पहाड़ों के लिए बरसात में भूस्खलन एक स्थायी त्रासदी बन गया है। उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में हमेशा की तरह ही इस बार भी बेतहाशा भूस्खलन हुआ है, जिससे जनजीवन अस्तव्यस्त है। विगत वर्ष धारचूला के बरम व इस वर्ष सूखीडांग में रोडवेज बस में मलवा आ जाने से हुए जानलेवा भूस्खलनों ने रोंगटे खड़े करने वाली भयावहता की ओर संकेत किया है।
पिथौरागढ़ के धारचूला व डीडीहाट क्षेत्र भूस्खलनों की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील हैं। बरम की जानलेवा त्रासदी के अतिरिक्त भी इस पूरे क्षेत्र में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े कई भूस्खलन हुए हैं। सड़कों में यातायात बाधित होने के चलते सड़कों पर हुए भूस्खलनों की ओर तो ध्यान गया ही है, लेकिन जंगल व मानवशून्य कई जगहें इसकी जद में हैं। यह बात गौर करने की है कि सदियों से मजबूती से खड़े ये पहाड़ आज खिसक कर खतरा बन जाने की स्थिति में कैसे पहुँच गए ? ये अचानक ही नहीं खिसकने लगे हैं। इनके खिसकने की भूमिका यहाँ हुए बेतहाशा निर्माण कार्यों ने लिखी है। जिस कदर यहाँ हजारों की संख्या में भूस्खलन हुए हैं, उससे यहाँ के निर्माण कार्यों की वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह लगता है। यहाँ विगत वर्षों में हुए बड़े निर्माण कार्यों में छिरकिला डैम (धौलीगंगा परियोजना) व डैम निर्माण के लिए बनाई गई सड़क प्रमुख हैं। इन दोनों परियोजनाओं में बेतहाशा निर्माण कार्य हुआ है। पहाड़ में बहते पानी को रोक कर जमा कर लेने के कुप्रभावों को छिरकिला के आसपास के क्षेत्र में घूमकर महसूस किया जा सकता है। यहाँ जमीनें धँसने लगी हैं, और ऐलागाड़ के पास तो लगभग पूरी सड़क ही धँस कर ऊबड़-खाबड़ हो गई है। बेतहाशा छोटे-बड़े भूस्खलन सड़क पर से ही देखे जा सकते हैं। ये सब जानलेवा त्रासदी बन जाने जैसे ही भूस्खलन हैं।
छिरकिला जैसे छोटे बाँधों के निर्माण के लिए विशेषज्ञ सहमत दिखते हैं। वे मानते हैं कि ऐसी छोटी परियोजनायें ही पहाड़ों में सफल हो सकती हैं। लेकिन सवाल सावधानी बरते जाने का है। भ्रष्टाचार व ठेकेदारी में बड़ा मुनाफा के लालच के निरापद समझे जाने वाले छोटे डैम भी खतरनाक हो सकते हैं। छिरकिला डैम में इसके सारे संकेत मिलते हैं। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद स्थानीय अखबारों में टनल रिसाव व डैम से प्रभावित भूदबाव की छिटपुट खबरें प्रकाशित हुई थीं, जो जल्दी ही निर्माण एजेंसिंयों के विज्ञापनों के भँवर में खो गईं। डैम के स्पष्ट कुप्रभावों के खिलाफ जो आन्दोलन स्थानीय जनता से उठना था, उसे नेतृत्व को ठेके बाँटकर दबा दिया गया। पैसे के खेल ने प्रतिरोध को तो दबा दिया लेकिन भूस्खलन नहीं रुका।
भूस्खलनों का एक और बड़ा कारण डैम निर्माण के लिए निर्माण सामग्री पहुँचाने के उद्देश्य से बनाई गई चौड़ी सड़क में भारी मात्रा में विस्फोटकों का अनापशनाप प्रयोग किया जाना भी है। बडे़-बड़े भार वाहनों को ध्यान में रख टनकपुर से तवाघाट तक सड़क को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों का अवैज्ञानिक ढंग से कटान किया गया है। यह अवैज्ञानिक ढंग का कटान पहाड़ में प्रत्येक सड़क में देखा जा सकता है। यहाँ टनकपुर-तवाघाट मोटरमार्ग में सड़क के ज्यादा चौड़ी होने से इसके प्रभाव ज्यादा स्पष्ट हैं। बिना किसी विशेषज्ञ सलाह के पहाड़ों को हिला देने वाले बेतहाशा विस्फोटकों की मदद से जिस कदर ये सड़क निर्माण कार्य हुआ है, उससे बरसात में यहाँ भूस्खलन स्वाभाविक ही है। सड़कों में नालियों की व्यवस्था नहीं है, जिससे जगह-जगह सड़क में गड्ढे बन गए हैं और बरसात में पानी भरने से भूमि खिसकती जा रही है।
अभी कुछ सप्ताह पूर्व इस सड़क पर सूखीढांग के पास हुए भूस्खलन से मलवा सड़क पर चल रही रोडवेज बस पर आ गिरा। इस हादसे में कई लोगों की मौत हो गई। इससे पहले विगत वर्ष धारचूला के बरम गाँव में हुए भारी भूस्खलन में 15 लोगों की जानें चली गई थीं। भूस्खलन अब निरन्तर जानलेवा होते जा रहे हैं। यह चिन्तनीय है। साथ ही चिन्तनीय यह भी है कि अब भी सरकार को इसकी परवाह नहीं है। डैम से हो चुके पर्याप्त नुकसान के बाद भी यहाँ धौलीगंगा नदी में ऊपर अभी तीन बाँध निजी कम्पनियों द्वारा बनाये जाने प्रस्तावित हैं। इनका सर्वें पूरा हो चुका है और ये जल्दी ही बनने लगेंगे। इनके परिणाम संभवतः और भी खतरनाक हों। सरकार की महत्वाकांक्षा व निजी कम्पनियों की मुनाफाखोरी की कीमत जनता को अपनी जान देकर चुकानी होगी।