भारत में विश्व-स्तर के खेलों के आयोजन पर विवाद का बवंडर उठ जाता है। अभी राष्ट्रमंडल के खेलों की तैयारी तथा उसमें हुई अनिमियताओं पर उठा तूफान थमा नहीं था कि तीन साल पहले तय हुए दक्षिण-एशियाई शीतकालीन खेलों की तैयारी तथा गड़बड़ियों पर प्रश्न उठ गए हैं, जिनका उत्तर देना भी आवश्यक होगा। यह शीतकालीन खेल औली, उत्तराखंड, में होने थे और उन पर लगभग 110 करोड़ रुपयों का खर्च होने पर भी उनके इस वर्ष के अंत में आयोजित होने के बारे में प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है. दरअसल इन खेलों को तीन साल पहले हो जाना चाहिए था, किन्तु तैयारियाँ न हो सकने के कारण उनके आयोजन का समय लगातार आगे बढ़ता रहा। अब उनका दिसम्बर में होने की बात कही जा रही है, जो अभी संभव नहीं लगता।
इन खेलों के आयोजक थे भारत के शीतकालीन खेल फेडेरेशन, जिसके सदस्यों में हैं – भारत सरकार, कश्मीर, हिमाचल तथा उत्तराखंड के राज्य, थल, वायु तथा नौसेना व कुछ अन्य सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि, जो सब मिलाकर 22 होते हैं।
अभी कुछ दिन पहले भारतीय शीतकालीन खेल फेडरेशन का सम्मेलन दिल्ली में हुआ, जिसमें उसके अध्यक्ष बदल दिए गए। श्री सुरेंद्र सिहं पांगती जो पिछले चार वर्षों से अध्यक्ष थे, उनकी जगह ब्रिगेडियर पटवाल को वह पद मिला। वे फेडरेशन के सदस्य थे तथा गढ़वाल जहाँ खेल होंगे उसके निवासीं खेलों से उनका कोई अधिक वास्ता नहीं रहा, नही श्री पांगती का था। ब्रिगेडियर पटवाल का कहना है कि वे दक्षिण एशियाई खेलों से पहले राष्ट्रीय खेलों का आयोजन करेंगे। दिसंबर में यदि राष्ट्रीय खेल, जिनमें भारतीय पर्वतीय राज्य भाग लेंगे तो दक्षिण एशियाई खेलों का आयोजन जनवरी-फरवरी तक ही हो पायेगा। वह भी अभी पक्का नहीं है।
यह खेल 2008 के शीतकाल में होने को थे। तैयारी न होने के कारण उन्हें एक साल बाद करना तय किया गया। स्की-स्लोप (ढाल जिस पर खिलाड़ी बर्फ पर तेज़ी से फिसलने की प्रतियोगिता करते हैं), बनाने आस्ट्रिया के एक विशेषज्ञ को यह काम दिया गया. उसने अंतर्राष्ट्रीय मानकों का एक अच्छा 1,100 मीटर लंबा तथा 40 मीटर चौडा, ऊपर पहाड़ की चोटी से नीचे मोटर सड़क तक आता हुआ स्की-स्लोप बनाया। यह स्लोप ऊँचाई के घास के ढलान (बुग्याल) पर बना। उसे बनाने ढाल की सब घास खोद-उखाड़ कर उसे नंगा किया गया। नीचे केवल मिट्टी की तह रह गई थी. इन ऊँचाई के घास के ढलानों के बारे में कहा जाता है कि उनके किसी भाग को यदि खोदो या उससे छेड़ छाड़ करो तो वह घाव फैल कर बढ़ने लगता है तथा उसकी रोकथाम करना कठिन हो जाता है़। यह एक अत्यंत संवेदनशील वातावरण वाला भूभाग है जिस पर किसी भी प्रकार छेड़खानी करना मना है।
स्की-स्लोप बना अपने काम का पैसा ले आस्ट्रिया का विशेषज्ञ अपने देश वापस चला गया। मशीनों तथा मज़दूरों द्वारा स्लोप बनाने का काम करने वाली कंपनी, स्पेसएज, काश्मीर की थी। वह भी काम समाप्त कर अपना पैसा ले वापस चली गई। एक और विदेशी कंपनी। स्नो-स्टार, इटली से आई थी। जिसने बर्फ बनाने की मशीन लगाई जिसे सारे स्की स्लोप पर फैलाने का काम करना था। बर्फ बनाने स्लोप के पास ही एक झील, लगभग 10 किलोमीटर दूर ऊँचाई से पानी नलों द्वारा ला कर बनाई गई। इस स्लोप पर एक उद्योगपति ने क्लिफ टाप नाम का एक बड़ा तथा महंगा होटल बना लिय था। वह गैरकानूनी तरीके से बना था। जिस भूमि पर वह बना वह एक जनजाति के व्यक्ति की थी। कानून के अनुसार जनजाति की भूमि ऊंची जाति वाला नहीं खरीद सकता। लेकिन इस खरीद में उस कानून का उल्लंघन किया गया। इस पर मुकदमा चला और उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि यह खरीद अवैध थी। लेकिन होटल अभी उसी जगह पर है, जो कि स्की स्लोप के रास्ते में पडता है।
बर्फ बनाने वाली इटालियन कंपनी मशीन तथा स्लोप के रास्ते भर में नल लगा बर्फ बिछाने का काम पूरा कर अपने ठेका का पैसा ले वापस चली गई। ज्यों ही 2009 की वर्षा आरंभ हुई उस नंगी की हुई स्की स्लोप भूमि से मिट्टी नालों में बह, रास्ते में पड़ते खेतों को तोड़ती, नीचे डाडों गाँव तथा जोशीमठ नगर के घरों में भर गई। नगर पालिका ने कुछ खर्चा कर उस मिट्टी को घरों से बाहर निकाला। लेकिन फिर जैसे ही वर्षा हुई, उपर से मिट्टी बहकर नीचे सडक तथा नगर के घरों में पहुँचने लगी। मिट्टी के बहने से ऊपर स्की स्लोप पर दरारें पडने लगीं. कुछ 10 फीट तथा उससे भी गहरी थीं. स्लोप के क्षतिग्रस्त होने पर उस पर स्की करना संभव नहीं था।
न ही 2009 में औली की ऊँचाई पर बर्फ पड़ी तब यह जानने की कोशिश की गई कि बर्फ बनाने की मशीन काम करती भी है कि नहीं। उसको लगाने वाली विषेशज्ञ कंपनी के लोग विदेश से बुलाए गए। उन्होंने जाड़े में, जब औली का तापमान शून्य से दो डिग्री नीचे था, मशीन को चलाया। किन्तु बर्फ ढलान पर नहीं बनी। मशीन लगाने वाली कंपनी से तय था कि मशीन शून्य से दो डिग्री ऊपर के तापमान पर बर्फ बनाएगी। औली का तापमान तब और भी नीचे था, लेकिन बर्फ नहीं बन सकी। काश्मीर की कंपनी जिसने स्की स्लोप बनाया था उसे बुलाया गया। उसका कहना था कि स्लोप पर घास लगाना आवश्यक है ताकि मिट्टी न बहे। तब तय हुआ कि स्लोप पर घास लगाई जाय। किन्तु घास लाऐ कहाँ से ? पहले तय किया गया कि जंगलात विभाग पहाड़ के और ऊपर की घास खोद उसे स्लोप पर लगाएगा, लेकिन यदि ऊपर की घास खोदी जाती तो पहाड का वह भाग भी नंगा हो जाता, और तब वहाँ से भी मिट्टी बहकर नीचे बस्तियों में आती और वहाँ मकानों में भरती। बाद को तय हुआ कि भारत-तिब्बत सरहदी पुलिस, जिसका एक बड़ा प्रशिक्षण केंद्र औली में है, स्की-स्लोप पर घास लगाएगी। फौज का उच्च क्षेत्रों में सब्ज़ी तथा अन्य फसलें उगाने का जो संस्थान औली में है, उस घास को उगाएगा, और उसे स्की-स्लोप पर लगाया जाएगा। यह काम अभी आरंभ हुआ है। आसपास के गाँवों के महिला मंगल दल इस काम पर अब लगाए गए हैं और अभी पता नहीं है कि यह प्रयोग सफल होगा कि नहीं ?
झील जिसके पानी से बर्फ बननी थी उसमें इन दो सालों में मिट्टी भर गई है जिसे साफ करने की आवश्यकता है। घास को लगाने-उगाने में समय लगेगा। बर्फ बनाने वाली मशीन काम करेगी कि नहीं। स्की-स्लोप पर पड़ी दरारें कब तक भरी जाएंगी ताकि स्की हो सके। यह सब सवाल अभी अनुत्तरित हैं। इन सबके कारण 2008 में होने वाली दक्षिणी एशिया शीतकालीन खलों की प्रतियोगिता कि तिथि आगे बढ़ायी गयी। अब उसका 2010 के शीतकाल में होना भी संभव नहीं लगता है। स्की स्लोप पर अभी घास नहीं लगी है़। उसमें पड़ी दरारें ज्यों की त्यों हैं। होटल स्लोप के रास्ते में अपनी जगह खड़ा है। बर्फ बनाने की मशीन काम नहीं कर रही है। खेल प्रतियोगिता के लिए आवश्यक तैयारियाँ अभी नहीं हुई हैं। उनको पूरा करने में समय तथा और धन लगेगा। कहा जा रहा है लगभग 50 करोड़ रुपये का स्की-रिंक देहरादून में, बन गया है। अभी यह पता नहीं है कि कितने देश इन खेलों में भाग लेंगे ?
बताया जा रहा है स्वीकृति देने वालों में, अभी केवल अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान तथा मालदीव हैं। अपने देशों की स्थिति के कारण अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान आ पाएंगे कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। श्री लंका, बांग्लादेश तथा बर्मा ने अभी कुछ नहीं कहा है। उन देशों में बर्फ पड़ती ही नहीं तथा स्की तथा अन्य शीतकालीन खेल वहाँ नहीं होते।
औली में खेलों का होना दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों से अधिक कठिन हो गया है। शायद देश के लिए यह फायदे की बात हो कि वह पता लगाए कि अभी तक खर्च हुए 110 करोड़ रुपये कहाँ और किस प्रकार व्यय किए गए और इस पर कोई घोटाला हुआ कि नहीं ? शीतकालीन खेल यूरोप तथा अमेरिका में आयोजित होते हैं। उनमें भाग लेने की लागत बहुत अधिक आती है। भारत उन्हें दक्षिणी एशिया के देशों के लिए कम दामों में ऐसे खेलों का आयोजन करने का प्रयास कर रहा था, जिसके लिए केन्द्र ने 110 करोड़ रुपए दिए थे।
क्या हमारे गरीब देश को इस तरह के नफासत के कार्यों का आयोजन करने की आवश्यकत है, जब घर में लोग भूखे मर रहे हों, पढाई के साधन सबके लिए उपलब्ध न हों और जीवन की ज़रूरी आवश्यकताओं को पूरा न किया जा रहा हो ?