भारत और चीन में कई समस्यायें एक जैसी होंगीं। एक अभी जो उत्तराखंड में उभर रही है, वह वैसी ही है जैसी मध्य चीन में तीन बड़ी नदियों पर बने ‘थ्री गौर्जेज’ नामक एक बड़े बाँध में उत्पन्न हुई है। उसकी तथा टिहरी बाँध की समस्याओं में जो समानता दिखाई दे रही है, उसमें एक है गाद भरना। ‘थ्री गौर्जेज’ 1990 के दशक में बनना आरंभ हुआ था। बहुत विशाल तथा महत्वाकांक्शी होने के कारण आरंभ से ही उस पर विवाद शुरू हो गया था, किन्तु टिहरी की भांति उसमें भी विरोध के स्वरों की अनसुनी कर दी गई। पिछले महीने इस बाँध की पुनर्समीक्षा हुई।
‘थ्री गौर्जेज’ चीन की सबसे बड़ी नदियों याग्ज़ी आदि की बाढ़ को नियंत्रित करने बनाया गया था। अब पुनः समीक्शा करने पर लगता है कि उसमें बहुत सफलता नहीं मिली। 14,00,000 लोगों के विस्थापन तथा भूगर्भीय खतरों जैसी समस्याएँ अब उभर कर आ रही हैं। कहा जा रहा है कि इस बाँध ने 600 किमी. क्शेत्र का पर्यावरण बदल दिया है। बाँध के पीछे जो स्वच्छ पानी की दो बड़ी झीलें थीं, उनका जल स्तर घट गया है। निकासी के पानी से भूस्खलन तथा भूचाल का बड़ा खतरा उपस्थित हो गया है। भूमि के नीचे हलचल बढ़ गई है, जो कभी भी सतह पर पहुँच कर भूकंप में परिवर्तित हो जाएगी। समस्याएँ इतनी हो गई हैं कि अब उनके सार्वजनिक होने पर इस विशालकाय बाँध परियोजना के उद्घाटन के समय न राष्ट्रपति हू जिनताओ और न ही प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ उपस्थित हुए।
चीन में समुद्र न पहुँच पाने वाली पीली नदी, जो खेतों को प्लावित कर खेती का विनाश कर उनमें खो जाती थी, पर पहला बड़ा बाँध, सेमेनसिया, बना था। उसमें इतना गाद भर गया कि उसे विस्फोटकों से तोड़ना पड़ा। अब आशंका व्यक्त की जा रही कि कहीं ‘थ्री गौर्जेज’ को भी इसी प्रकार न तोड़ना पडे़। तब उस पर किया 16 वर्षों का काम तथा धन बेकार साबित होगा।
भारत में टिहरी बाँध की झील में लगातार गाद भरने की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। प्रतापनगर के पहाड़ से लगातार मिट्टी-पत्थर बड़ी मात्रा में गिर रहे हैं, जिससे झील का जल स्तर बढ रहा है। क्या टिहरी बाँध भी ‘थ्री गौर्जेज’ की दशा को प्राप्त होगा ? अभी कुछ समय पहले उसके दूसरे चरण में बनते 400 मेगावट के कोटेश्वर बाँध पर काम बंद करना पडा था, क्योंकि उसमें गाद बढ गई थी। समय आ गया है कि टिहरी बाँध की समीक्षा की जाये।
टिहरी बाँध को लेकर ‘थ्री गौर्जेज’ जैसी ही दूसरी समस्या है प्रतापनगर की रैंका तथा धारमंडल पट्टियों से पलायन। झील बनने से इन स्थानों की ज़िला मुख्यालय से दूरी बहुत बढ़ गई है। पहले यहाँ के लोग एक घंटे से कम में पैदल चल पुरानी टिहरी पहुँच जाते थे और अपनी खरीददारी तथा सरकारी काम कर शाम घर लौट आते थे। सिराईं, दयारा, कंडल, बडकोट जाने के लिये पैदल पुल थे, जो झील में जलमग्न हो गए। अब यहाँ के गाँवों से नई टिहरी मुख्यालय की दूरी 150 से 200 किमी हो गई है। पढ़ाई, व्यापार तथा काम की पहले की सुविधाएँ समाप्त हो गई हैं। तीसरी समस्स्या है पीछे के जल स्तर का घट जाना। इस पर टिहरी में कतई कुछ खोज नहीं हुई है। देखने का समय आ गया है कि यह स्तर बाँध के पीछे घटा है कि नहीं ?
चौथी समस्या है वातावरण का बदल जाना। इस पर भी टिहरी में कुछ काम नहीं हुआ है कि बाँध बनने से जंगलों, खेती तथा गाँवों के जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? टिहरी में अभी उसके दूसरे चरण, पंप स्टोरेज से बनने वाले 1,000 मेगावाट तथा नीचे कोटेश्वर में 400 मेगावाट बिजली बनाने के काम चल रहे हैं। अभी तक केवल प्रथम चरण में 1,000 मेगावाट विद्युत बनाने से जल, वातावरण तथा गाद का क्या प्रभाव पडा, उसके बारे में खोज तथा जानकारी नहीं प्राप्त हुई है। संभव है इन बातों पर कोई ध्यान ही न दे रहा हो। सोचा जा रहा हो कि जब समस्याएँ सामने आएंगी तभी निदान कर लिया जायेगा। लेकिन संभव है, बाद को देर हो जाये। दुर्घटनाएँ होने लगें और तब समझ में ही न आए कि अब क्या करना चाहिए!