One response to “सम्पादकीय:पीछे छूट गये हरेला और काले कौआ….!!”

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    हाई, इसमें अफसोस की बात क्या ठैरी महाराज?
    उत्तराखण्ड बना ही उनके अनुयाईयों के लिये है, हरेले से जब खुद ही मुंह मोड़ोगे, नाक सिकोड़ोगे तो ऐसा तो होना ही है। यह उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि उत्तराखण्ड आन्दोलन में मुंह बिचकाये, चुपचाप रहने वाले आज आन्दोलनकारी हो गये और वास्तविक आन्दोलनकारी किनारे है।

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