सलीम मलिक
उत्तराखण्ड की प्रमुख क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी उत्तराखण्ड क्रांति दल जिस वक्त जगहँसाई का पात्र बन कर टूट की कगार पर था, उसी वक्त रामनगर की अग्रवाल सभा में एक और राजनैतिक दल ‘उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी’ राज्य की राजनीति की बिसात पर एक नई इबारत लिखने की जद्दोजहद में जुटा था। गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ सभागार में आयोजित द्वि दिवसीय अधिवेशन के पहले दिन वक्ताओं ने प्रदेश के राजनैतिक हालत पर चिंता जाहिर की। प्रदेश भर से आये पार्टी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि जिस राज्य की परिकल्पना हमारे शहीदों ने की थी वह राज्य अभी नहीं बन सका है। कांग्रेस, भाजपा पर बरसते हुए वक्ताओं ने कहा कि दोनों ही पार्टीयों ने आपस में बारी-बारी से जनता को ठगने का गठबंधन कर रखा है। उक्रांद को नकारते हुए वक्ताओं ने कहा कि इस दल ने कभी भी सिद्धांतो की राजनीति को नहीं पनपने दिया। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पी.सी. तिवारी ने कहा कि उनकी पार्टी ने 2012 के चुनाव में इन दलों को सबक सिखाने का लक्ष्य रखा है। दो वर्ष पूर्व हमारा मजाक उड़ाने वाले लोग आज उपपा की लगातार बढ़ रही ताकत से विचलित हैं। अधिवेशन के दूसरे सत्र में पार्टी के महासचिव प्रभात ध्यानी ने द्विवार्षिक रिपोर्ट रखते हुए पार्टी के गठन से आज तक के हालत पर चर्चा की। उन्होंने माना कि पार्टी को अभी और मजबूती से काम करने की आवश्यकता है। जनता की राजनैतिक निराशा व हताशा की चर्चा करते हुए ध्यानी ने कहा कि उक्रांद द्वारा किये गये विश्वासघात की पूर्ति करना सबसे बड़ी चुनौती है।
दूसरे दिन के पहले सत्र में संविधान संशोधन के मुद्दे पर चर्चा में राज्य की सामाजिक, राजनैतिक पृष्ठभूमि से जुड़े बिंदुओं को और ज्यादा व्यापक तौर पर जोड़ने पर जोर दिया गया। अनेक संशोधनों को सदन की अनुमति के बाद मान लिया गया। दूसरे सत्र के दौरान पार्टी की द्विवार्षिक कार्यकारिणी का चुनाव किया गया। आम सहमति से हुए चुनाव में पुरानी कार्यकारिणी को मामूली संशोधन के साथ स्वीकार कर लिया गया, जिससे 54 सदस्यीय कार्यकारिणी वजूद में आ गई। 11 सदस्यीय राजनैतिक समिति के लिये भी 8 लोगों का चयन सर्वसम्मति से किया गया। कुल मिलाकर नई बोतल में पुरानी शराब की तर्ज पर ही पार्टी के संगठनात्मक चुनाव सम्पन्न हुए। दूसरी बार अध्यक्ष चुने गये पी.सी. तिवारी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के साथ ही उक्रांद को सबक सिखाने का लक्ष्य सौंपा। उन्होंने कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि पार्टी कोई भी ऐसा काम नहीं करेगी जिससे पार्टी के आम कार्यकर्ता के ऊपर किसी को अंगुली उठाने का मौका मिले। तीसरे व अन्तिम सत्र में 30 प्रस्ताव विचारार्थ रखे गये। रामनगर-कालागढ़-कोटद्वार मोटर मार्ग पर यातायात खोले जाने, जल-जंगल- जमीन पर आम जनता के पारम्परिक हकों की बहाली, यूपी से परिसम्पत्तियों का न्यायपूर्ण बँटवारा, दलितों का दमन रोकने, रेल मार्ग बिछाये जाने, ठेकेदारी प्रथा की समाप्ति, पनबिजली परियोजनाओं पर रोक लगाने, आपदा प्रभावितों को राहत देने, बीपीएल कार्ड बनाने में पारदर्शिता लाने, श्रम कानूनों का सख्ती से पालन करने, पीपीपी मोड की परियोजनाओं का काम रोकने, वन भूमि पर रहने वालों को मालिकाना हक दिये जाने, शिक्षित बेरोजगारों को योग्यातानुसार काम या बेरोजगारी भत्ता दिये जाने व स्थानीय भाषाओं व बोलियों का सम्मान व विकास किया जाना आदि प्रस्ताव पारित हुए। राजनैतिक प्रस्ताव में कांग्रेस-भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा गया कि इनकी उदारवादी नीतियों के कारण ही महंगाई चरम पर पहुँची है और माँग की इन नीतियों को त्यागकर महंगाई पर काबू पाया जाये। उक्रांद के विभाजन पर कहा गया कि यह वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि राजनैतिक दिवालियेपन के चलते हुआ है। पार्टी ने इस राजनैतिक शून्य को भरने का दायित्व अपने ऊपर लेते हुए कहा कि राज्य की जनता ने जो सपना देखा था, उसे साकार करने के लिये पार्टी कृतसंकल्प है। एक अन्य प्रस्ताव में माँग की गई कि पर्यावरण, पारिस्थितिकी के संरक्षण तथा परियोजनाओं पर काम करने से पहले उसके इंसानों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बात होनी चाहिये। सभी परियोजनाएँ मानव समाज को बिना उजाड़े व बिना किसी नुकसान के लागू की जायें। पार्टी ने जंगली जानवरों से जनता व फसलों की सुरक्षा, आपदा प्रभावितों को मकान के बदले मकान दिये जाने, माफियाओं की सम्पत्ति को कब्जा कर उसे आपदा प्रभावितों में बाँटने की भी माँग की है।
कुल मिलाकर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के ताप-तेवर बता रहें हैं कि उसके निशाने पर अगर भाजपा-कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल हैं तो उक्रांद को तो वह उनसे पहले ही ठिकाने लगता देखने की ख्वाहिशमंद है। पार्टी का यह सपना हकीकत में कब तक बदलेगा इसका आकलन करना मुश्किल है। लेकिन आने वाले समय में राज्य की राजनीति में विशेष परिवर्तन की आशा तभी नजर आती है, जब उपपा का राज्य की सभी आंदोलकारी ताकतों से तालमेल बने, जो कि आज के हालात में तो जरा मुश्किल ही नजर आता है।