तराई-भाबर में बसे थारू-बोक्सा आदिवासियों की जमीन हड़पने व बंगाली विस्थापितों को जमीन से ही बेदखल कर देने की प्रवृत्ति के खिलाफ उत्तराखण्ड किसान सभा द्वारा अभियान छेड़ा गया है। इस अभियान में आ रही अड़चनों को लेकर उत्तराखण्ड किसान सभा के प्रान्तीय अध्यक्ष एवं माकपा नेता बच्चीराम कौंसवाल पिछले दिनों जिलाधिकारी उधमसिंह नगर व आयुक्त, कुमाऊँ मंडल से मिले। उन्होंने इन अधिकारियों को बताया कि भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से आए विस्थपितों को भारत सरकार द्वारा जो भूमि पट्टे पर दी गई थी उसकी सूदखोर महाजनों द्वारा बड़े पैमाने पर लूट की गई है। इस कृत्य में भ्रष्ट राजनीतिज्ञों व राजस्व विभाग की मिलीभगत होने के कारण खुर्द-बुर्द की गई सैकड़ों एकड़ भूमि को वापस दिलाने में अड़चन आ रही है।
किसान सभा द्वारा पिछले चार वर्षों में सूदखोरों के कब्जे से 78.59 एकड़ भूमि छुड़ा कर पट्टाधारक काश्तकारों द्वारा बैंक ऑफ बड़ौदा की मदद से सूदखोरों को 17,75,400 रुपए का भुगतान किया गया। यह कार्य जिला प्रशासन की मदद से बिना पुलिस बल इस्तेमाल किए कर लिया गया। श्री कौंसवाल बताते हैं कि भूमि मुक्त करने के लिए तय किये गये एक सुसंगत फार्मूले के अनुसार सूदखोर द्वारा काश्तकार से कर्ज के नाम पर दबाई गई भूमि का 30 प्रतिशत मूलधन काट कर कर्ज की वापसी की गई। फार्मूले में स्पष्ट है कि सूदखोरों के साथ भूमि का क्रय-विक्रय अथवा किसी प्रकार का हस्तांतरण मान्य नहीं होगा। पूर्व सैनिकों द्वारा खरीदी गई भूमि का बिक्रीनामा सूदखोरी के दायरे में नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने काश्तकार को भूमि का पूरा-पूरा दाम चुकाया है और भूमि की ठगी नहीं की है। ऐसे मामलों में क्रेता-विक्रेता के आपसी समझौता का विकल्प बना रहेगा। सूदखोर साहूकार का कर्ज चुकाने के लिए जिला प्रशासन की संस्तुति पर जिला सहकारी बैंक या किसी राष्ट्रीयकृत बैंक द्वारा काश्तकार को सस्ती ब्याज दर पर कृषि ऋण मुहैया कराया जायेगा। इस सूत्र की अवहेलना करने वाले सूदखोर के विरुद्ध पुलिस बल की सहायता से पट्टे की भूमि छुड़ा ली जाएगी तथा कर्ज की रकम भी नहीं लौटाई जाएगी।
लेकिन सूदखोरों द्वारा शासक दलों के बीच अपनी पैंठ बना कर भूमि मुक्त करने की इस कार्रवाही में अड़चन पैदा की जा रही है। राजनैतिक दबाव में प्रशासन काश्तकारों को राजस्व अदालतों में उलझाकर सूदखोरों को लूटी गई भूमि पर काबिज रख कर लाभ पहुँचा रहा है। सूदखोर सरकार से ऐसी राजाज्ञा भी जारी कराने में जुटे हैं, जिसमें उन्हें अवैध कब्जे की भूमि पर ‘भूमिधरी अधिकार’ हासिल हो सके। इधर उत्तराखण्ड किसान सभा द्वारा कहा गया है कि पट्टेधारकों की जो भूमि गिरवी/इकरारनामा/बिक्रीनामा अथवा जबरन कब्जा कर उसे भू अभिलेखों की किसी भी श्रेणी में दर्ज करवाई गई है, वह पूरी तरह से गैरकानूनी है। इसलिए जब तक पट्टे की भूमि पट्टाधारक के कब्जे में वापस नहीं आ जाती है, तब तक ‘भूमिधरी अधिकार’ की राजाज्ञा स्थगित रखी जाय। यह माँग की गई है कि उक्त फार्मूले के अनुसार भूमि मुक्त करने के कार्यक्रम पर अविलम्ब कार्रवाही हो तथा शेष 124 मामलों को निस्तारित किया जाय।
यहाँ यह जानना आवश्यक है कि भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थियों को उनकी गुजर-बसर के लिए भारत सरकार द्वारा गवर्नमेंट ग्रान्ट्स एक्ट 1895 के अन्तर्गत तराई क्षेत्र में भूमि पट्टे पर आबंटित की गई थी। लेकिन इस भूमि के क्रय-विक्रय अथवा हस्तांतरण का अधिकार नहीं था। किंतु बाद के वर्षो में इस तरह की भूमि को हड़पने के तरीके निकाल लिये गये। इनमें सूदखोरों द्वारा ऋण के ऐवज में भूमि के पट्टे गिरवी रख उस भूमि को कब्जाने के मामले प्रमुख हैं। तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 19 मई 1973 को एक राजाज्ञा जारी कर जिलाधिकारी नैनीताल से इस तरह की गड़बड़ी को रोकने के निर्देश जारी किए गए थे। लेकिन पहली पीढ़ी के विस्थापित अपनी विवशताओं और लालच के चक्कर में अपनी जमीनें गँवा चुकी थी। लेकिन नई पीढ़ी अब जागरूक हो चुकी है और सूदखोरों से जमीन के पट्टे वापस लेने में पूरी ताकत से जुटी है।

























आपकी टिप्पणीयाँ