण खोदनेवाली मशीन न बाहर निकल पा रही है और न ही आगे बढ़ पा रही है। ऊपर से चट्टान गिरने से उसकी कुछ क्षति भी हुई। अब कहा जा रहा है कि कंपनी सुरंग में एक घूम दे कर मशीन को बाहर निकालने का प्रयास करेगी।
संघर्ष समिति का कहना है कि यदि पेयजल तथा अन्य क्षेत्रीय समस्याएँ सुलझाने काम काम एक महीने में नहीं हुआ तो वह अपनी माँगों के लिए पुनः धरना तथा क्रमिक भूख हडताल आरंभ कर देगी। उत्तराखंड में सर्वत्र ही जनता नदी परियोजनाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रही है। इनमें जोशीमठ की लड़ाई सबसे लंबी रही है।
Let me first Chandolaji and Nainital Samachar for bringing out dark facts about situation in Uttarakhand. It is turning into a police state where democratic dissent would be brutally stopped like what is happening in Chhatishgarh and Jharkhand. There is a need to oppose it not just through the courts but politically. I know both the BJP and Congress have been playing in the hands of corporate capitalists and we know well that people’s movement need to be developed in the state.
I would be happy to discuss these issues. As a person involved in land rights struggles in different parts of the country, it would be essential to strengthen democratic dissent in Uttarakhand so that it could be saved. The pahad are calling all of us and we need to respond.
With warm regards,
Vidya Bhushan Rawat,
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