प्रस्तुति : चैन सिंह रावत
उत्तराखंड राज्य की परिकल्पनाओं में नशामुक्त राज्य एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। लेकिन नशे को लेकर संवेदनशील रहे हमारे समाज में आज पेयजल के सापेक्ष शराब की सुलभता ने हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को बुरी तरह से प्रभावित किया है। शराब के बढ़ते दुष्परिणामों से समाज को बचाने की जिम्मेदारी मातृशक्ति की अधिक बनती थी। लेकिन इस वर्ष महिलाओं द्वारा शराब की देशी-विदेशी मदिरा की दुकानों के लिए किए गए साढ़े पाँच हजार से अधिक आवेदनों एवं उनके नाम छूटे ढाई दर्जन ठेकों ने उन लोगों को सकते में डाल दिया, जिन्होंने देवभूमि की बहादुर बेटियों को शराबबंदी आंदोलनों की अगुवाई करते, पुलिस के डंडों की मार झेलकर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अलख जगाते देखा है। महिलाएँ समाज की प्रमुख भागीदार मानी जाती हैं और समाज के उत्थान एवं पतन में इनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शराब के धंधे में महिलाओं के दखल ने उन्हें समाज में किस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है ? सवाल इससे अधिक बड़ा है। क्योंकि माफियाओं में शराब के ठेके पत्नी या परिजनों के नाम कराने की होड़ केवल उसी दुकान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक वैध लाईसेंस से पूरे क्षेत्र में अवैध तस्करी का लाईसेंस भी माफिया हथिया लेते हैं।
नयारघाटी क्षेत्र के दुधारखाल में शराब बंदी आंदोलन की अगुवा रही सरोजनी देवी, शशि भट्ट एवं ऊषा खंतवाल इसके लिए पुरुषों को जिम्मेदार मानते हुए कहती हैं कि पंचायतों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाते उनके पति अथवा परिजन अब नारी के गरिमामय व्यक्तित्व एवं जुझारू तेवरों को शराब के ठेकों तक खींच लाए हैं तो यह किसी द्रोपदी के चीर हरण से कम नहीं। वहीं लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी कहते हैं कि महिला सशक्तीकरण के नाम पर आज तक जितने भी प्रयास हुए, यदि उनके परिणाम शराब के ठेकों में महिलाओं की भागेदारी के रूप में सामने आते हैं तो वे सारे प्रयास ढोंग मात्र हैं जो समाज के विकृत चेहरे को सामने ला रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी भी है कि लगातार शराबबंदी के लिए संघर्षरत रही महिलाएँ क्या स्वेच्छा से शराब के धंघे में आना चाहती हैं ? ढाई दशक पूर्व इस हिमालयी राज्य में ‘नशा नहीं रोजगार दो’ जैसा ऐतिहासिक आंदोलन नारी शक्ति की ही अगुवायी में लड़ा गया था। इसके अलावा विगत वर्षों में कई स्थानों पर शराबबंदी आंदोलनों की अगुवाई में मातृशक्ति प्रथम पाँत में खड़ी दिखी। फिर भी यदि ये महिलाएँ स्वेच्छा से शराब के धंधे में आई हैं तो यकीनन देवभूमि की संस्कृति दूषित हो रही है। राज्य के भविष्य के लिए इसे शुभ संकेत तो नहीं माना जा सकता।
इसके परिणामस्वरूप यदि देवभूमि की बेटियाँ भविष्य में शराब की दुकानों में सेल्समैनी और शराब की तस्करी करती नजर आएँ तो कोई आश्चर्य नहीं। आखिर पुरुष प्रधान कुकृत्यों में महिलाओं को भागीदार बनाकर समाज अपनी गरिमा खोएगा ही।