उत्तराखंड में शराब के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई अनवरत जारी है। दशकों पहले दीपा देवी ने शराब की जिस दुकान को आग लगाई थी, वह अभी तक जल ही रही है। दीपा बाद में शराब के खिलाफ लड़ने वाली टिंचरी माई के नाम से मशहूर हुई। महान क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन की माता तारा देवी से लेकर लीला पांडे, सावित्री मठपाल, राधा बहन तक कई बड़े नाम हैं जिन्होंने नशे के खिलाफ लंबी और सशक्त लड़ाई लड़ी। इतने लंबे संघर्ष के बावजूद शराब का अंत नहीं हुआ। आंदोलन अंतहीन होता गया। शराब से सरकारी कमाई करोड़ से अरब की ओर जा रही है। इस बार भी उत्तराखंड में कई महीनों से शराब की दुकानों के आबंटन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रही महिलाएँ डटी हैं। हालाँकि दुकानों का आबंटन हो चुका है और दुकानें खुल चुकी हैं।
कुमाऊँ में मुनस्यारी से लेकर गढ़वाल के उत्तरकाशी तक शराब के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष चल रहा है। शराब की दुकानों को आग लगाई जा रही है। रोज सड़क पर महिलाएँ बोतलें फोड़ रही हैं। दुकानों के सामने महिलाओं ने डेरा डाल रखा है। हर दिन एक नया गाँव आंदोलन में कूद रहा है। पहाड़ को खड़ा रखने वाली नारियों की यह लड़ाई इसी तरह दशकों से चली आ रही है। बस चेहरे बदले हैं। कल जिस कुरीति के खिलाफ माँ लड़ रही थी, आज बेटियों ने कमान संभाल रखीं हैं। कल तक जिस दर्द से सास पीडि़त थी, आज बहू कराह रही है। इसके अलावा कुछ नहीं बदला। शराब सिंडीकेट ज्यादा ताकतवर होकर उभरा है। इस जहर से आने वाले राजस्व में हर साल इजाफा ही हुआ है। शराब से मौतें बढ़ी ही हैं। पहले केवल शराब के खातिर घर टूटते थे, अब शराब के खिलाफ खड़े होने पर भी घर टूट रहे हैं। इसके बावजूद पहाड़ की महिलाओं का हौसला है कि हर बार हिम्मत बढ़ाता है।
उत्तराखंड की महिलाओं का यह हौसला पूरे देश के लिए मिसाल बनता है। इसके बावजूद इस आंदोलन को हम सफल नहीं कह सकते तो इसकी कई वजहें हैं। पूरे राज्य में फैला यह आंदोलन आजादी के बाद से आज तक संगठित नहीं हो सका। जबकि इस बीच हमने जबरदस्त संघर्ष की बदौलत अपना राज्य ले लिया। 1993 में मुलायम सरकार ने जब पहाड़ के एक-एक गांव तक शराब पहुँचाई तो इससे त्रस्त महिलाओं ने नशामुक्त राज्य का सपना देखा। इसके बाद राज्य आंदोलन की लड़ाई में महिलाओं की एक बड़ी भागीदारी देखी जा सकती है। राज्य तो मिला लेकिन शराब और उसके खिलाफ आंदोलन बदस्तूर चलता रहा। एक ही दर्द से पीडि़त अलग-अलग बोली बोलने वाली राज्य की महिलाओं को प्रशासन ने कभी एकजुट होने ही नहीं दिया। कुछ महिलाओं के कदम शराबी पतियों ने रोक लिए तो कुछ महिलाएँ इतनी सक्षम नहीं थीं कि आंदोलन के साथ अपने बच्चों का पेट भर पातीं। इन सबका फायदा उठाया शराब सिंडीकेट ने। शराबबंदी को लेकर राजनैतिक इच्छा-शक्ति भी हमेशा शून्य रही। जितनी सरकारें आईं, सबने शराब का राजस्व बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगाई। शराब से राजस्व बढ़ाने की चाह रखने वाली सरकारों ने कभी इसकी लत से तबाह हो रहे युवाओं के सही इस्तेमाल की सोची ही नहीं। आंदोलनों को हाईजैक करने के आदी जनप्रतिनिधियों ने भी इस लड़ाई में हाथ नहीं डाला। शराब के खिलाफ रात-दिन धरने पर बैठीं, आमरण अनशन कर रहीं महिलाओं के साथ कभी कोई विधायक और सांसद नजर नहीं आया। संसद तो दूर, विधानसभा तक में पूरे प्रदेश में चल रहा यह आंदोलन सवाल नहीं बन सका और पिछले दिनों बजट सत्र भी खत्म हो गया। राजनैनिक दलों से जुड़ी महिलाओं ने आंदोलन में कभी शिरकत भी की तो मेहमान की तरह। इन दशकों में एक ऐसा नेतृत्व कभी नहीं उभरा जो राज्य भर में फैले इस आंदोलन को जोड़ने का काम करता। ऐसा संपर्क कभी स्थापित नहीं किया गया कि पिथौरागढ़ में बिकने वाली शराब के खिलाफ उत्तरकाशी में गूँज उठती। पूरे प्रदेश में एक बिखरा आंदोलन चलता रहा और चल रहा है।
इसके विपरीत शराब कारोबारियों ने आंदोलन को तोड़ने के लिए कई हथकंडे अपनाए। इसमें अधिकांश कारगर साबित हुए। राज्य में बड़ी संख्या में महिलाओं का शराब की दुकान के लिए आवेदन करना इसी चाल का एक हिस्सा है। इससे महिलाओं के शराब विरोधी आंदोलन को भले ही प्रत्यक्ष झटका न लगा हो लेकिन महिलाओं का मनोबल तो टूटा ही। आंदोलनरत महिलाओं के परिजनों को भड़का कर तो कभी धमका कर आंदोलन कमजोर किया गया। इन सब साजिशों के खिलाफ पहाड़ की भोली भाली नारी, संघर्ष को जीवन का मूल मंत्र मानने वाली महिलाओं ने कभी सोचा ही नहीं। जबकि जरूरत इन साजिशों के खिलाफ संगठित होकर लड़ने की है। एक ऐसी डोर बनाने की आवश्यकता है जिसमें, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर से लेकर पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी के अलावा उन सैकड़ों गाँवों को पिरोया जा सके जो शराब के खिलाफ लड़ रहे हैं। एक ऐसी ताकत बनानी होगी जिसके दबाव से शराब के खिलाफ राजनैतिक इच्छाशक्ति पैदा हो और शराब के अंत के साथ इस अनवरत आंदोलन से महिलाओं को निजात मिले।
बहुत शानदार, बहुत अपीलिंग लिखा है मयंक,,,,,..