स्वतंत्रता संग्राम का दौर कठिनाइयों का था और आशाओं का भी। मैं सन् 1942 याद करता हूँ, जब गांधी जी ने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ अभियान आरंभ किया था। मैं तब 12 वर्ष का था और पौड़ी के मेसमोर हाईस्कूल में पढ़ता था। सारे गढ़वाल में जगह-जगह लोग नारे लगाते हुए प्रदर्शन कर रहे थे और गिरफ्तारियाँ दे रहे थे। बालकों का दल भी नेताओं के जलसों के साथ नारे लगाता जाता। लगता था कोई बड़ा परिवर्तन होने को है। क्या होगा, यह हम बालक नहीं जानते थे।
वैसे वह समय कठिनाइयों भरा था। दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था और अनाज-कपड़े की देश में कमी थी। प्रतिदिन उपयोग की वस्तुएँ राशन पर थीं। शहरों में लोगों को राशन-कार्ड मिले थे, जिन पर गल्ले की दुकानों पर आटा, गेहूँ, चावल, दाल, चीनी आदि नपी-तुली मात्रा में मिलते थे, जो कभी महीने-भर न चल पाते थे। लोग हाथ खींचकर इन चीज़ों का उपयोग करते थे। घर में मेहमान आ जाते तो कठिनाई होती थी।
लेकिन राजनैतिक वातावरण आशाजनक था। लोगों में आजादी के लिए उत्साह था। सभाओं में भीड़ रहती थी। ऐसा नहीं कि तब अंग्रेज साम्राज्य के समर्थक नहीं थे। लड़ाई के लिए सिपाहियों की भर्ती चल रही थी। कुछ लोग अंग्रजों से रायसाहब या रायबहादुर का खिताब पाने के लिये पहाड़ के अधिक से अधिक जवानों को फौज में भर्ती करा रहे थे। अधिकतर भर्ती होनेवाले राठ क्षेत्र से आते थे, जहाँ से पेशावर कांड के वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली आए थे। राठ में खूब सारा कोदा-झंगोरा जैसा मोटा अनाज होता था, लेकिन वहाँ काम न होने के कारण पैसों की बहुत कमी थी। लड़ाई लगने पर तनख्वाह से पैसे पाने का रास्ता नौजवानों के लिए खुल गया। बहुत सारे युवक फौज में भर्ती होने लैंसडाउन जाने लगे।
लैंसडाउन में रंगरूटों को प्रशिक्षण दिया जाता था। कुछ महीने हथियारों के बारे में सिखा और कवायद करा, उन्हें बसों में भर कर कोटद्वार भेजा जाता था। वहाँ से वे रेलगाडियों से बंबई या मद्रास ले जाए जाते थे। फिर उन्हें पानी के जहाजों से योरोप तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया में जर्मनों-जापानियों से लड़ने भेजा जाता था। योरोप, बर्मा, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया इत्यादि में अगर दूसरे महायुद्ध के कब्रिस्तान देखेंगे तो पाएँगे कि वहाँ संगमरमर की दीवारों पर उन सैकड़ों गढ़वालियों के नाम लिखे हैं, जो वहाँ लड़ाई में मारे गए।
लैंसडाउन से जाते समय उन्हें विदाई देने घर का कोई व्यक्ति नहीं होता था। बहुतों के लिए वह आखिरी विदाई होती। जो मारे गए, वे कहाँ वापस आते ? मौंदाड़स्यूँ का एक अंधा गायक कोटद्वार रेल स्टेशन पर जाते सिपाहियों के लिए विदाई के करुण गीत गाता था और सिपाही उसके हाथ में कुछ पैसे थमा देते थे। यह थी उनकी अपने देश से आखिरी विदाई!
गढ़वाल में उस समय दोनों प्रकार का वातावरण था। राठ के जवानों का दल, अधिकांश लंगोटी और भांग के रेशों का कोट पहिने, लैंसडाउन पैदल जाते दिखाई देता। उधर शहरों-कस्बों में लोग आजादी के नारे लगाते हुए सभाओं में जाते। मुझे याद है कि जिस सुबह वकील कोतवाल सिंह जी गिरफ्तारी देने जा रहे थे, हम लोग, अधिकतर बच्चे, उनके अपर बाजार के घर पर इकट्ठा हुए थे और बाद में वयस्क कांग्रेसियों के साथ नारे लगाते हुए उन्हें शहर के मध्य में बनी जेल तक ले गए थे। वहाँ उन्हें लोहे के फाटक के अंदर बंद कर दिया गया था। बाद को उन्हें मैदान की किसी बड़ी जेल में भेजा गया।
मैं एक इसाई संस्था के स्कूल में पढ़ता था। इसाई अंग्रेजों के साथ समझे जाते थे। लेकिन वहाँ कभी नहीं कहा गया कि काँग्रेसियों के जलूसों या सभाओं में मत जाओ और साम्राज्य विरोधी नारे न लगाओ। स्कूल के बाद जो हम करना चाहते थे, उसे करने की छूट थी। पौड़ी में एक अन्य स्कूल था – डी.ए.वी. हाईस्कूल, जो पूर्ण रूप से भारतीय था। लेकिन वहाँ राजनीति के बजाय धर्म का अधिक प्रभाव था। धर्म स्वतंत्रता के लिए प्रेरित नहीं करता था, इसलिए उसके विद्यार्थी सभाओं में कम दिखाई देते थे।
जो जोश उस समय देश बदलने के लिए था, वह अब नदारद हो गया है। अब भारत शासकों तथा शासितों में बदल गया है। शासित केवल माँग करते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और यह शासकों पर निर्भर है कि वे क्या दे सकते हैं। शासकों का एक मजबूत वर्ग बन गया है। इसमें पैंठ बनाने के लिये कुछ लोग पार्टियों के सदस्य बन जाते हैं और वहाँ पद पाकर चुनाव का टिकट मागते तथा पाते है और जीतने पर नेता या मंत्री बन जाते हैं। कुछ अच्छे विद्यार्थी इम्तहान पास कर अफसर बन जाते हैं और नेताओं के साथ मिलकर शासक वर्ग बनाते हैं। उनके साथ वे धनी भी होते हैं जिन पर शासक वर्ग की सदैव कृपा रहती है। यह वर्ग तय करता है कि देश में क्या सही या क्या गलत है। किन लोगों को साधन देने हैं और किन्हें दंड।
अर्द्ध शताब्दी से अधिक पूर्व का वह समय जब लगभग सब भारतीय सामूहिक रूप से स्वतंत्रता माँग रहे थे और बराबरी का समाज बनाने की कल्पना कर रहे थे, एकदम बदल गया है। अब कम ही लोग बराबरी की बात करते हैं। कुछ तो कहते हैं कि बराबरी हो ही नहीं सकती। अब कई जगहों पर जरूरतें लड़ाई बन गई हैं। यह देख कर शासक वर्ग कहता है कि जरूरतमंदों को कुछ सस्ता अन्न और काम देने की योजना बनाओ। उनके बच्चों के लिए स्कूल खोलो, उनके गाँवों के लिए सड़कें बनाओ। मानव संसाधन मंत्री कहते हैं सबको शिक्षा उपलब्ध कराओ। किस प्रकार की शिक्षा किसके लिए, इस पर विवाद है। कितनों को कितना अन्न दिया जाये, इस पर भी विवाद है। कितनों को काम मिलना चाहिए, इस पर भी भिन्न मत हैं। ये सब बातें शासक वर्ग तय करता है।
पुराने सपने, जिनके लिए लड़ाई लड़ी गई थी, लगता है सब समाप्त हो गए हैं। पहाड़ के लोग राज्य तथा उसकी राजधानी के लिए लड़े, लेकिन राज्य बनने पर राजधानी शासक वर्ग ने हथिया ली। उसका दावा है कि राजधानी पहाड़ में बन ही नहीं सकती। छियासी साल का मुख्यमंत्री अपने निवास पर सरकारी खर्चे से तैराकी की झील बनवा रहा था, जिसका बनना जारी है। मंत्रियों के मोटर काफिलों के जाने के लिए देहरादून की सड़कें चौड़ी की गईं। इसके लिए खुले में बहती, शहर को ठंडा रखती पानी की नहरों को ढक दिया गया। बरसात के कई दिनों, हफ्तों, पहाड़ का देहरादून से संपर्क भूस्खलनों के कारण टूट जाता है और देहरादून पहाड़ से कट जाता है। लेकिन शासक वर्ग को इसकी चिंता नहीं होती। देहरादून राज्य के एक कोने में है। कब कौन मंत्री या बड़ा अफसर देहरादून में है या दिल्ली तथा राज्य के बाहर चला गया, यह पहाड़ में पता नहीं लगता। देहरादून की सरकारी दुनिया पहाड़ से अलग है। पहाड़ से सम्पर्क न हो तो शासक वर्ग को कोई फर्क नहीं पड़ता।
आखिरी पैरे में मेरे दिल की बात लिख दी सर आपने