बहुत समय नहीं बीता….शायद साल बीतने को ही आया होगा। अमेरिका के व्यस्त शहरों की सड़कों पर कुछ युवतियाँ खास टी-शर्ट पहनकर घूम रही थी। इन टी शर्टों के ठीक सामने खास अंदाज में एक पंक्ति लिखी थी। लिखा था – आई एन्जॉय माई वैजाइना…..
यकीनन आपका सिर झन्ना गया होगा। मेरा भी झन्नाया था जब मैंने अपने दोस्त द्वारा भेजे गये इस संदेश को अपने मेल-बॉक्स पर पढ़ा था। आपकी तरह मैं भी यह जानने को उत्सुक था कि आखिर यह युवतियाँ हैं कौन ? आपकी तरह मैं भी इन्हें प्रॉस या लम्पट युवतियाँ समझ बैठा था। लेकिन पूरा संदेश पढ़ने पर मेरा अनुमान गलत निकला। असल में ये अमेरिकी समाज की पढ़ी-लिखी वोमेन एक्टिविस्ट थीं। नारी मुक्ति आंदोलन की इन कार्यकर्त्रियों का दावा था कि उनकी देह पर केवल उनका हक है। वे चाहें अपनी देह का जैसा उपयोग करें।
याद कीजिये भारत में महिला मुक्ति आंदोलन की शुरूआत। हमारे यहाँ भी यही माँग उठ रही थी कि स्त्री की देह पर सिर्फ उसी का अधिकार है। ऐसा क्यों हो कि उसकी देह बचपन में माता-पिता के नियंत्रण में, विवाह के बाद पति के कब्जे में और बुढ़ापे तक बच्चों के हवाले रहे। यह एकदम बेसिक सवाल है। इसी सवाल का जवाब ढूँढने निकले लोगों ने बेहद ठंडे यूरोप में भी महिलाओं को नंग-धड़ंग कर निमोनिया के हवाले कर छोड़ा है। जी हाँ ! वहाँ नवजात बच्चों से ज्यादा निमोनिया की मरीज जवान महिलायें होती हैं। कारण साफ है कि देह-प्रदर्शन के चक्कर में वह पर्याप्त कपड़े नहीं पहनती और ठंडी हवाओं का शिकार बन जाती हैं। आजकल भारत में घोर सर्दियों में सड़क पर निकलती बारातों में आप स्लीवलेस ब्लाउज में महिलाओं का जो जत्था देखते हैं, वह भी जाने-अनजाने महिला-मुक्ति के इसी दर्शन से प्रभावित होता है।
सवाल यह खड़ा होता है कि क्या केवल देह की मुक्ति ही स्त्री की आजादी का पर्याय है ? अगर ऐसा है तो क्या यूरोप सहित तमाम विकसित, समृद्ध और सभ्य कहे जाने वाले मुल्कों में स्त्री अपना हक ले चुकी है? क्या अमेरिका या ब्रिटेन के शहरों में महिलायें भी पुरुषों की तरह कहीं भी, कभी भी पेशाब कर पाने की आजादी और सुरक्षा हासिल कर पाई हैं ? क्या वहाँ की स्त्री विवाह के बाद पति का सरनेम अपनी मूल पहचान के बोझ से मुक्त हो गई है ! आखिर हिलेरी को अपने नाम के आगे क्लिंटन और मिशेल को ओबामा क्यों जोड़ना पड़ता है ? ऐसा क्यों है कि एक ही दल के दो सशक्त उम्मीदवारों में से जब स्त्री या अश्वेत में से एक का चुनाव करने की बारी आती है तो दुनिया के सबसे सभ्य लोकतांत्रिक राष्ट्र अमेरिका की जनता को तमाम अनिच्छा के बावजूद एक अश्वेत के नाम पर ही मोहर लगानी पड़ती है। अमेरिका राजनीति के जानकार अन्तिम समय तक यही कहते रहे कि हिलेरी को बिल क्लिंटन के नाम का वेटेज मिलेगा और वह बराक ओबामा पर भारी पड़ेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्त्री को लेकर पूरी दुनिया के पुरुषों का एक सा नजरिया है। यह अलग बात है कि अपने इंटरेस्ट के लिये कहीं पुरुष स्त्री के सारे कपड़े उतारकर उसको पोर्न साइटों में भेज देता है तो कहीं स्त्री को बुर्के में पैक कर अंधेरे कमरों में बंद कर दिया जाता है। धर्मों, समाजों और इलाकों ने अपनी सुविधा के अनुसार स्त्रियों का उपयोग किया है। यह पूरी दुनिया में हुआ है, सभी धर्मों और संस्कृतियों में हुआ है। अन्यथा विश्व के सबसे आधुनिक इसाई धर्म की पवित्र पुस्तकें स्त्री पर यह आरोप नहीं लगाती कि शैतान द्वारा ललचाये जाने पर प्रतिबंधित वृक्ष का सेब सबसे पहले उसी ने खाया और फिर ‘बेचारे’ पुरुष को भी ऐसा करने के लिये उकसाया। आप धर्म और संस्कृति की बात करते हैं ? मैं तो आधुनिकता के नाम पर कुछ भी कह डालने वाले विज्ञान
को भी स्त्री के प्रति पक्षपाती मानता हूं। मेडिकल साइंस भी घोषित रूप में स्वीकार करता है कि स्त्री की यौनेच्छा पुरुष के मुकाबले आठ गुनी ज्यादा होती है। मैं कामना करता हूँ कि यह बात सच साबित हो और एक दिन हमारे अखबार स्त्रियों द्वारा पुरुषों के बलात्कार से पटें मिलें। क्या आपने कभी ऐसा प्रसंग सुना है ? अगर नहीं तो क्या इस शोध को पक्षपाती नहीं समझा जाना चाहिये !
हजारों सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। अकेले भारत में ही नहीं, समूचे विश्व में स्त्री को आजाद करने के ठेके का टेंडर पुरुषों के नाम खुला है। भारत में स्त्री की आजादी के झंडाबरदारों ने यूरोप और दूसरे विकसित देशों का मॉडल थोप दिया है। इस मॉडल का एक ही सूत्र वाक्य है- कपड़े उतारो। पिछले तीन दशकों में और खासकर पिछले डेढ़ दशक में नारी-मुक्ति आंदोलन से उपजी तमाम बहसों, कहानियों, कविताओं, चित्रकृतियों, नारों और भाषणों में यही बात निकलकर आती है कि बाजार में वाहियात होकर स्त्री मुक्त हो जाती है। ठीक है कि स्त्री के शरीर पर केवल उसी का अधिकार होना चाहिये लेकिन ऐसा केवल नंगई पर उतर आने और एक झटके में तमाम वर्जनाओं को तोड़ने से नहीं होगा। यह तो पुरुषों को प्रायोजित कार्यक्रम का एक बेहद गोपनीय एजेंडा है, जिसमें महिलाएँ अपनी मुक्ति तलाश रही हैं। लेखिकाओं द्वारा दर्जन भर मर्दों के साथ हमबिस्तर होने के खुलासों से स्त्री मुक्त नहीं होगी। अगर स्त्री को सचमुच
एक मनुष्य की पहचान हासिल करनी है तो उसको मुर्दा-घाट पहुँचने तक उसी नाम को लेकर जीना होगा जो उसको नामकरण के दिन मिला था। स्त्रियों को पूरी संजीदगी के साथ सोचना पड़ेगा कि उत्तर आधुनिकता की तरफ बढ़ती दुनिया में आज भी बस से लम्बे सफर पर निकलने से दो-तीन घंटे पहले प्यास लगी होने के बावजूद उनको पानी पीना क्यों बंद करना पड़ता है। क्यों नहीं उनको भी पेड़ की ओट में हल्का होने की आजादी मिल पायी है ? अगर अब पुरुषों के समाज में स्त्रियाँ इतनी मुखर हो चुकी हैं तो केवल रैम्प पर गाउन उठाने से चार कदम आगे वह कहीं भी, कभी भी ऐसा क्यों नहीं कर देती ? वे अपने ही अंगों को इंजॉय करने की गर्वोक्ति क्यों करती हैं, पुरुषों के अंग
को क्यों नहीं ?
जाहिर है स्त्री अभी तक न तो आजाद हो पाई है और न ही समाज में सुरक्षा हासिल कर पाई है। इसका कारण यही है कि नारी-मुक्ति के तमाम आंदोलन पुरुषों के निर्देशों पर महिलाओं द्वारा चलाये जाते रहे हैं। स्त्रियों को अगर सचमुच अपनी पहचान स्थापित करनी है तो उन कानूनी प्रावधानों को हटाने के लिये संघर्ष छेड़ना पड़ेगा जो स्त्री को पति का नाम ओड़ने पर बाध्य करते हैं और पिता की संपत्ति पर केवल पुत्रों के हक की बात करते हैं। क्या आपने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम को पढ़ा है ? नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिये। आप जान जायेंगे कि बेटे की अनुपस्थिति में अगर चाचा, ताऊ, उनके बेटे न मिलें तो जाकर बेटी की खोज की जाती है। शिक्षा सबसे कारगार हथियार है। महिलायें शिक्षित होंगी तो जागरूक भी हो जायेंगी। यह भी समझना पड़ेगा कि करवा चौथ की ब्रांड एम्बेसेडर महिला नेत्रियों को रोल मॉडल बनाने के बजाय स्त्रियों को मायावती और ममता बनर्जी जैसी नेत्रियों का अनुकरण करना पड़ेगा जो आज भी न
केवल अपने मूल नाम के साथ कायम हैं, बल्कि जिनका नाम भर सुनने से पुरुषों की सत्ता डोलने लगती है। स्त्री-मुक्ति की बात हो तो हमारे समाज शास्त्रियों को विवाह संस्था की याद आ जाती है। लेकिन यहाँ भी सवाल यही है कि क्या इस संस्था को बनाये और बचाये रखने का दायित्व केवल स्त्री का है ?
अब समय आ गया है कि सही सवालों को लेकर पूरी संजीदगी के साथ एक नई पहल हो अन्यथा अगली सदी में भी हम अपनी आधी आबादी को कुचलते हुए ही प्रवेश करेंगे। यह भी तय करना पडेगा कि अब जो पहल हो वह केवल महिलाओं द्वारा-उन्हीं के वैचारिक नेतृत्व में हो। पुरुषों की पहल निरपेक्ष होती तो कम से कम उन मुल्कों की महिलाओं को तो उनकी जमीन नसीब हो जानी चाहिये थी जिन्होंने स्त्रियों को बूचड़ के यहाँ टँगे खाल उतरे बकरे की तरह बनाकर छोड़ा है। आप लम्पट छोकरों की बात छोड़िये-प्रबुद्ध और जिम्मेदार पुरुषों की जमात में स्त्रियों को लेकर छिड़ी बहसों का मिजाज परखिये। आप अच्छी तरह समझ जायेंगे कि पुरुष के लिये स्त्री मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं है। इसलिये स्त्री के हक को हासिल करने के लिये स्त्रियों को ही आगे आना पड़ेगा- अन्यथा नारी सशक्तीकरण के सभी नाटकों का दुखद अंत ही होता रहेगा।
























Nari mukti ke sambandh me aap duara uthae gae bunyadi muddhe bahut tarkik aur kargar lage. Bahut bahut vadhai.