श्रावण संक्रान्ति के दिन पड़ने वाले हरेला पर्व, जब सूर्य कर्क रेखा को उन्मुख होता है, का कुमाऊँ प्रान्तर में बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इस ऋतुपर्व के बहाने काश्तकार अपने बीज की गुणवत्ता और मिट्टी की उर्वरा शक्ति की परख करते थे। औपनिवेशिक शासन और आजादी के एक ‘अंधे युग’ में हम अपने ऋतु पर्वों से विमुख होते गये। बेशक उनका कर्मकाण्ड जिन्दा रहा, लेकिन उनकी मूल भावना तिरोहित हो गई। यही नहीं, अपनी संस्कृति पर गौरव का भाव भी लगातार घटता रहा।
हमें याद है कि अपने बचपन में हम सिर में हरेला सिर्फ घर के भीतर धारण करते थे, नैनीताल जैसे अत्याधुनिक नगर में रहने के कारण हरेला सिर पर रख कर घर से बाहर जाने में संकोच करते थे कि लोग ‘गँवई’ और ‘असभ्य’ समझ कर उपहास करेंगे। ऐसी ही शर्म मकर संक्रान्ति की अगली सुबह घुघुतों की माला गले में डाल कर ‘काले कौआ, काले कौआ’ चिल्लाते हुए पक्षियों को पुकारने में महसूस होती थी। 1994 के विराट राज्य आन्दोलन से जिस तरह आम उत्तराखंडी को ‘भनमजुवा’ से अलग एक सम्मानजनक छवि मिली तो उम्मीद जगी थी कि नये राज्य में इन लोकपर्वो का महत्व बढ़ेगा। इनका व्यावहारिक उपयोग भी होगा और इन्हें राजकीय स्वीकृति भी मिलेगी। उदाहरणार्थ हरेला औपचारिक रूप से वृक्षारोपण तथा जैव विविधता का पर्व बन जायेगा तो ‘काले कौआ’ वन्य जीवों और पशु-पक्षियों के प्रति अनुराग का। शिक्षा संस्थानों तथा सरकारी कार्यालयों में उस रोज इसी तरह के आयोजन होंगे। लेकिन इस प्रदेश की दिशा इस तरह गड़बड़ायी कि गुरु तेगबहादुर शहीदी दिवस और रविदास जयन्ती तो प्रदेश की सार्वजनिक छुट्टियों में शामिल हो गये, मगर हरेला और काले कौआ कहीं पीछे छूट गये।
क्या यह गलती अभी भी सुधारी जा सकती है ?

























हाई, इसमें अफसोस की बात क्या ठैरी महाराज?
उत्तराखण्ड बना ही उनके अनुयाईयों के लिये है, हरेले से जब खुद ही मुंह मोड़ोगे, नाक सिकोड़ोगे तो ऐसा तो होना ही है। यह उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि उत्तराखण्ड आन्दोलन में मुंह बिचकाये, चुपचाप रहने वाले आज आन्दोलनकारी हो गये और वास्तविक आन्दोलनकारी किनारे है।